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हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: निजी स्कूलों से अतिरिक्त फीस वापसी पर रोक, मान सरकार से मांगा जवाब

Tue, 04 Aug 2026 10:43 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़ Published by: शाहिल शर्मा Updated Tue, 04 Aug 2026 10:43 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने मान सरकार को बड़ा झटका दिया है। फीस बढ़ोतरी की सीमा 8 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने के मामले में नोटिस देकर पंजाब सरकार से जवाब मांगा गया है। 

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High Court seeks response from Mann govt regarding fee hikes by private schools
कोर्ट - फोटो : सांकेतिक तस्वरी

विस्तार

निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी की सीमा 8 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने के लिए पंजाब सरकार की ओर से लाए गए अध्यादेश पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने इस अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिका पर पंजाब सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही अगले आदेश तक निजी स्कूलों से पिछले तीन वर्षों में 5 प्रतिशत से अधिक वसूली गई फीस वापस कराने की कार्रवाई पर रोक लगा दी है।
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यह याचिका फेडरेशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स एंड एसोसिएशन ऑफ पंजाब, रिकॉग्नाइज्ड एफिलिएटेड स्कूल्स एसोसिएशन, इंडिपेंडेंट स्कूल्स एसोसिएशन और प्राइवेट अनएडिड स्कूल्स एसोसिएशन की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने अध्यादेश को वर्ष 2016 और 2019 में लागू कानूनों के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि सरकार शैक्षणिक सत्र 2023-24 से अब तक का पूरा फीस रिकॉर्ड मांग रही है जो नियमों के अनुरूप नहीं है।
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सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया कि अगले आदेश तक तीन साल की अतिरिक्त फीस वापस कराने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसके बाद हाईकोर्ट ने सरकार से मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि जब विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने वाला था तो सरकार को अध्यादेश लाने के बजाय विधेयक पेश करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि मौजूदा विधानसभा का यह अंतिम सत्र है इसके बावजूद सामान्य विधायी प्रक्रिया अपनाने की जगह अध्यादेश का रास्ता चुना गया।
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इस पर हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या इस अध्यादेश को मौजूदा विधानसभा सत्र में विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा। सरकारी वकील ने जवाब दिया कि इसकी संभावना है। अदालत ने कहा कि अध्यादेश सामान्य तौर पर तब जारी किया जाता है जब विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा होता। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि सत्र शुरू होने से पहले अध्यादेश लाने की इतनी जल्दबाजी क्यों की गई।
 
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