ट्रिपल टेस्ट पर टकराव: जानिए सरकार क्यों कह रही- राजस्थान का मामला मध्यप्रदेश से अलग
पंचायत और निकाय चुनावों में देरी को लेकर राज्य सरकार ने जिस ट्रिपल टेस्ट को आधार बनाया है। उसे लेकर अब घमसान छिड़ना तय है। हाईकोर्ट इस ट्रिपल टेस्ट की अग्निपरीक्षा लेगा।
ऐसे में यह जानना महत्वपर्ण है कि आखिर ट्रिपल टेस्ट है क्या और राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनावों में देरी को लेकर राज्य सरकार यह क्यों कह रही है कि राजस्थान का मामला मध्यप्रदेश से अलग है।
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विस्तार
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों में देरी का विवाद अब पूरी तरह 'ट्रिपल टेस्ट' के इर्द-गिर्द सिमट गया है। राज्य सरकार इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनिवार्य हिस्सा मान रही है, जबकि याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी की आड़ में चुनाव टाले जा रहे हैं। हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच यह समझना जरूरी है कि ट्रिपल टेस्ट क्या है, राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट के मध्यप्रदेश वाले फैसले को यहां लागू क्यों नहीं मान रही है और इस मुद्दे पर अब तक सरकारी विभागों के बीच क्या बातचीत हुई है।
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों में देरी का विवाद अब पूरी तरह 'ट्रिपल टेस्ट' के इर्द-गिर्द सिमट गया है। राज्य सरकार इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनिवार्य हिस्सा मान रही है, जबकि याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी की आड़ में चुनाव टाले जा रहे हैं। हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच यह समझना जरूरी है कि ट्रिपल टेस्ट क्या है, राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट के मध्यप्रदेश वाले फैसले को यहां लागू क्यों नहीं मान रही है और इस मुद्दे पर अब तक सरकारी विभागों के बीच क्या संवाद हुआ है।
क्या होता है ट्रिपल टेस्ट?
स्थानीय निकायों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को राजनीतिक आरक्षण देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 'विकास किशनराव गावली बनाम महाराष्ट्र राज्य' (2021) मामले में तीन अनिवार्य शर्तें तय की थीं। इन्हें ही ट्रिपल टेस्ट कहा जाता है।
1. समर्पित आयोग का गठन
राज्य सरकार को ऐसा स्वतंत्र आयोग गठित करना होता है जो स्थानीय निकायों में ओबीसी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अध्ययन करे।
2. अनुभवजन्य डेटा जुटाना
आयोग विस्तृत सर्वे कर मात्रात्मक एवं प्रामाणिक आंकड़े एकत्र करता है ताकि यह तय किया जा सके कि किन क्षेत्रों में ओबीसी आरक्षण की वास्तविक आवश्यकता है और उसका अनुपात कितना होना चाहिए।
3. 50 प्रतिशत की सीमा का पालन
आयोग की सिफारिशों के आधार पर आरक्षण तय किया जाता है, लेकिन एससी, एसटी और ओबीसी का कुल आरक्षण किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
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राजस्थान में क्या स्थिति है?
राजस्थान सरकार ने ट्रिपल टेस्ट पूरा करने के लिए राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग का गठन किया है। आयोग प्रदेशभर में सर्वे और डेटा संग्रह की प्रक्रिया चला रहा है। सरकार का कहना है कि आयोग की रिपोर्ट के बाद ही ओबीसी आरक्षण का अंतिम निर्धारण होगा और उसी आधार पर पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव कराए जाएंगे।
उधर, हाईकोर्ट में लंबित अवमानना याचिका में यह सवाल प्रमुख बन गया है कि क्या ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी होने तक चुनाव रोके जा सकते हैं या फिर उपलब्ध व्यवस्था के आधार पर चुनाव कराए जाने चाहिए। यही कानूनी विवाद फिलहाल राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों की सबसे बड़ी वजह बन गया है।
ट्रिपल टेस्ट की अनिवार्यता को लेकर राज्य सरकार का तर्क
राज्य सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग को भेजे पत्र में स्पष्ट किया है कि राजस्थान का मामला मध्यप्रदेश से अलग है। सरकार ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के 'सुरेश महाजन बनाम मध्यप्रदेश राज्य' मामले में दिया गया अंतरिम आदेश उन राज्यों पर लागू होता है जहां ओबीसी आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। जबकि राजस्थान में राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग का गठन किया जा चुका है और आयोग ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी कर रहा है। इसलिए राजस्थान की परिस्थितियां अलग हैं।
सरकार के अनुसार आयोग द्वारा सर्वे और डेटा संग्रह की प्रक्रिया जारी है तथा इसी आधार पर स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण तय किया जाएगा।
याचिकाकर्ता का दावा- ट्रिपल टेस्ट बहाना, चुनाव टालने की कोशिश
दूसरी ओर, हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने वाले संयम लोढ़ा का कहना है कि सरकार ट्रिपल टेस्ट का गलत अर्थ निकाल रही है। उनका तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहीं भी यह नहीं कहा कि आयोग की रिपोर्ट आने तक चुनाव अनिश्चितकाल के लिए टाल दिए जाएं। लोढ़ा का कहना है कि यदि आयोग की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं होती है तो राज्य पहले से लागू ओबीसी आरक्षण व्यवस्था या उपलब्ध कानूनी ढांचे के आधार पर भी चुनाव करा सकता है। उनका आरोप है कि सरकार ट्रिपल टेस्ट का हवाला देकर हाईकोर्ट के आदेशों की पालना नहीं कर रही।