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Ajmer News: कुल की रस्म के साथ ख्वाजा साहब की साहिबजादी बीबी हाफिजा का उर्स संपन्न

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर Published by: अजमेर ब्यूरो Updated Fri, 09 Jan 2026 01:53 PM IST
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सार

सूफी संत ख़्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की पुत्री बीबी हाफ़िज़ा का सालाना उर्स श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवायतों के साथ संपन्न हुआ। देश-विदेश से आए अकीदतमंदों ने महफ़िल-ए-समां में भाग लिया। 

The Urs (death anniversary) of Khwaja Sahib's daughter, Bibi Hafiza, concluded with the Qul ceremony.
ख़्वाजा साहब की साहिबज़ादी बीबी हाफ़िज़ा का उर्स सम्पन्न
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सुल्तानपुर में सूफी संत ख़्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की साहिबज़ादी बीबी हाफ़िज़ा का सालाना उर्स शुक्रवार को भव्य श्रद्धा और पारंपरिक रिवायतों के साथ संपन्न हुआ। उर्स के अवसर पर दरगाह क्षेत्र में रूहानियत का माहौल बना रहा, जहां देश-विदेश से आए जायरीन और अकीदतमंदों ने बड़ी संख्या में शिरकत की।

उर्स की शुरुआत गद्दीनशीन सैयद फ़ख़र काज़मी चिश्ती साहब की सदारत में महफ़िल-ए-समाँ के आयोजन से हुई। इस दौरान फ़ारसी, उर्दू और ब्रज भाषा में सूफियाना कलाम प्रस्तुत किए गए। क़व्वालों ने सूफी संतों की शान में मनक़बत और क़लाम गाकर समां बांधा। महफ़िल के अंत में "आज रंग है री माँ, बीबी हाफ़िज़ा जमाल घर रंग है री" की प्रस्तुति पर अकीदतमंद झूम उठे और क़व्वालों ने अपनी अक़ीदत का इज़हार किया।

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इस मौके पर कुल की रस्म भी अदा की गई। दरगाह में दस्तरख़्वान पढ़ा गया और फ़ातेहा ख़्वानी के पश्चात बढ़े पीर की पहाड़ से ग़दरशाह द्वारा तोप चलाई गई। मौरूसी अमले ने शादियाने बजाकर उर्स के समापन की रस्म पूरी की।
 

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अधिवक्ता डॉ. सैयद राग़िब चिश्ती ने बताया कि बीबी हाफ़िज़ा ख़्वाजा साहब की अत्यंत प्रिय बेटी थीं। उनके जन्म के समय ख़्वाजा साहब ने उन्हें अपना लब चखाया था और उन्होंने बचपन में ही क़ुरान पढ़कर सुनाया। इसी कारण उन्हें बीबी हाफ़िज़ा कहा जाने लगा। माना जाता है कि उनकी दुआओं से बेऔलादों को औलाद की नेमत मिलती है। बीबी हाफ़िज़ा ने करीब 850 वर्ष पूर्व हैपी वैली में चिल्ला किया था, जहां आज भी उनका चिल्ला मौजूद है।

बीबी हाफ़िज़ा ने महिलाओं में दीन की तालीम के लिए उल्लेखनीय सेवाएं दीं और घर-घर जाकर महिलाओं को धार्मिक शिक्षा प्रदान की। उर्स के अवसर पर उनके नाम की विशेष नियाज़ लुच्ची-हलवे की अदा की गई। चिश्तिया ख़ानदान और तरिक़त से जुड़े लोग इस परंपरा के तहत अपने-अपने घरों में नियाज़ करवाते हैं। परंपरा के अनुसार ख़्वाजा साहब स्वयं भी अपने पीर-ओ-मुर्शीद के उर्स के बाद अपनी बेटी बीबी हाफ़िज़ा को उर्साने के रूप में तोहफ़ा पेश किया करते थे, जो आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।

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