Rajasthan News: UCC से मजार-मस्जिद तक; क्या राजस्थान में चुनाव से पहले BJP ने छेड़ दी ध्रुवीकरण की राजनीति?
राजस्थान में UCC, मस्जिद-मजार विवाद और सीमावर्ती धार्मिक ढांचों पर कार्रवाई के बीच भाजपा वैचारिक मुद्दों को धार देती दिख रही है, जबकि कांग्रेस रोजगार, शिक्षा और युवाओं के सवालों पर जवाबी नैरेटिव गढ़ रही है।
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राजस्थान में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपने-अपने चुनावी नैरेटिव गढ़ने शुरू कर दिए हैं। एक ओर कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में शिक्षा, पेपर लीक, बेरोजगारी, युवाओं और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लेकर मैदान में उतर रही है, वहीं भाजपा समान नागरिक संहिता (UCC), सीमावर्ती सुरक्षा, अवैध धार्मिक निर्माणों पर कार्रवाई और वैचारिक मुद्दों को प्रमुखता से आगे बढ़ा रही है।
राज्य सरकार ने हाल ही में राजस्थान में UCC का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान किया है। इसके साथ ही जैसलमेर और बाड़मेर के सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा से 50 किलोमीटर दायरे के भीतर मस्जिदों, मजारों और अन्य धार्मिक ढांचों पर हुई प्रशासनिक कार्रवाई भी राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ये घटनाएं अलग-अलग दिख सकती हैं, लेकिन चुनावी दृष्टि से इनके संदेश काफी व्यापक हैं।
वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा के अनुसार UCC, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध धार्मिक निर्माणों पर कार्रवाई और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट करने की रणनीति का हिस्सा माने जा सकते हैं। उनका कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह की कार्रवाई केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी चल रही है। हालांकि राजस्थान में यह मुद्दा धार्मिक रंग इसलिए ले लेता है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सीमा क्षेत्रों में धार्मिक स्थलों का निर्माण तेजी से बढ़ा है और इस संबंध में गृह विभाग की रिपोर्टें भी सामने आती रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान सीमा से लगे जैसलमेर और बाड़मेर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण ऐसे मुद्दे राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील बन जाते हैं। हालांकि भाजपा को इन कार्रवाइयों का राजनीतिक लाभ उसके कोर समर्थक वर्ग में मिलता दिखाई देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि UCC भाजपा के वैचारिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और यह मुद्दा स्वाभाविक रूप से उसके समर्थक वर्ग को आकर्षित करता है। हालांकि राजस्थान में उत्तर प्रदेश या बिहार जैसी तीव्र धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति देखने को नहीं मिलती। यहां जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और विकास के मुद्दे अक्सर ज्यादा प्रभावी रहते हैं। इसके बावजूद शहरी क्षेत्रों और भाजपा के प्रभाव वाले इलाकों में UCC, राष्ट्रवाद और धार्मिक पहचान जैसे मुद्दे पार्टी को अतिरिक्त राजनीतिक बढ़त दे सकते हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस ने राहुल गांधी के कोटा कार्यक्रम के बाद युवाओं और विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर अपनी रणनीति तेज कर दी है। पार्टी शिक्षा व्यवस्था, रोजगार, पेपर लीक और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का मानना है कि युवाओं के सामने भविष्य और रोजगार सबसे बड़ा सवाल है और यही मुद्दे आगामी राजनीतिक विमर्श का आधार बन सकते हैं।
कुल मिलाकर राजस्थान में चुनावी मुकाबला अभी दूर जरूर है, लेकिन राजनीतिक एजेंडा तय करने की जंग शुरू हो चुकी है। एक तरफ भाजपा वैचारिक और पहचान आधारित मुद्दों पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस युवाओं और आर्थिक-सामाजिक सवालों को केंद्र में रखकर अपनी जमीन तलाश रही है।