कितने अमीर हैं राजस्थान के मंदिर?: करोड़ों की आय, हजारों संपत्तियां और बहुमूल्य आभूषण; जानकर चौंक जाएंगे आप
राजस्थान देवस्थान विभाग के अधीन 2,327 किराया योग्य परिसंपत्तियां हैं, जिनमें 2,126 किराये पर और 201 खाली हैं। इन संपत्तियों से विभाग को हर वर्ष करीब 9.23 करोड़ रुपये का किराया प्राप्त होता है, जो मंदिरों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है।
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अरबों रुपये के बहुमूल्य जवाहरात, हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये का चढ़ावा और हजारों करोड़ की संपत्तियां। यह केवल राजस्थान के मंदिरों की आय का आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रदेश की "आस्था की अर्थव्यवस्था" की तस्वीर है। हाल में दान राशि को लेकर उठे विवादों के बीच यह समझना जरूरी हो गया है कि राजस्थान के मंदिर कितनी बड़ी आर्थिक परिसंपत्तियों का संचालन करते हैं।
अयोध्या के राम मंदिर में चंदे में कथित गड़बड़ी के आरोपों और राजस्थान के बुटाटी धाम तथा भरतपुर के एक मंदिर में दान राशि को लेकर सामने आई शिकायतों के बाद धार्मिक संस्थानों की वित्तीय पारदर्शिता, सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही पर सवाल खड़े हुए हैं।
राजस्थान के देवस्थान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि एक बड़े आर्थिक तंत्र का हिस्सा भी हैं। विभाग के अधीन मंदिरों के पास हजारों संपत्तियां हैं, जिनसे हर साल करोड़ों रुपये की आय होती है। मंदिरों के पास हजारों बहुमूल्य आभूषण हैं और उनकी भूमि से खनन लीज के माध्यम से भी नियमित राजस्व प्राप्त होता है।
देवस्थान विभाग के अनुसार राजस्थान और राज्य के बाहर मिलाकर विभाग के अधीन कुल 2,327 किराया योग्य परिसंपत्तियां हैं। इनमें 634 आवासीय, 1,649 व्यावसायिक और 44 अन्य श्रेणी की संपत्तियां शामिल हैं। इनमें से 2,126 संपत्तियां किराये पर हैं, जबकि 201 खाली हैं। इनसे विभाग को हर साल करीब 9.23 करोड़ रुपये का निर्धारित किराया प्राप्त होता है। प्रदेश में ही विभाग के अधीन 2,136 किराया योग्य संपत्तियां हैं। इनमें 1,940 आवंटित और 196 खाली हैं। इनसे सालाना 8.92 करोड़ रुपये का किराया मिलता है। सबसे अधिक आय जयपुर संभाग से करीब 3.93 करोड़ रुपये, जोधपुर से 2.02 करोड़ रुपये और उदयपुर से 1.33 करोड़ रुपये प्राप्त होती है।
राजस्थान के बाहर भी संपत्तियां
देवस्थान विभाग की आर्थिक पहुंच राजस्थान तक सीमित नहीं है। विभाग के पास मथुरा, वाराणसी, हरिद्वार, उत्तरकाशी और द्वारका में भी कुल 191 किराया योग्य परिसंपत्तियां हैं। इनमें से 186 किराये पर हैं और इनसे हर साल करीब 31 लाख रुपये का किराया प्राप्त होता है। अकेले मथुरा की संपत्तियों से लगभग 30.73 लाख रुपये की वार्षिक आय होती है।
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खनन लीज से भी आय
मंदिरों की आय केवल किराये तक सीमित नहीं है। विभाग के अधीन मंदिरों की भूमि पर वर्ष 2024-25 में 55 खनन लीज संचालित थीं। कोटा के श्री द्वारिकाधीश मंदिर, उदयपुर के श्री ठाकुरजी श्याम सुंदरजी मंदिर और श्री ऋषभदेवजी मंदिर की भूमि पर संचालित इन लीज से दिसंबर 2025 तक करीब 13 लाख रुपये की आय हुई।
21 हजार से अधिक बहुमूल्य आभूषण
देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार 31 दिसंबर 2024 तक विभाग के अधीन मंदिरों में 21,165 बहुमूल्य आभूषण दर्ज थे। वर्ष 2025 में श्रद्धालुओं द्वारा 59 नए बहुमूल्य आभूषण भेंट किए जाने के बाद इनकी संख्या बढ़कर 21,224 हो गई।
13 हजार से ज्यादा धर्मार्थ ट्रस्ट
राजस्थान में देवस्थान विभाग के अंतर्गत 13 हजार से अधिक धर्मार्थ ट्रस्ट पंजीकृत हैं। इनमें 165 प्रमुख मंदिर ट्रस्ट ऐसे हैं, जिनकी वार्षिक आय एक लाख रुपये से अधिक है। हालांकि कई मंदिरों की आय करोड़ों रुपये तक पहुंच चुकी है। संवलिया सेठ मंदिर की वार्षिक आय पिछले वर्ष 337 करोड़ रुपये रही। इसके अलावा गोविंद देवजी मंदिर, कैलादेवी मंदिर, मेहंदीपुर बालाजी, मोतीडूंगरी गणेश मंदिर, डिग्गी कल्याणजी और अन्य प्रमुख मंदिर भी करोड़ों रुपये के चढ़ावे और आय वाले धार्मिक संस्थानों में शामिल हैं।
प्रमुख मंदिरों की वार्षिक आय
देवस्थान विभाग के अनुसार प्रमुख मंदिरों की वार्षिक आय इस प्रकार है—
- सांवलिया सेठमंदिर : 337 करोड़ रुपये
- गोविंद देवजी मंदिर : 2.33 करोड़ रुपये
- कैलादेवी मंदिर : 1.85 करोड़ रुपये
- मेहंदीपुर बालाजी मंदिर : 1.76 करोड़ रुपये
- मोतीडूंगरी गणेश मंदिर : 1.16 करोड़ रुपये
- द्वारिकाधीश मंदिर (राजसमंद) : 92.78 लाख रुपये
- श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर : 92.33 लाख रुपये
- मथुरानाथजी मंदिर (राजसमंद) : 75.68 लाख रुपये
- चौथ माता मंदिर : 62.95 लाख रुपये
- खाटूश्याम मंदिर : 62.43 लाख रुपये
- शिलामाता मंदिर : 20.68 लाख रुपये
- डिग्गी कल्याणजी मंदिर : 18.70 लाख रुपये
- रणथंभौर गणेश मंदिर : 16.59 लाख रुपये
- ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर : 5.28 लाख रुपये
ये आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में श्रद्धालुओं के दान और अन्य स्रोतों से हर वर्ष बड़ी मात्रा में आर्थिक गतिविधियां संचालित होती हैं।
विनोद शास्त्री, पूर्व कुलपति, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय ने कहा कि यदि मंदिरों की व्यवस्थाओं की जांच की जाए तो लगभग हर मंदिर में कुछ न कुछ अनियमितता सामने आ सकती है। उनका कहना है कि देवस्थान विभाग के मंदिरों में पुजारियों को बेहद कम मानदेय मिलता है, जिससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। उनका मानना है कि पुजारियों को सम्मानजनक वेतन मिलना चाहिए।