आरक्षण लॉटरी से बदले सियासी समीकरण: पूरा बीकानेर संभाग महिलाओं को; जैसलमेर में एक वार्ड तक सिमटेगा मुकाबला
राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनाव से पहले आरक्षण लॉटरी ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। जयपुर-जोधपुर में मेयर पद सामान्य, जबकि कोटा में OBC महिला के लिए आरक्षित हुआ है। जिला प्रमुखों के 41 पदों में 20 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। जैसलमेर में जिला परिषद का एक वार्ड ST के लिए आरक्षित होने से इस सीट पर बीजेपी-कांग्रेस की पूरी चुनावी ताकत केंद्रित होने की संभावना है। अब दोनों दलों के सामने आरक्षण के मुताबिक जिताऊ उम्मीदवार चुनने और टिकट से वंचित दावेदारों को साधने की चुनौती है।
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राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव से पहले आरक्षण की लॉटरी ने सियासत का पूरा खेल बदल दिया है। जिन नेताओं ने महीनों पहले से चुनावी तैयारियां शुरू कर रखी थीं, उनमें से कई को अब अपना रास्ता बदलना पड़ेगा। कहीं सामान्य सीट खुलने से पुराने दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई है तो कहीं महिला, OBC, SC और ST आरक्षण ने नए चेहरों के लिए मैदान खोल दिया है। सबसे दिलचस्प स्थिति जैसलमेर में बन रही है, जहां जिला परिषद अध्यक्ष की सीट ST के लिए रिजर्व की गई है। जैलसमेर जिला परिषद में कुल 21 वार्ड हैं लेकिन यहां एसटी के लिए सिर्फ एक वार्ड रिजर्व है। ऐसे में जैसलमेर में जिला परिषद का पूरा चुनाव इस एक वार्ड पर केंद्रीत हो गया है। जो पार्टी इस वार्ड को जितेगी उसी का जिला प्रमुख होगा।
जयपुर-जोधपुर में ओपन मैदान, कोटा में OBC महिला का समीकर
नगर निगम मेयर पदों की लॉटरी में जयपुर और जोधपुर सामान्य रहने से दोनों बड़े शहरों में मेयर पद के दावेदारों की दौड़ तेज होगी। यहां वरिष्ठ नेताओं, पूर्व पार्षदों और राजनीतिक परिवारों से जुड़े चेहरों के बीच टिकट के लिए जोर आजमाइश बढ़ सकती है।
इसके उलट कोटा मेयर पद OBC महिला के लिए आरक्षित होने से कई पुरुष दावेदारों की राजनीतिक गणित बिगड़ गई है। अब बीजेपी और कांग्रेस दोनों को स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाली OBC महिला नेता की तलाश करनी होगी।
नई नगर निगमों भीलवाड़ा, पाली और अलवर में मेयर पद महिला के लिए आरक्षित होने से यहां भी टिकट की पूरी तस्वीर बदल गई है। खासकर अलवर में आरक्षण के बाद पार्टी के भीतर दावेदारी और गुटबाजी बढ़ने की संभावना है।
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जिला प्रमुखों की लॉटरी ने भी बदले समीकरण
प्रदेश के 41 जिला प्रमुख पदों में 20 पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इनमें 11 सामान्य महिला, 4 SC महिला, 3 ST महिला और 2 OBC महिला के पद हैं। इसका सीधा असर उन पुरुष नेताओं पर पड़ा है जो लंबे समय से जिला प्रमुख की कुर्सी के लिए तैयारी कर रहे थे। अब उन्हें अपने परिवार या राजनीतिक खेमे से महिला चेहरे को आगे करना होगा।
दौसा, धौलपुर, टोंक और भरतपुर में जिला प्रमुख पद SC महिला के लिए आरक्षित हुए हैं। सलूंबर, प्रतापगढ़ और अलवर में ST महिला तथा ब्यावर और सीकर में OBC महिला के लिए आरक्षण हुआ है।
बीकानेर संभाग में महिला आरक्षण का अलग असर
बीकानेर संभाग के कई हिस्सों में महिला आरक्षण आने से पुरुष दावेदारों के समीकरण बदले हैं। वहीं बीकानेर, चूरू, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में जिला प्रमुख पद सामान्य रहने से यहां पुराने दावेदारों की उम्मीदें कायम हैं। इन जिलों में अब मुकाबला इस बात पर होगा कि कौन सा राजनीतिक खेमा अपने समर्थक को जिला परिषद तक पहुंचाकर प्रमुख की कुर्सी तक ले जा पाता है।
प्रतापगढ़ में ST आरक्षण, पुराने समीकरणों पर असर
प्रतापगढ़ में जिला प्रमुख पद ST के लिए आरक्षित होने से यहां भी राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। पिछली बार महिला जिला प्रमुख चुनी गई थीं। अब ST आरक्षण के कारण दोनों दलों को आदिवासी समाज में मजबूत राजनीतिक आधार वाले चेहरे को आगे करना होगा।
अलवर में बढ़ सकती है खींचतान
अलवर में ST महिला के लिए जिला प्रमुख पद आरक्षित होने से पुराने दावेदारों के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। यहां पहले से सक्रिय पुरुष नेताओं को अब महिला चेहरे के जरिए अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की कोशिश करनी होगी। ऐसे में परिवार के भीतर से उम्मीदवार उतारने से लेकर खेमेबंदी तक की राजनीति तेज हो सकती है।
ओपन सीटों पर बड़े नेताओं की नजर
जयपुर, जोधपुर, बारां, बाड़मेर, भीलवाड़ा, करौली, कोटपूतली-बहरोड़, राजसमंद, सिरोही और उदयपुर में जिला प्रमुख पद सामान्य वर्ग के लिए खुले हैं। यहां पुराने दावेदारों और प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों की सक्रियता बढ़ना तय माना जा रहा है। जयपुर-जोधपुर जैसे बड़े जिलों में जिला परिषद और नगर निगम दोनों स्तरों पर सामान्य वर्ग की खुली सीटें नेताओं के लिए बड़ा अवसर हैं। वहीं जहां आरक्षण ने समीकरण बदले हैं, वहां दलों को नए चेहरों के जरिए चुनावी गणित साधना होगा।
आरक्षण ने बदला टिकट का गणित, अब अगली लड़ाई उम्मीदवारों की
आरक्षण की लॉटरी के बाद चुनावी लड़ाई अब सिर्फ पार्टी बनाम पार्टी नहीं रह गई है। सीट का आरक्षण ही तय कर रहा है कि कौन नेता मैदान में रहेगा और कौन बाहर होगा। ओपन सीटों पर वरिष्ठ नेताओं और प्रभावशाली खेमों की दावेदारी बढ़ेगी। महिला आरक्षित सीटों पर पुरुष नेता अपने परिवार या समर्थक महिला चेहरे को आगे कर सकते हैं। OBC आरक्षण ने सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से सक्रिय कर दिया है, जबकि ST आरक्षित सीटों पर आदिवासी नेतृत्व की भूमिका निर्णायक होगी।