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दौसा में मार्मिक घटना: बेटे की मौत का सदमा नहीं सह सकीं मां, आधे घंटे बाद तोड़ा दम; एक साथ हुई अंत्येष्टि

Wed, 01 Jul 2026 02:19 PM IST
दौसा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा Published by: दौसा ब्यूरो Updated Wed, 01 Jul 2026 02:19 PM IST
सार

दौसा जिले के कुआं दांगड़ा ढाणी में सड़क हादसे में 46 वर्षीय हरिराम मीणा की मौत हो गई। बेटे की मौत की खबर सुनकर 70 वर्षीय मां कजोड़ी देवी सदमा सहन नहीं कर सकीं और आधे घंटे बाद उनका भी निधन हो गया।

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Mother unable to bear the grief of son's death; breathed her last just half an hour later; their final journey
मृतका काजोड़ी देवी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिले की ग्राम पंचायत कालीखाड़ की कुआं दांगड़ा ढाणी में मां-बेटे के अटूट रिश्ते की ऐसी मार्मिक घटना सामने आई, जिसने पूरे क्षेत्र को गमगीन कर दिया। बेटे की मौत की खबर सुनते ही 70 वर्षीय कजोड़ी देवी को गहरा सदमा लगा और महज आधे घंटे बाद उन्होंने भी दम तोड़ दिया। कुछ ही देर के अंतराल में मां और बेटे की मौत से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। दोनों का एक साथ अंतिम संस्कार किया गया। घर से श्मशान घाट तक निकली संयुक्त शवयात्रा में हर आंख नम थी और हर कोई मां-बेटे के अटूट प्रेम की चर्चा करता नजर आया।

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जानकारी के अनुसार, कुआं दांगड़ा ढाणी निवासी 46 वर्षीय हरिराम मीणा सोमवार शाम करीब 8 बजे दौसा से स्कूटी पर अपने गांव लौट रहे थे। इसी दौरान ठीकरिया मोड़ के पास किसी अज्ञात वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल दौसा जिला अस्पताल ले जाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर हालत को देखते हुए जयपुर के एसएमएस अस्पताल रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। मंगलवार सुबह जब हरिराम की मौत की सूचना उनकी मां कजोड़ी देवी को दी गई तो वे यह आघात सहन नहीं कर सकीं। बेटे के निधन का दुख उनके लिए असहनीय साबित हुआ और करीब आधे घंटे बाद उन्होंने भी अंतिम सांस ले ली।

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पहले भी झेल चुकी थीं पुत्र वियोग
ग्रामीणों के अनुसार, कजोड़ी देवी पहले भी पुत्र वियोग का दर्द झेल चुकी थीं। उनके चार बेटों में से हरिराम दूसरे नंबर पर थे। तीसरे नंबर के बेटे हीरालाल की वर्ष 2001 में मात्र 20 वर्ष की आयु में असामयिक मृत्यु हो गई थी। वर्षों पुराना वह घाव अभी पूरी तरह भरा भी नहीं था कि दूसरे बेटे की मौत ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया।
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हरिराम एक हाथ से दिव्यांग थे, लेकिन मेहनत-मजदूरी कर अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रहे थे। उनकी इच्छा थी कि बच्चे पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी करें। उनकी बेटियों को अच्छे अंक लाने पर सरकार की ओर से स्कूटी भी मिली थी। परिवार की आजीविका मुख्य रूप से खेती-बाड़ी पर निर्भर है और आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं है।

हरिराम का पार्थिव शरीर गांव पहुंचने का इंतजार किया जा रहा था। अंतिम संस्कार की तैयारियों के बीच जैसे ही उनकी मां के निधन की खबर फैली, पूरे गांव में मातम छा गया। हरिराम का शव गांव पहुंचते ही उनकी पत्नी, बेटियां, इकलौते बेटे और भाई बिलख पड़े। मां और बेटे की संयुक्त अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण और आसपास के लोग शामिल हुए तथा शोकाकुल परिवार को सांत्वना दी।

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