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AI Bubble: एआई की तुलना 'डॉट-कॉम बबल' से क्यों हो रही है, अगर ये बुलबुला फूटा तो क्या होगा?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitish Kumar Updated Mon, 01 Jun 2026 03:50 PM IST
सार

What Is AI Bubble: आज हर कंपनी खुद को एआई से जोड़ रही है। ओपनएआई जैसी कंपनियों की वैल्यूएशन आसमान छू रही है। लेकिन दूसरी तरफ भारी छंटनी और बेतहाशा खर्च ने बाजार में गहरा डर पैदा कर दिया है। क्या एआई 90 के दशक के डॉट-कॉम बबल की तरह महज एक बुलबुला है? जानिए अगर यह बुलबुला फूटा तो दुनिया का क्या होगा।

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क्या फूट जाएगा एआई का बुलबुला? - फोटो : अमर उजाला
एआई को इस सदी की सबसे बड़ी टेक क्रांतियों में से एक माना जा रहा है। इसे इंटरनेट के बाद सबसे बड़ा बदलाव बताया जा रहा है। आज हर नई टेक कंपनी अपने नाम के साथ AI लगाकर खुद को इस रेस में शामिल करना चाहती है। हालांकि, एआई की सच्चाई इस चकाचौंध से कुछ अलग ही नजर आ रही है। गूगल और माइक्रोसाफ्ट जैसी बड़ी टेक कंपनियों से लेकर कैब कंपनी उबर तक ने माना कि एआई में खर्च लगातार बढ़ रहा है। माइक्रोसॉफ्ट ने तो बढ़ते खर्च के वजह से क्लॉड (Claude) का सब्सक्रिप्शन की खत्म कर दिया।


वहीं, एक कंपनी ने दावा किया कि एआई की वजह से उसका साल भर का बजट केवल 4 महीने में ही खत्म हो गया। एआई में बढ़ते निवेश के वजह से गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी ग्लोबल कंपनियां अब तक कुल 1 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी हैं। एआई से एक तरफ लोगों की नौकरियां दांव पर हैं, तो दूसरी ओर OpenAI और एंथ्रोपिक जैसी एआई कंपनियों की वैलुएशन अब 1 ट्रिलियन डॉलर को छूने जा रही है। 

हालांकि, कई टेक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि एआई के साथ वही होने वाला है जो 1990 के दशक में डॉट-कॉम (.com) कंपनियों के साथ हुआ था। कई एक्सपर्ट्स अंदाजा लगा रहे हैं कि डॉट-कॉम बबल जैसा ही एआई का बुलबुला भी जल्दी ही फूटने वाला है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इन दोनों दौर की तुलना आखिर क्यों की जा रही है और यदि एआई का यह बुलबुला फूटता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।
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क्या था डॉट-कॉम बबल? - फोटो : AI जनरेटेड

क्या था डॉट-कॉम बबल?

इकोनॉमिक्स में 'बबल' (बुलबुला) उस स्थिति को कहते हैं जब किसी एसेट या शेयर की कीमत उसकी वास्तविक कीमत से कई गुना अधिक बढ़ जाती है। 'डॉट-कॉम बबल' 1995 से 2000 के बीच का वह दौर था, जब इंटरनेट आधारित कंपनियों (जिनके नाम के आगे या पीछे .com लगा होता था) के शेयरों की कीमतों में अप्रत्याशित और अवास्तविक वृद्धि हुई थी।

इसे 'इंटरनेट बबल' या 'टेक बबल' भी कहा जाता है। इस दौरान हर वह कंपनी, जिसका संबंध इंटरनेट से था, शेयर बाजार में रातों-रात अरबों की बन रही थी, भले ही उसका कोई ठोस बिजनेस मॉडल या मुनाफा कमाने का कोई जरिया न हो।

डॉट-कॉम बबल की शुरुआत कैसे हुई?

इंटरनेट का नया दौर: 90 के दशक में वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) आम लोगों की पहुंच में आने लगा था। निवेशकों को लगा कि इंटरनेट ही भविष्य है और जो भी कंपनी ऑनलाइन जाएगी, वह अपार मुनाफा कमाएगी।

सस्ते कर्ज और वेंचर कैपिटल: उस समय ब्याज दरें कम थीं और बाजार में पूंजी की कोई कमी नहीं थी। वेंचर कैपिटलिस्ट्स (Venture Capitalists) इंटरनेट स्टार्टअप्स में अंधाधुंध पैसा लगा रहे थे, बिना यह देखे कि कंपनी काम कैसे करेगी।

'ग्रोथ ओवर प्रॉफिट' की नीति: कंपनियों का मुख्य फोकस मुनाफा कमाने के बजाय जल्द से जल्द अपना ग्राहक आधार बढ़ाना था। वे मार्केटिंग, विज्ञापन और छूट देने पर पानी की तरह पैसा बहा रही थीं।

बिना मुनाफे वाली कंपनियों के आईपीओ: कई कंपनियां जो भारी घाटे में चल रही थीं, वे अपना आईपीओ (IPO) लेकर आईं और शेयर बाजार में लिस्ट होते ही उनके शेयर आसमान छूने लगे। टेक-हैवी अमेरिकी इंडेक्स नैस्डैक (NASDAQ) 1995 से 2000 के बीच 400% से ज्यादा बढ़ गया था।
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बाजार पर असर और परिणाम - फोटो : अमर उजाला

जब टूटा इंटरनेट कंपनियों का तिलिस्म

डॉट-कॉम बबल के फटने का असर केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के शेयर बाजारों पर पड़ा।

अरबों डॉलर का नुकसान: अक्टूबर 2002 तक NASDAQ इंडेक्स अपने उच्चतम स्तर से लगभग 78% गिर चुका था। इस गिरावट में निवेशकों के करीब 5 ट्रिलियन डॉलर (5000 अरब डॉलर) डूब गए।

कंपनियां हुईं दिवालिया: Pets.com, Webvan, eToys और Kozmo.com जैसी कई चर्चित और बड़ी कंपनियां रातों-रात दिवालिया होकर पूरी तरह बंद हो गईं।

दिग्गज कंपनियों को भी लगा झटका: सिस्को (Cisco), अमेजन (Amazon) और क्वालकॉम (Qualcomm) जैसी मजबूत कंपनियों के शेयरों में भी 80 से 90 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई। हालांकि, इनके बिजनेस मॉडल मजबूत थे, इसलिए ये कंपनियां इस बड़े झटके से उबरने में सफल रहीं। अमेजन का शेयर जो 100 डॉलर से ऊपर था, वह गिरकर 6 डॉलर से भी नीचे आ गया था।

भारत पर डॉट कॉम क्रैश का प्रभाव
भारत पर डॉट कॉम बबल के फटने का प्रभाव अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में काफी सीमित था। इसका मुख्य कारण यह था कि भारतीय शेयर बाजार उस समय टेक कंपनियों के शेयरों में बहुत अधिक निवेशित नहीं था। वैश्विक अनिश्चितता के चलते भारतीय शेयर बाजार को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा और कई निवेशकों के पैसे डूब गए। हालांकि यह संकट इतना व्यापक नहीं था कि भारत में गंभीर आर्थिक मंदी आ सके।
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एआई और डॉट-कॉम बबल की तुलना क्यों हो रही है? - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

एआई और डॉट-कॉम बबल की तुलना क्यों हो रही है?

आजकल हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चर्चा है। तकनीकी जगत से लेकर शेयर बाजार तक, हर जगह एआई का बोलबाला है। लेकिन इस अभूतपूर्व तेजी और निवेश की होड़ ने कई आर्थिक विश्लेषकों को 1990 के दशक के 'डॉट-कॉम बबल' की याद दिला दी है। आइए समझते हैं आज की तेज एआई क्रांति की तुलना डॉट-कॉम बबल से क्यों हो रही है...

अवास्तविक मूल्यांकन और अंधाधुंध निवेश
डॉट-कॉम दौर की तरह ही आज वेंचर कैपिटलिस्ट और आम निवेशक एआई स्टार्टअप्स में बिना किसी ठोस रेवेन्यू या प्रॉफिट मॉडल के अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। कई नई एआई कंपनियों का मूल्यांकन उनकी वास्तविक कमाई से कई सौ गुना अधिक आंका जा रहा है। निवेशकों में यह डर हावी है कि अगर उन्होंने अभी पैसा नहीं लगाया, तो वे भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति से चूक जाएंगे।

नाम के साथ 'AI' जोड़ने की होड़
1990 के दशक के अंत में, कई कंपनियां सिर्फ अपने नाम के आगे या पीछे '.com' लगाकर रातों-रात अपने शेयरों की कीमत बढ़ा लेती थीं। आज बिल्कुल वैसा ही चलन एआई के साथ देखा जा रहा है। कई कंपनियां, जिनका मुख्य व्यवसाय एआई से बहुत कम जुड़ा है या जो केवल बुनियादी काम कर रही हैं, वे भी अपने हर उत्पाद, प्रेजेंटेशन और प्रेस विज्ञप्ति में 'AI' शब्द का इस्तेमाल कर रही हैं ताकि निवेशकों का ध्यान खींचा जा सके।

बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च
डॉट-कॉम युग के दौरान फाइबर-ऑप्टिक केबल और टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर पर आंख मूंदकर भारी खर्च किया गया था। आज वही स्थिति एआई के लिए जरूरी हार्डवेयर के साथ है। एनवीडिया (Nvidia) जैसे चिप निर्माताओं के ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) और विशाल डेटा सेंटर्स को तैयार करने पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। चिंता की बात यह है कि उपभोक्ता एप्लिकेशन्स से होने वाली वास्तविक कमाई अभी भी इस भारी भरकम बुनियादी ढांचे के खर्च की तुलना में काफी कम है।
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OpenAI - फोटो : Adobe Stock

अगर एआई का बुलबुला फूटा, तो दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

शेयर बाजारों में भारी गिरावट
अगर निवेशकों को यह लगने लगा कि एआई से होने वाला वास्तविक मुनाफा उनके निवेश की तुलना में बहुत कम है, तो बाजार में निराशा और घबराहट फैल सकती है। इसके परिणामस्वरूप टेक कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली का दौर शुरू होगा। दुनिया भर के प्रमुख शेयर बाजारों में बड़ी गिरावट आ सकती है, जिससे छोटे और बड़े दोनों तरह के निवेशकों के ट्रिलियनों डॉलर डूब सकते हैं।

स्टार्टअप्स का दिवालिया होना और रोजगार संकट
जिन एआई स्टार्टअप्स के पास कोई स्थायी बिजनेस मॉडल नहीं है और जो केवल निवेशकों के पैसे (Cash burn) पर चल रहे हैं, उनका फंड रातों-रात सूख जाएगा। डॉट-कॉम क्रैश की तरह ही, हजारों नई टेक कंपनियां दिवालिया होकर बंद हो सकती हैं। इसका सीधा असर वैश्विक रोजगार पर पड़ेगा। पूरे टेक सेक्टर में बड़े पैमाने पर छंटनी (Layoffs) देखने को मिल सकती है, जिससे दुनिया भर में अस्थिरता पैदा होगी।

बड़ी कंपनियों का एकाधिकार
बुलबुला फूटने की स्थिति में केवल वही दिग्गज टेक कंपनियां (जैसे माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या मेटा) सर्वाइव कर पाएंगी जिनकी बुनियाद मजबूत है और जिनके पास एआई के विकास को जारी रखने के लिए पर्याप्त नकद भंडार (Cash reserves) मौजूद है। ये बड़ी कंपनियां घाटे में चल रहे छोटे लेकिन इनोवेटिव स्टार्टअप्स को कौड़ियों के दाम पर खरीद लेंगी, जिससे बाजार में उनका एकाधिकार और अधिक मजबूत हो जाएगा।

बुलबुला फटने पर ही होगा उपयोगी एआई का उदय
हर आर्थिक बुलबुले के फटने का एक सकारात्मक पहलू भी होता है। डॉट-कॉम क्रैश के बाद ही अमेजन जैसी कंपनियों ने खुद को साबित किया और वेब 2.0 की मजबूत नींव रखी। इसी तरह, एआई बबल फटने के बाद बाजार से हाइप की गई फर्जी कंपनियां साफ हो जाएंगी। इसके बाद जो एआई तकनीक और कंपनियां बचेंगी, वे अधिक परिपक्व, टिकाऊ और वास्तविक दुनिया की समस्याओं को सुलझाने पर केंद्रित होंगी।
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