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DPDP: क्या जनहित पर भारी पड़ेगा निजता का अधिकार? RTI में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को भेजा नोटिस
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitish Kumar
Updated Mon, 13 Apr 2026 02:36 PM IST
सार
DPDP Vs RTI Act: सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, जो सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम को कमजोर करते हैं। अदालत अब इस मामले में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन की बारीकी से जांच करेगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023' (DPDP Act) के कुछ विवादित प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर संज्ञान लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की दलीलों को सुनने के बाद, बेंच ने केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (DoPT) और कानून एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। इसके अलावा, अदालत ने इस कानूनी प्रक्रिया में राजस्थान सरकार को भी एक पक्ष के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया है।
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डिजिटल जानकारी को संरक्षित करता है DPDP कानून
- फोटो : AI
क्या है विवाद की असली जड़?
भारत में पिछले दो दशकों से 'सूचना का अधिकार' भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत हथियार रहा है। लेकिन अब इस हथियार की धार को लेकर बहस छिड़ गई है। विवाद का केंद्र 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम' (DPDP Act) की धारा 44(3) है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह धारा RTI कानून के उस बुनियादी ढांचे को बदल रही है, जो जनता को सरकारी कामकाज की जानकारी देने की गारंटी देता था। दरअसल, यह पूरा मामला गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच के नाजुक संतुलन के बिगड़ने का है।
यह कानूनी लड़ाई 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' समेत प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह रावत द्वारा शुरू की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह धारा 2005 के सूचना के अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव करती है, जिससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता कम हो जाएगी। याचिका में कहा गया है कि यह बदलाव असंवैधानिक है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है।
भारत में पिछले दो दशकों से 'सूचना का अधिकार' भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत हथियार रहा है। लेकिन अब इस हथियार की धार को लेकर बहस छिड़ गई है। विवाद का केंद्र 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम' (DPDP Act) की धारा 44(3) है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह धारा RTI कानून के उस बुनियादी ढांचे को बदल रही है, जो जनता को सरकारी कामकाज की जानकारी देने की गारंटी देता था। दरअसल, यह पूरा मामला गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच के नाजुक संतुलन के बिगड़ने का है।
यह कानूनी लड़ाई 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' समेत प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह रावत द्वारा शुरू की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह धारा 2005 के सूचना के अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव करती है, जिससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता कम हो जाएगी। याचिका में कहा गया है कि यह बदलाव असंवैधानिक है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है।
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पारदर्शिता पोर्टल्स और जनहित पर मंडराता खतरा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पारदर्शिता पोर्टल्स और जनहित पर मंडराता खतरा
नए बदलाव से पहले, RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत जानकारी देने से छूट तभी मिलती थी जब वह जानकारी किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक जनहित से संबंधित न हो। इसमें एक 'बैलेंसिंग मैकेनिज्म' यानी संतुलन का तरीका था। नियम यह था कि यदि जानकारी देने से किसी की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता है, तो उसे छिपाया जा सकता था, लेकिन अगर बड़े जनहित की बात आती थी, तो वह जानकारी सार्वजनिक करनी ही पड़ती थी। इसी नियम के कारण सरकारी अधिकारियों के खर्चों, उनके द्वारा लिए गए फैसलों और अन्य महत्वपूर्ण विवरणों को उजागर किया जा सका था। डीपीडीपी एक्स की इस एक धारा से पारदर्शिता पोर्टल्स और जनहित के लिए काम करने वाले संगठनों पर खतरा मंडराने लगा है।
पुराने RTI प्रावधान बहाल करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि RTI कानून की मूल धारा 8(1)(j) और उससे जुड़े प्रावधानों को 13 नवंबर 2025 से प्रभावी तरीके से फिर से लागू किया जाए।
यह भी पढ़ें: FBI की बड़ी कार्रवाई: करोड़ों की ठगी कराने वाला ग्लोबल फिशिंग गैंग ध्वस्त, हजारों अकाउंट हुए थे हैक
साथ ही, RTI की धारा 4 के तहत आने वाली ‘प्रोएक्टिव डिस्क्लोजर’ व्यवस्था को जारी रखने की मांग की गई है। इस व्यवस्था के तहत लाभार्थियों का डेटा, मस्टर रोल, सोशल ऑडिट रिकॉर्ड जैसी महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक की जाती है, जो नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी होती है।
नए बदलाव से पहले, RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत जानकारी देने से छूट तभी मिलती थी जब वह जानकारी किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक जनहित से संबंधित न हो। इसमें एक 'बैलेंसिंग मैकेनिज्म' यानी संतुलन का तरीका था। नियम यह था कि यदि जानकारी देने से किसी की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता है, तो उसे छिपाया जा सकता था, लेकिन अगर बड़े जनहित की बात आती थी, तो वह जानकारी सार्वजनिक करनी ही पड़ती थी। इसी नियम के कारण सरकारी अधिकारियों के खर्चों, उनके द्वारा लिए गए फैसलों और अन्य महत्वपूर्ण विवरणों को उजागर किया जा सका था। डीपीडीपी एक्स की इस एक धारा से पारदर्शिता पोर्टल्स और जनहित के लिए काम करने वाले संगठनों पर खतरा मंडराने लगा है।
पुराने RTI प्रावधान बहाल करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि RTI कानून की मूल धारा 8(1)(j) और उससे जुड़े प्रावधानों को 13 नवंबर 2025 से प्रभावी तरीके से फिर से लागू किया जाए।
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साथ ही, RTI की धारा 4 के तहत आने वाली ‘प्रोएक्टिव डिस्क्लोजर’ व्यवस्था को जारी रखने की मांग की गई है। इस व्यवस्था के तहत लाभार्थियों का डेटा, मस्टर रोल, सोशल ऑडिट रिकॉर्ड जैसी महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक की जाती है, जो नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी होती है।
सूचना का अधिकार (सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला
क्या अब सूचना पाना मुश्किल होगा?
DPDP अधिनियम की धारा 44(3) ने RTI की पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। अब व्यक्तिगत जानकारी को लेकर एक 'ब्लैंकेट एग्जेंप्शन' यानी पूर्ण छूट दे दी गई है। इसका मतलब है कि अब व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे के लिए 'जनहित' वाले तर्क को स्पष्ट रूप से किनारे कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस बदलाव के बाद सरकारी अधिकारी किसी भी जानकारी को 'निजी' बताकर देने से मना कर सकते हैं। इससे भ्रष्टाचार की जांच, सरकारी ऑडिट और खरीद-फरोख्त जैसे संवेदनशील मामलों में जवाबदेही तय करना बहुत कठिन हो जाएगा।
DPDP अधिनियम की धारा 44(3) ने RTI की पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। अब व्यक्तिगत जानकारी को लेकर एक 'ब्लैंकेट एग्जेंप्शन' यानी पूर्ण छूट दे दी गई है। इसका मतलब है कि अब व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे के लिए 'जनहित' वाले तर्क को स्पष्ट रूप से किनारे कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस बदलाव के बाद सरकारी अधिकारी किसी भी जानकारी को 'निजी' बताकर देने से मना कर सकते हैं। इससे भ्रष्टाचार की जांच, सरकारी ऑडिट और खरीद-फरोख्त जैसे संवेदनशील मामलों में जवाबदेही तय करना बहुत कठिन हो जाएगा।
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क्या है DPDP एक्ट?
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
क्या है DPDP एक्ट?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 भारत का एक ऐतिहासिक कानून है जो नागरिकों के ऑनलाइन व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करता है। यह कानून कंपनियों और संगठनों द्वारा डेटा के संग्रह, उपयोग और भंडारण के लिए सख्त नियम तय करता है और डेटा के गलत इस्तेमाल पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है।
यह भी पढ़ें: घंटों फोन चलाने की लत से हैं परेशान? ये एप्स छुड़वा देंगे डूमस्क्रॉलिंग की आदत; आज ही करें ट्राई
DPDP एक्ट की मुख्य बातें
संविधान की कसौटी पर नया कानून
मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका में यह घोषित करने की मांग की गई है कि आरटीआई एक्ट की धारा 4 के तहत दी जाने वाली 'स्वैच्छिक जानकारियां' DPDP एक्ट के आने के बाद भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि राज्य संवैधानिक रूप से इस 'पारदर्शिता ढांचे' को बनाए रखने के लिए बाध्य है।
अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के जवाब पर टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला तय करेगा कि भविष्य में एक नागरिक की निजता और सूचना पाने के उसके अधिकार के बीच की लक्ष्मण रेखा कहां खींची जाएगी।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 भारत का एक ऐतिहासिक कानून है जो नागरिकों के ऑनलाइन व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करता है। यह कानून कंपनियों और संगठनों द्वारा डेटा के संग्रह, उपयोग और भंडारण के लिए सख्त नियम तय करता है और डेटा के गलत इस्तेमाल पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है।
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DPDP एक्ट की मुख्य बातें
- इस एक्ट का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के अधिकार और वैध व्यावसायिक कार्यों के बीच संतुलन बनाना।
- कंपनियों को किसी भी भारतीय नागरिक का डेटा लेने से पहले उसकी स्पष्ट और सूचित सहमति लेनी होगी।
- व्यक्तियों को अपने डेटा को सुधारने, मिटाने और डेटा उपयोग की जानकारी मांगने का अधिकार है।
- डेटा एकत्र करने वाली कंपनियों (फिड्यूशरी) को डेटा की सुरक्षा करनी होगी और बच्चों के डेटा का उपयोग नहीं कर सकतीं।
- नियमों का उल्लंघन करने पर डेटा फिड्यूशरी पर ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लग सकता है।
- 2025 के नियमों के अनुसार, सरकार द्वारा अनुमोदित कुछ देशों में डेटा स्थानांतरित करने की अनुमति है।
संविधान की कसौटी पर नया कानून
मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका में यह घोषित करने की मांग की गई है कि आरटीआई एक्ट की धारा 4 के तहत दी जाने वाली 'स्वैच्छिक जानकारियां' DPDP एक्ट के आने के बाद भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि राज्य संवैधानिक रूप से इस 'पारदर्शिता ढांचे' को बनाए रखने के लिए बाध्य है।
अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के जवाब पर टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला तय करेगा कि भविष्य में एक नागरिक की निजता और सूचना पाने के उसके अधिकार के बीच की लक्ष्मण रेखा कहां खींची जाएगी।