Rajasthani Language News: राजस्थानी भाषा की लड़ाई अधूरी, विश्वविद्यालयों में मराठी पर सियासत
राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी अध्ययन केंद्र खोलने के निर्देश के बाद नई बहस छिड़ गई है। राजस्थानी भाषा को मान्यता और विश्वविद्यालयों में विभाग देने की मांग फिर तेज हो गई है।
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राजस्थान के विश्वविद्यालयों में 'शास्त्रीय मराठी भाषा अध्ययन केंद्र' खोलने के राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागड़े के निर्देश के बाद प्रदेश में राजस्थानी बनाम मराठी की बहस तेज हो गई है। विपक्ष और भाषाई संगठनों का सवाल है कि जब राजस्थान की अपनी मातृभाषा राजस्थानी को अभी तक पर्याप्त संस्थागत पहचान नहीं मिली, तब दूसरे राज्य की भाषा के अध्ययन केंद्र खोलने को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है।
महाराष्ट्र सरकार के प्रस्ताव पर राजभवन ने राज्य के विश्वविद्यालयों को मराठी अध्ययन केंद्र स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद कांग्रेस, छात्र संगठनों और भाषा प्रेमियों ने राजस्थानी भाषा की उपेक्षा का मुद्दा उठाया है।
111 सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जाती है राजस्थानी
विधानसभा में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, प्रदेश के 111 राजकीय विद्यालयों में कक्षा 11 और 12 के कला संकाय में राजस्थानी साहित्य को ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार- कक्षा 9 में वर्ष 1975 से 1988 तक राजस्थानी विषय पढ़ाया गया। इसके बाद कक्षा 10 में 1976 से 1988 तक पढ़ाई हुई। कक्षा 11 में 1977 से अब तक राजस्थानी साहित्य पढ़ाया जा रहा है। वहीं कक्षा 12 में 1988-89 से वर्तमान तक यह विषय संचालित है।
सभी सरकारी स्कूलों में राजस्थानी पढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं
राजस्थान विधानसभा में भी राजस्थानी भाषा को मान्यता दिए जाने को लेकर लगातार सवाल पूछे जाते रहे हैं। पिछले सत्र में सरकार से राजस्थान भाषा को सभी स्कूलों में अनिवार्य रूप से शुरू करवाए जाने को लेकर सवाल पूछा गया था। इसके जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल प्रदेश के सभी सरकारी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा का अध्ययन-अध्यापन शुरू करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। सरकार ने यह भी बताया कि राजस्थानी भाषा को राजस्थान की राजभाषा का दर्जा देने का मामला राज्य सरकार के स्तर पर विचाराधीन है।
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राजस्थानी विभाग नहीं, मराठी केंद्र पर विवाद
भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान के अधिकांश विश्वविद्यालयों में आज भी राजस्थानी भाषा का अलग विभाग या अध्ययन केंद्र नहीं है। ऐसे में मराठी अध्ययन केंद्र खोलने के निर्देशों ने प्राथमिकताओं को लेकर बहस छेड़ दी है।
विपक्ष ने उठाए सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने मराठी अध्ययन केंद्रों का स्वागत करते हुए कहा कि सबसे पहले राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के विभाग स्थापित किए जाने चाहिए। नेता प्रतिपक्ष पक्ष के नेताओं का कहना है कि अपनी मातृभाषा को मजबूत किए बिना दूसरी भाषा को प्राथमिकता देना उचित नहीं है।
इनका कहना है-
राजस्थानी भाषा को लेकर 2003 में राजस्थान विधानसभा संकल्प पारित कर चुकी है। इसमें करीब 8 तरह की बोलियां हैं। राजस्थान के स्कूलों में यह पढाई जाती है। विश्वविद्यालयों में इस पर शौध हो रहे हैं। लेकिन इसको आठवीं अनुसूची में मान्यता नहीं दी गई। हम इसे दूसरी राज भाषा बनाने की मांग कर पिछले 40 वर्षों से कर रहे हैं लेकिन लोगों में इच्छा शक्ति नहीं है। अगर होती तो इसे अब तक मान्यता मिल जाती।
लक्ष्मणदान कविया- संस्थापक, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा संघर्ष समिति