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Jaipur: 'दोष सिद्ध होने से पहले हर किसी को जमानत का अधिकार', JLF में बोले- पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sun, 18 Jan 2026 07:29 PM IST
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सार
Jaipur: पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। यहां उन्होंने उमर खालिद की जमानत से जुड़े एक सवाल के जवाब में कहा कि कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं होता है जब तक उसका दोष सिद्ध न हो जाए।
पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने कहा कि दोष सिद्धि से पहले जमानत एक मौलिक अधिकार होना चाहिए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालत का कर्तव्य है कि वह जमानत देने से पहले मामले की गहन जांच करे।
दोषसिद्धि तक कोई दोषी नहीं: चंद्रचूड़
वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने जब उनसे उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने पर सवाल किया तो चंद्रचूड़ ने कहा, 'हमारा कानून निर्दोषिता की धारणाओं पर आधारित है। कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं माना जाएगा जब तक उसकी दोषसिद्धि न हो।' उन्होंने आगे कहा, 'यदि कोई व्यक्ति पांच या सात साल तक जेल में रहे और बाद में निर्दोष साबित हो जाए, तो उसके खोए हुए समय की भरपाई कैसे की जाएगी?'
किन परिस्थितियों में रोकी जा सकती है जमानत
पूर्व CJI ने बताया कि जमानत केवल तब रोकी जा सकती है जब आरोपित फिर से अपराध करने का जोखिम हो। सबूतों में छेड़छाड़ का खतरा हो या जमानत का फायदा उठाकर कानून से बचने की संभावना हो। यदि ये तीनों शर्तें मौजूद नहीं हैं, तो जमानत अवश्य दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालत की जिम्मेदारी है कि वह मामले की गहन जांच करे। चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि जिला और सत्र न्यायालयों द्वारा जमानत अस्वीकार करना चिंता का विषय है, क्योंकि न्यायाधीश डरते हैं कि उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ सकता है। यही कारण है कि जमानत के मामले अक्सर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं।
सुनवाई में देरी पर भी उठाया सवाल
पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मामलों के लंबित रहने और सुनवाई में देरी पर चिंता व्यक्त की जानी चाहिए। उनका कहना था कि संविधान सर्वोच्च कानून है और इसमें कोई अपवाद नहीं है। यदि तेज़ी से सुनवाई में देरी होती है, तो आरोपी को जमानत मिलने का अधिकार है।
ये भी पढ़ें: राजस्थान ने स्कूल नेशनल हॉकी में जीता स्वर्ण पदक, फाइनल में उड़ीसा को 3-2 से हराया
कॉलिजियम में इन लोगों को शामिल करने का दिया सुझाव
पूर्व CJI ने यह सुझाव भी दिया कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए चयन मंडल (कॉलिजियम) में समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को शामिल किया जाए, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता आए और न्यायपालिका में जनता का विश्वास मजबूत हो। वहीं, रिटायरमेंट के बाद किसी पद को स्वीकार न करने के सवाल पर चंद्रचूड़ ने कहा कि वर्तमान में वह निजी जीवन का आनंद ले रहे हैं।
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वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने जब उनसे उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने पर सवाल किया तो चंद्रचूड़ ने कहा, 'हमारा कानून निर्दोषिता की धारणाओं पर आधारित है। कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं माना जाएगा जब तक उसकी दोषसिद्धि न हो।' उन्होंने आगे कहा, 'यदि कोई व्यक्ति पांच या सात साल तक जेल में रहे और बाद में निर्दोष साबित हो जाए, तो उसके खोए हुए समय की भरपाई कैसे की जाएगी?'
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किन परिस्थितियों में रोकी जा सकती है जमानत
पूर्व CJI ने बताया कि जमानत केवल तब रोकी जा सकती है जब आरोपित फिर से अपराध करने का जोखिम हो। सबूतों में छेड़छाड़ का खतरा हो या जमानत का फायदा उठाकर कानून से बचने की संभावना हो। यदि ये तीनों शर्तें मौजूद नहीं हैं, तो जमानत अवश्य दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालत की जिम्मेदारी है कि वह मामले की गहन जांच करे। चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि जिला और सत्र न्यायालयों द्वारा जमानत अस्वीकार करना चिंता का विषय है, क्योंकि न्यायाधीश डरते हैं कि उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ सकता है। यही कारण है कि जमानत के मामले अक्सर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं।
सुनवाई में देरी पर भी उठाया सवाल
पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मामलों के लंबित रहने और सुनवाई में देरी पर चिंता व्यक्त की जानी चाहिए। उनका कहना था कि संविधान सर्वोच्च कानून है और इसमें कोई अपवाद नहीं है। यदि तेज़ी से सुनवाई में देरी होती है, तो आरोपी को जमानत मिलने का अधिकार है।
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कॉलिजियम में इन लोगों को शामिल करने का दिया सुझाव
पूर्व CJI ने यह सुझाव भी दिया कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए चयन मंडल (कॉलिजियम) में समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को शामिल किया जाए, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता आए और न्यायपालिका में जनता का विश्वास मजबूत हो। वहीं, रिटायरमेंट के बाद किसी पद को स्वीकार न करने के सवाल पर चंद्रचूड़ ने कहा कि वर्तमान में वह निजी जीवन का आनंद ले रहे हैं।