राजेंद्र गुढ़ा की मांग: 21 साल में चुनाव लड़ने का मिले अधिकार, बोले- जब वोट दे सकते हैं तो चुनाव क्यों नहीं?
राजस्थान के पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा ने चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र 25 से घटाकर 21 साल करने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि जब 18 साल का युवा मतदान कर सकता है, तो 21 साल की उम्र में चुनाव लड़ने का अधिकार भी मिलना चाहिए।
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राजस्थान के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता राजेंद्र गुढ़ा ने युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर बड़ा सवाल उठाया है। गांधी वाटिका में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि जब देश का 18 साल का युवा सरकार चुनने के लिए मतदान कर सकता है, तो उसे 21 साल की उम्र में चुनाव लड़ने का अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए। गुढ़ा ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाने की बात भी कही।
गुढ़ा ने कहा कि पहले मतदान की उम्र 21 साल थी, जिसे घटाकर 18 साल किया गया। इसके बावजूद लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र अभी भी 25 साल है। उन्होंने सवाल किया कि जब गांव में 21 साल का युवा पंचायत स्तर पर चुनाव लड़ सकता है, तो उसे विधानसभा और संसद में जाने का अवसर क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।
'पुराने नेतृत्व को युवाओं के लिए रास्ता बनाना होगा'
उन्होंने कहा कि आज का युवा तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में जी रहा है। उसके हाथ में कंप्यूटर और पूरी दुनिया की जानकारी है। ऐसे में युवाओं को केवल चुनाव में मतदान करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें नीति निर्माण और सरकार चलाने की प्रक्रिया में सीधे भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए।
गुढ़ा ने कहा कि 21, 22 या 23 साल का युवा भी संसद और विधानसभा में पहुंचकर देश और प्रदेश के लिए फैसले कर सकता है। उन्होंने राजनीतिक दलों से सवाल किया कि आखिर वे युवाओं को आगे आने से कब तक रोकेंगे। उन्होंने कहा कि पुराने नेतृत्व को युवाओं के लिए रास्ता बनाना होगा।
'चुनाव लड़ने की उम्र पर भी विचार किया जाना चाहिए'
गुढ़ा ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 साल करने का ऐतिहासिक फैसला युवाओं को लोकतंत्र में अधिक भागीदारी देने की दिशा में उठाया गया था। अब उसी भावना के अनुरूप चुनाव लड़ने की उम्र पर भी विचार किया जाना चाहिए।
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राजनीतिक व्यवस्था में भी बदलाव जरूरी
गुढ़ा ने कहा कि भारत युवाओं का देश है और बदलते समय के साथ राजनीतिक व्यवस्था में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने दूसरे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई देशों में अपेक्षाकृत कम उम्र के युवाओं को चुनाव लड़ने का अवसर मिलता है। भारत को भी इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उन्होंने राजनीतिक दलों को चेताते हुए कहा कि नई पीढ़ी को हमेशा रोका नहीं जा सकता। पीले पत्ते एक समय तक टिक सकते हैं, लेकिन “नई कोपलें” आना तय है। गुढ़ा का संकेत साफ था कि राजनीति में युवाओं की बढ़ती भागीदारी को अब नजरअंदाज करना संभव नहीं होगा।