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पंचायत चुनाव की रणभेरी: अब गांव-गांव घमासान; जानिए बीजेपी-कांग्रेस कितने तैयार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Sat, 23 May 2026 03:39 PM IST
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सार
पंचायत चुनाव की रणभेरी बजते ही राजस्थान में गांव-गांव सियासी घमासान तेज हो गया है। बीजेपी संगठन और सरकारी योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है, जबकि कांग्रेस किसान, बेरोजगारी और स्थानीय मुद्दों पर सरकार को घेर रही है-
पंचायत व निकाय चुनाव
- फोटो : AI
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विस्तार
राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा 31 जुलाई 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश के बाद प्रदेश की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में आ गई है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव 2028 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल होगा। इन चुनावों के नतीजे आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़ा नरेटिव सेट करने वाले होंगे।
सत्ताधारी बीजेपी सरकार भले ही कोर्ट में चुनाव टालने की दलीलें दे रही थी लेकिन जमीन पर वह चुनावी मौड में आ चुकी है। बीजेपी ने ग्रामीण मतदाताओं की नब्ज टटटने और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए 'ग्राम रथ अभियान' जैसे सघन जनसंपर्क कार्यक्रमों की शुरुआत की है। सीएम भजनलाल शर्मा बीते एक महीने से प्रदेश के 7 जिलों में रात्रि चौपाल लगा चुके हैं। वे गांवों में में पूरा दिन बिता कर रात्रि विश्राम भी वहीं कर रहे हैं। इसके साथ ही गांवों में जनसुनवाई भी कर रहे हैं। छोटी-मोटी समस्या हो या तबादले सब हाथों-हाथ निपटा रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस की बात करें वह प्रदेश में आंदोलनों का माहौल तैयार कर हरी है ताकि प्रदेश में सरकार के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का फायदा इन चुनावों में उसे मिल सके।
यह भी पढें- राजस्थान में बजा चुनावी बिगुल! हाईकोर्ट की हरी झंडी के बाद गांव-गांव पहुंचे सीएम, ग्रामीणों के साथ किया भोजन
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टिकट चयन सबसे बड़ी चुनौती
दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण को लेकर रहेगी। पंचायत और निकाय चुनावों में स्थानीय गुटबाजी अक्सर खुलकर सामने आती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों इस बार “जीताऊ उम्मीदवार” के फार्मूले पर जोर दे सकती हैं।
ओबीसी आरक्षण और परिसीमन पर नजर
चुनाव की तैयारियों के बीच ओबीसी आरक्षण और वार्ड परिसीमन भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। दोनों दल इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि नई आरक्षण व्यवस्था और सीमांकन किस क्षेत्र में किस पार्टी को फायदा या नुकसान पहुंचा सकता है।
क्यों अहम हैं ये चुनाव?
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव केवल स्थानीय सरकार चुनने तक सीमित नहीं रहते। इन्हें ग्रामीण और शहरी जनमत का संकेत माना जाता है। सत्ताधारी बीजेपी ने लिए इन चुनावों के नतीजे कई मायनों में अहम रहने वाले हैं। राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियों से लेकर मंत्रिमंडल विस्तार तक होना है। जिन इलाकों में नतीजे पक्ष में रहेंगे वहां स्थानीय स्तर पर राजनीतिक नियुक्तियों की दावेदारी मजबूत होगी। यही नहीं इन चुनावों में जो प्रत्याशी जीतकर निकाय और पंचायतों में पहुंचेंगे वे आने वाले समय में विधानसभा और लोकसभा में टिकट के मजबूत दावेदार भी होंगे।
बीजेपी के लिए ढाई साल का फीडबैक
बीजेपी के लिए यह सरकार के कामकाज की पहली बड़ी परीक्षा होगी। प्रदेश में अब तक ढाई वर्षों में पार्टी ने जिन कामों का दावा किया वह जनता को कितने पसंद आए और मौजूदा शासन तंत्र पर उसका कितना भरोसा है यह नतीजे तय करेंगे। कांग्रेस के लिए यह संगठन को फिर से मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का मौका होगा।
बीजेपी का प्लस प्वाइंट यह है कि वह सत्ता में है और लोगों के काम करवा सकती है। इस बात का फायदा हमेशा सत्ताधारी दल को मिलता है। लेकिन यही नकारात्मक बिंदू भी हो जाता है क्योंकि सत्ता में ढाई साल से जिन लोगों के काम नहीं हुए वे इन मौकों को अपनी नाराजगी निकालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। बीजेपी इन चुनावों से पहले अपने संगठन को भी मजबूत करने में जुटी है। गुरुवार देर रात पार्टी ने युवा मोर्चा की जंबो लिस्ट निकाली है। इससे पहले ही संगठन में मोर्चों के खाली पदों को भरा गया था।
कांग्रेस की तैयारी कितनी: कांग्रेस अपने संगठनात्मक धड़े को मजबूत करने में जुटी है। प्रदेश में अभी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर कांग्रेस सरकार को घेरने का काम कर सकती है। प्रदेश में पेपर लीक, महंगाई, पानी-बिजली, शिक्षा-स्वास्थ्य, खेती-किसानी जैसे मुद्दे सरकार के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को कितना भुना पाती है इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा।
सत्ताधारी बीजेपी सरकार भले ही कोर्ट में चुनाव टालने की दलीलें दे रही थी लेकिन जमीन पर वह चुनावी मौड में आ चुकी है। बीजेपी ने ग्रामीण मतदाताओं की नब्ज टटटने और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए 'ग्राम रथ अभियान' जैसे सघन जनसंपर्क कार्यक्रमों की शुरुआत की है। सीएम भजनलाल शर्मा बीते एक महीने से प्रदेश के 7 जिलों में रात्रि चौपाल लगा चुके हैं। वे गांवों में में पूरा दिन बिता कर रात्रि विश्राम भी वहीं कर रहे हैं। इसके साथ ही गांवों में जनसुनवाई भी कर रहे हैं। छोटी-मोटी समस्या हो या तबादले सब हाथों-हाथ निपटा रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस की बात करें वह प्रदेश में आंदोलनों का माहौल तैयार कर हरी है ताकि प्रदेश में सरकार के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का फायदा इन चुनावों में उसे मिल सके।
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टिकट चयन सबसे बड़ी चुनौती
दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण को लेकर रहेगी। पंचायत और निकाय चुनावों में स्थानीय गुटबाजी अक्सर खुलकर सामने आती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों इस बार “जीताऊ उम्मीदवार” के फार्मूले पर जोर दे सकती हैं।
ओबीसी आरक्षण और परिसीमन पर नजर
चुनाव की तैयारियों के बीच ओबीसी आरक्षण और वार्ड परिसीमन भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। दोनों दल इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि नई आरक्षण व्यवस्था और सीमांकन किस क्षेत्र में किस पार्टी को फायदा या नुकसान पहुंचा सकता है।
क्यों अहम हैं ये चुनाव?
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव केवल स्थानीय सरकार चुनने तक सीमित नहीं रहते। इन्हें ग्रामीण और शहरी जनमत का संकेत माना जाता है। सत्ताधारी बीजेपी ने लिए इन चुनावों के नतीजे कई मायनों में अहम रहने वाले हैं। राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियों से लेकर मंत्रिमंडल विस्तार तक होना है। जिन इलाकों में नतीजे पक्ष में रहेंगे वहां स्थानीय स्तर पर राजनीतिक नियुक्तियों की दावेदारी मजबूत होगी। यही नहीं इन चुनावों में जो प्रत्याशी जीतकर निकाय और पंचायतों में पहुंचेंगे वे आने वाले समय में विधानसभा और लोकसभा में टिकट के मजबूत दावेदार भी होंगे।
बीजेपी के लिए ढाई साल का फीडबैक
बीजेपी के लिए यह सरकार के कामकाज की पहली बड़ी परीक्षा होगी। प्रदेश में अब तक ढाई वर्षों में पार्टी ने जिन कामों का दावा किया वह जनता को कितने पसंद आए और मौजूदा शासन तंत्र पर उसका कितना भरोसा है यह नतीजे तय करेंगे। कांग्रेस के लिए यह संगठन को फिर से मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का मौका होगा।
बीजेपी का प्लस प्वाइंट यह है कि वह सत्ता में है और लोगों के काम करवा सकती है। इस बात का फायदा हमेशा सत्ताधारी दल को मिलता है। लेकिन यही नकारात्मक बिंदू भी हो जाता है क्योंकि सत्ता में ढाई साल से जिन लोगों के काम नहीं हुए वे इन मौकों को अपनी नाराजगी निकालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। बीजेपी इन चुनावों से पहले अपने संगठन को भी मजबूत करने में जुटी है। गुरुवार देर रात पार्टी ने युवा मोर्चा की जंबो लिस्ट निकाली है। इससे पहले ही संगठन में मोर्चों के खाली पदों को भरा गया था।
कांग्रेस की तैयारी कितनी: कांग्रेस अपने संगठनात्मक धड़े को मजबूत करने में जुटी है। प्रदेश में अभी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर कांग्रेस सरकार को घेरने का काम कर सकती है। प्रदेश में पेपर लीक, महंगाई, पानी-बिजली, शिक्षा-स्वास्थ्य, खेती-किसानी जैसे मुद्दे सरकार के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को कितना भुना पाती है इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा।