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एआई डेटा सेंटर्स के खिलाफ दुनिया भर में बगावत: पानी-बिजली संकट से डरे लोग, क्या सच में खतरे में है पर्यावरण?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitish Kumar Updated Wed, 03 Jun 2026 05:46 PM IST
सार

AI Data Centre Protest: दुनिया भर में एआई डेटा सेंटर्स के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। अमेरिका, आयरलैंड से लेकर चिली और मलेशिया तक लोग जल संकट, बिजली बिलों में बढ़ोतरी और ध्वनि प्रदूषण से परेशान हैं। जानिए क्या कहती हैं नई रिसर्च रिपोर्ट्स और क्या वाकई एआई पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है।

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एआई डेटा सेंटर्स का दुनिया भर में हो रहा विरोध - फोटो : एआई जनरेटेड
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जितनी तेजी से हम सबकी जिंदगी में शामिल हो रहा है, इसका जमीनी विरोध भी उतनी ही तेज हो रहा है। एआई को चलाने वाले विशाल डेटा सेंटर्स अब आम लोगों के जी का जंजाल बनते जा रहे हैं। अमेरिका के मिशिगन, यूटा और वर्जीनिया से लेकर यूरोप के स्पेन, नीदरलैंड और आयरलैंड तक लोग सड़कों पर हैं। यहां तक कि मलेशिया और चिली जैसे देशों में भी नए डेटा सेंटर्स के निर्माण को रोकने के लिए भारी प्रदर्शन हो रहे हैं। मई 2026 में आए गैलप (Gallup) के एक सर्वे के अनुसार, 71% अमेरिकी नागरिक अपने इलाके में एआई डेटा सेंटर बनने के सख्त खिलाफ हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

आखिर क्यों भड़क रहे हैं लोग?

स्थानीय लोगों के गुस्से के पीछे कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी गंभीर परेशानियां हैं:

जल संकट और सूखा: एआई सर्वर्स बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए करोड़ों लीटर पानी की जरूरत होती है। लोग डरे हुए हैं कि कंपनियां उनके पीने और खेती का पानी सोख लेंगी।

महंगी बिजली और ब्लैकआउट: डेटा सेंटर्स बहुत अधिक बिजली खींचते हैं। इससे लोकल पावर ग्रिड पर भारी दबाव पड़ता है। नतीजतन, आम लोगों के घरों के बिजली बिल बढ़ रहे हैं और बिजली कटौती का खतरा मंडरा रहा है।

ध्वनि प्रदूषण: डेटा सेंटर्स में लगे विशाल चिलर (कूलिंग पंखे) 24 घंटे भारी शोर करते हैं। इससे आसपास रहने वाले लोगों की नींद और मानसिक शांति छिन गई है।

रोजगार का धोखा: टेक कंपनियां बड़े रोजगार का दावा करती हैं, लेकिन मार्च 2026 की APRS रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर में हर 3.3 करोड़ डॉलर (करीब 275 करोड़ रुपये) के निवेश पर सिर्फ एक नौकरी पैदा होती है।
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डेटा सेंटर - फोटो : एआई जनरेटेड

AI एक सेकेंड में गटक रहा 169 लीटर पानी

लैटिन अमेरिकी देश चिली में लंबे समय से पानी की कमी है। यहां की राजधानी सैंटियागो में एक बड़ी टेक कंपनी डेटा सेंटर बना रही थी, जिसे हर सेकंड 169 लीटर पानी चाहिए था। भारी जन-विरोध के बाद चिली की एक अदालत ने पर्यावरण को होने वाले नुकसान का हवाला देते हुए इस प्रोजेक्ट पर तत्काल रोक लगा दी।

आयरलैंड में तो हालात इतने खराब हैं कि वहां पैदा होने वाली कुल बिजली का 22 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ डेटा सेंटर्स निगल रहे हैं। इसके कारण आम जनता के बिजली बिलों में भारी उछाल आया है और संसद में इस पर गंभीर बहस चल रही है।
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डेटा सेंटर - फोटो : AI जनरेटेड

क्या सच में पर्यावरण को है भारी नुकसान?

डेटा सेंटर्स को लेकर स्थानीय लोगों और क्लाइमेट एक्टिविस्ट्स की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्यावरण को इन सेंटर्स से वास्तविक और बहुत गहरा नुकसान पहुंच रहा है।
  • मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की रिपोर्ट के मुताबिक, एआई डेटा सेंटर्स पर्यावरण पर तिहरा वार कर रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि 1 किलोवॉट-आवर (kWh) बिजली की खपत पर डेटा सेंटर को कूलिंग के लिए 2 लीटर पानी चाहिए। GPT-4 जैसे मॉडल्स को केवल ट्रेन करने में ही 1,287 मेगावाट-आवर बिजली खर्च होती है और 552 टन कार्बन डाइऑक्साइड हवा में घुल जाती है।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA) की 2026 की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2035 तक दुनिया की कुल बिजली का 4.5% हिस्सा सिर्फ डेटा सेंटर्स के पास चला जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में 2025 में डेटा सेंटर्स को मिलने वाली 40% बिजली फॉसिल फ्यूल (कोयला, गैस) से ही आ रही थी।
  • यूरोपियन कमीशन एनालिसिस (मार्च 2026) की रिपोर्ट के अनुसार, 2027 तक एआई डेटा सेंटर्स दुनिया भर में सालाना 5 अरब क्यूबिक मीटर (Cubic Metres) पानी पी जाएंगे। हालांकि, इस रिपोर्ट में एक समाधान भी सुझाया गया है कि अगर इन डेटा सेंटर्स से निकलने वाली 'वेस्ट हीट (Waste Heat)' का इस्तेमाल पानी को शुद्ध करने और कार्बन सोखने के लिए किया जाए, तो भविष्य में इन्हें पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है।
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प्रकृति के साथ बनाना होगा संतुलन - फोटो : AdobeStock

तकनीकी विकास और प्रकृति के बीच संतुलन ही है एकमात्र रास्ता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का विकास बेशक मानव इतिहास की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति है। लेकिन दुनिया भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने एक बहुत ही कड़वी सच्चाई सामने रख दी है। डेटा सेंटर्स के बेतहाशा बढ़ती प्यास और ऊर्जा की भूख से पर्यावरण को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। यह साफ दिखाता है कि एआई विकास का यह मौजूदा मॉडल लंबे समय तक नहीं टिक सकता है।

अब समय आ गया है कि सरकारें और टेक दिग्गज मिलकर एक नई जिम्मेदारी तय करें। भविष्य केवल उसी तकनीक का है जो पर्यावरण के अनुकूल हो। कंपनियों को अब कागजी दावों से बाहर निकलकर पूरी तरह से साफ और नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) पर निर्भर होना पड़ेगा। इसके साथ ही, उन्हें ऐसी नई कूलिंग तकनीकें विकसित करनी होंगी जो कीमती पानी की बर्बादी को रोक सकें। 

यूरोपीय आयोग की रिपोर्ट में सुझाए गए 'वेस्ट हीट' के इस्तेमाल जैसे इनोवेशन को जमीनी स्तर पर जल्द से जल्द अपनाना होगा। दुनिया को अब सिर्फ एआई की नहीं, बल्कि ग्रीन एआई (Green AI) की सख्त जरूरत है। कुल मिलाकर, एआई का विकास अब केवल एक तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया है। यह सीधे तौर पर आम इंसान के पानी, बिजली और पर्यावरण से जुड़ गया है, जिसका समाधान टेक कंपनियों को जल्द से जल्द खोजना होगा।
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