राजस्थान सरकार का बड़ा फैसला: सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ और स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता
राजस्थान सरकार ने सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ और स्थानीय एमएसएमई को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। नई नीति से स्थानीय उद्योगों, निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।
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राजस्थान सरकार ने सरकारी खरीद (पब्लिक प्रोक्योरमेंट) में देश में निर्मित उत्पादों और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। वित्त विभाग ने नया परिपत्र जारी कर सभी सरकारी विभागों, स्वायत्तशासी संस्थाओं और स्थानीय निकायों को निर्देश दिए हैं कि सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ उत्पादों और राजस्थान की सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों (MSEs) को प्राथमिकता दी जाए। राज्य सरकार ने इस साल बजट में इसका ऐलान किया था। यह व्यवस्था 18 जुलाई 2025 से प्रभावी होगी।
राजस्थान की MSE इकाइयों को मिलेगा बड़ा फायदा
नए प्रावधानों के अनुसार यदि किसी निविदा में राजस्थान की सूक्ष्म एवं लघु इकाई (MSE) सबसे कम दर (L-1) पर आती है तो उसे 100 प्रतिशत कार्यादेश दिया जाएगा।
यदि L-1 बोलीदाता राज्य से बाहर की स्थानीय श्रेणी का होगा, तो उसे केवल 20 प्रतिशत कार्य मिलेगा, जबकि शेष 80 प्रतिशत खरीद राजस्थान की MSE इकाइयों को प्राथमिकता के आधार पर दी जाएगी। इसी तरह अन्य श्रेणियों में भी खरीद का एक बड़ा हिस्सा राजस्थान की स्थानीय इकाइयों के लिए आरक्षित रखा गया है।
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20 प्रतिशत तक अधिक दर होने पर भी मिलेगा मौका
सरकार ने स्थानीय उत्पादकों को खरीद वरीयता (Purchase Preference) देने का भी प्रावधान किया है। इसके तहत ऐसे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को अवसर मिलेगा जो L-1 की दर से अधिकतम 20 प्रतिशत तक की सीमा में बोली लगाएंगे और L-1 दर का मिलान करने को तैयार होंगे।
‘लोकल कंटेंट’ के लिए 50 प्रतिशत की शर्त
नई नीति में किसी उत्पाद को स्थानीय मानने के लिए कम से कम 50 प्रतिशत स्थानीय मूल्य संवर्धन अनिवार्य किया गया है। केवल री-पैक, री-ब्रांडिंग या आयातित उत्पादों की मरम्मत को स्थानीय उत्पादन नहीं माना जाएगा।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि विदेशी स्वामित्व वाली कंपनियां भी यदि निर्धारित स्थानीय मूल्य संवर्धन करती हैं तो स्थानीय आपूर्तिकर्ता की श्रेणी में आ सकेंगी।
झूठे दावे पर दो साल तक डिबार
स्थानीय सामग्री को लेकर गलत घोषणा या फर्जी प्रमाण पत्र देने वाले आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में संबंधित फर्म को दो वर्ष तक के लिए सरकारी खरीद प्रक्रियाओं से डिबार (प्रतिबंधित) किया जा सकेगा। 10 करोड़ रुपए से अधिक की खरीद में स्थानीय सामग्री के दावे का प्रमाण चार्टर्ड अकाउंटेंट या वैधानिक ऑडिटर से सत्यापित कराना अनिवार्य होगा।
टेंडर शर्तों में विदेशी कंपनियों के पक्ष में भेदभाव नहीं
वित्त विभाग ने सभी खरीद एजेंसियों को निर्देश दिया है कि टेंडर दस्तावेजों में ऐसी तकनीकी शर्तें, विदेशी प्रमाणन या ब्रांड आधारित प्रावधान नहीं रखे जाएं, जिनसे स्थानीय कंपनियां अनावश्यक रूप से बाहर हो जाएं। भारतीय मानकों की उपलब्धता होने पर उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी।
5 लाख रुपये तक की खरीद पर लागू नहीं
परिपत्र में स्पष्ट किया गया है कि 5 लाख रुपये से कम मूल्य की छोटी खरीद पर ये प्रावधान लागू नहीं होंगे। नई व्यवस्था से राजस्थान की सूक्ष्म, लघु और स्थानीय विनिर्माण इकाइयों को सरकारी खरीद में बड़ा अवसर मिलेगा। सरकार का मानना है कि इससे राज्य में निवेश, उत्पादन, रोजगार और स्थानीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी, साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी मजबूती मिलेगी।