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'भारत के आदिवासी ही इंडिजिनस पीपुल्स हैं': सांसद रोत के बयान से गरमाई सियासत, भाजपा बोली- ऐसा बयान उचित नहीं
Thu, 16 Jul 2026 05:08 PM IST
जयपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: जयपुर ब्यूरो
Updated Thu, 16 Jul 2026 05:08 PM IST
सार
Rajasthan: डूंगरपुर-बांसवाड़ा सांसद राजकुमार रोत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि भारत की 705 अनुसूचित जनजातियां ही देश की वास्तविक इंडिजिनस पीपुल्स हैं। उन्होंने आदिवासी पहचान, अधिकार और अस्तित्व का मुद्दा उठाते हुए सरकार के रुख से असहमति जताई।
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राजकुमार रोत और मदन राठौड़ का बयान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा क्षेत्र से सांसद राजकुमार रोत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत के आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा कि भारत की अनुसूचित जनजातियां ही देश की वास्तविक इंडिजिनस पीपुल्स (मूल निवासी) हैं। उन्होंने अपने संबोधन में भारत सरकार के उस लंबे समय से चले आ रहे रुख से असहमति जताई, जिसमें कहा जाता रहा है कि भारत में अलग से इंडिजिनस पीपुल्स की कोई अलग श्रेणी नहीं है।
राजकुमार रोत ने कहा कि वह इस दावे से सहमत नहीं हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से कहा कि भारत में प्रोटो-ऑस्ट्रालॉइड, नीग्रिटो, द्रविड़ और मंगोलॉयड नस्लीय समूहों से जुड़े आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। देश में 705 अनुसूचित जनजातियां अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के साथ मौजूद हैं, जिन्हें भारतीय संविधान के तहत मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कहा कि भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी करीब 14 करोड़ है और यही समुदाय भारत के वास्तविक इंडिजिनस पीपुल्स हैं। उनके अनुसार यह केवल सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का विषय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और संवैधानिक तथ्य भी है।
पढ़ें: राजस्थान में ट्रिपल मर्डर: रिश्ते के विवाद ने लिया खूनी मोड़, दिनदहाड़े मामा-भांजे समेत तीन की बेरहमी से हत्या
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अपने संबोधन में सांसद रोत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू के कैलास बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) मामले में दिए गए निर्णय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति काटजू ने अपने फैसले में टिप्पणी की थी कि अनुसूचित जनजातियां भारत के मूल निवासियों की वंशज हैं। रौत ने इसे अपने पक्ष के समर्थन में एक महत्वपूर्ण न्यायिक आधार बताया।
राजकुमार रोत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर भील आदिवासी समाज और देश के आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करना उनके लिए गर्व और सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि यह केवल उनकी नहीं, बल्कि देश के करोड़ों आदिवासी भाई-बहनों की आवाज है, जो अपनी पहचान, अधिकारों और अस्तित्व से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठा रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि वैश्विक मंच पर इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखने से आदिवासी समुदाय के अधिकारों और पहचान को और मजबूती मिलेगी।
क्या बोले भाजपा प्रदेशाध्यक्ष?
भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने डूंगरपुर-बांसवाड़ा से सांसद राजकुमार रौत द्वारा संयुक्त राष्ट्र के मंच पर दिए गए बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि सांसद राजकुमार रौत को किसी विषय पर आपत्ति या शिकायत है तो उसे देश के भीतर उचित मंच पर उठाना चाहिए, न कि विदेश जाकर भारत की छवि को प्रभावित करने वाले बयान देने चाहिए।
मदन राठौड़ ने कहा कि सांसद ने संविधान की शपथ लेकर संसद की सदस्यता ग्रहण की है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादाओं का पालन करें। उन्होंने कहा कि यदि किसी विषय पर तथ्यात्मक शिकायत है तो उसे संसद, सरकार या अन्य सक्षम संस्थाओं के समक्ष रखा जाना चाहिए। बिना पर्याप्त आधार के अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश से जुड़े आरोप या आलोचना करना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि भारत एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है, जहां अपनी बात रखने के लिए संसद, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में देश के आंतरिक विषयों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना सही परंपरा नहीं है। उनका कहना था कि भारत की बात भारत में ही होनी चाहिए और सक्षम नेतृत्व के सामने तथ्यों के साथ रखी जानी चाहिए।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि यदि कोई भारतीय सांसद संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर जाकर देश के आंतरिक मुद्दों को उठाता है तो इससे यह संदेश जाता है कि उसकी प्राथमिकता समाधान निकालना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और प्रसिद्धि प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार के बयान केवल सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से दिए जा रहे हैं।
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राजकुमार रोत ने कहा कि वह इस दावे से सहमत नहीं हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से कहा कि भारत में प्रोटो-ऑस्ट्रालॉइड, नीग्रिटो, द्रविड़ और मंगोलॉयड नस्लीय समूहों से जुड़े आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। देश में 705 अनुसूचित जनजातियां अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के साथ मौजूद हैं, जिन्हें भारतीय संविधान के तहत मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कहा कि भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी करीब 14 करोड़ है और यही समुदाय भारत के वास्तविक इंडिजिनस पीपुल्स हैं। उनके अनुसार यह केवल सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का विषय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और संवैधानिक तथ्य भी है।
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अपने संबोधन में सांसद रोत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू के कैलास बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) मामले में दिए गए निर्णय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति काटजू ने अपने फैसले में टिप्पणी की थी कि अनुसूचित जनजातियां भारत के मूल निवासियों की वंशज हैं। रौत ने इसे अपने पक्ष के समर्थन में एक महत्वपूर्ण न्यायिक आधार बताया।
राजकुमार रोत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर भील आदिवासी समाज और देश के आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करना उनके लिए गर्व और सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि यह केवल उनकी नहीं, बल्कि देश के करोड़ों आदिवासी भाई-बहनों की आवाज है, जो अपनी पहचान, अधिकारों और अस्तित्व से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठा रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि वैश्विक मंच पर इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखने से आदिवासी समुदाय के अधिकारों और पहचान को और मजबूती मिलेगी।
क्या बोले भाजपा प्रदेशाध्यक्ष?
भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने डूंगरपुर-बांसवाड़ा से सांसद राजकुमार रौत द्वारा संयुक्त राष्ट्र के मंच पर दिए गए बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि सांसद राजकुमार रौत को किसी विषय पर आपत्ति या शिकायत है तो उसे देश के भीतर उचित मंच पर उठाना चाहिए, न कि विदेश जाकर भारत की छवि को प्रभावित करने वाले बयान देने चाहिए।
मदन राठौड़ ने कहा कि सांसद ने संविधान की शपथ लेकर संसद की सदस्यता ग्रहण की है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादाओं का पालन करें। उन्होंने कहा कि यदि किसी विषय पर तथ्यात्मक शिकायत है तो उसे संसद, सरकार या अन्य सक्षम संस्थाओं के समक्ष रखा जाना चाहिए। बिना पर्याप्त आधार के अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश से जुड़े आरोप या आलोचना करना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि भारत एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है, जहां अपनी बात रखने के लिए संसद, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में देश के आंतरिक विषयों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना सही परंपरा नहीं है। उनका कहना था कि भारत की बात भारत में ही होनी चाहिए और सक्षम नेतृत्व के सामने तथ्यों के साथ रखी जानी चाहिए।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि यदि कोई भारतीय सांसद संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर जाकर देश के आंतरिक मुद्दों को उठाता है तो इससे यह संदेश जाता है कि उसकी प्राथमिकता समाधान निकालना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और प्रसिद्धि प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार के बयान केवल सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से दिए जा रहे हैं।