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कांग्रेस में फिर घिरे चन्नी: भावुक बयान से बढ़ी सियासी तपिश, कहा था-नहीं सुनी जाएगी आवाज, तो घर बैठ जाऊंगा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 19 Feb 2026 07:49 AM IST
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सार
पंजाब में कांग्रेस पार्टी पहले ही गुटबाजी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। ऐसे में दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा नई बहस को जन्म दे सकता है।
पूर्व सीएम चरणजीत चन्नी
- फोटो : अमर उजाला/फाइल
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विस्तार
पंजाब कांग्रेस की हालिया बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के भावुक बयान ने सूबे की सियासत को एक बार फिर गरमा दिया है।
बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि अगर मेरी ही पार्टी में मेरी बात नहीं सुनी जानी तो मैं राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता हूं। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर चल रही खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है।
चंद दिनों में यह दूसरा मौका है जब चन्नी विरोधी खेमे के निशाने पर नजर आए। इससे पहले संगठन में दलितों को अधिक हिस्सेदारी देने संबंधी उनका एक वीडियो सामने आया था जिसने पार्टी के अंदर और दिल्ली तक हलचल पैदा कर दी थी। वीडियो में उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि दलित समाज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने पर कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
चन्नी स्वयं को गरीब घर का बेटा और दलित समाज की आवाज बताते रहे हैं। मुख्यमंत्री रहते भी उन्होंने सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति का केंद्र बताया था। उनके समर्थक इसे हाशिये के वर्गों की आवाज बुलंद करने का प्रयास मानते हैं, जबकि विरोधियों का आरोप है कि वे जातीय पहचान को राजनीतिक आधार बना रहे हैं।
पार्टी पहले ही गुटबाजी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। ऐसे में दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा नई बहस को जन्म दे सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चन्नी का रुख केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि अपनी प्रासंगिकता और सामाजिक आधार को मजबूत बनाए रखने की रणनीति भी हो सकता है। अब देखना है कि नेतृत्व इस सियासी उबाल को कैसे संभालता है।
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बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि अगर मेरी ही पार्टी में मेरी बात नहीं सुनी जानी तो मैं राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता हूं। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर चल रही खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है।
चंद दिनों में यह दूसरा मौका है जब चन्नी विरोधी खेमे के निशाने पर नजर आए। इससे पहले संगठन में दलितों को अधिक हिस्सेदारी देने संबंधी उनका एक वीडियो सामने आया था जिसने पार्टी के अंदर और दिल्ली तक हलचल पैदा कर दी थी। वीडियो में उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि दलित समाज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने पर कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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चन्नी स्वयं को गरीब घर का बेटा और दलित समाज की आवाज बताते रहे हैं। मुख्यमंत्री रहते भी उन्होंने सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति का केंद्र बताया था। उनके समर्थक इसे हाशिये के वर्गों की आवाज बुलंद करने का प्रयास मानते हैं, जबकि विरोधियों का आरोप है कि वे जातीय पहचान को राजनीतिक आधार बना रहे हैं।
बयान अनुशासनहीनता या आत्मसम्मान की लड़ाई
बैठक में दिए ताजा बयान के बाद कुछ नेताओं ने इसे अनुशासनहीनता बताया तो समर्थकों ने इसे आत्मसम्मान की लड़ाई करार दिया। चन्नी के करीबी नेताओं ने सवाल उठाया है कि यदि यह बात आंतरिक बैठक में कही गई थी तो इसे सार्वजनिक किसने किया। उनका कहना है कि अंदरूनी चर्चा का बाहर आना भी गंभीर विषय है।पार्टी पहले ही गुटबाजी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। ऐसे में दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा नई बहस को जन्म दे सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चन्नी का रुख केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि अपनी प्रासंगिकता और सामाजिक आधार को मजबूत बनाए रखने की रणनीति भी हो सकता है। अब देखना है कि नेतृत्व इस सियासी उबाल को कैसे संभालता है।