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Rajasthan : पश्चिमी राजस्थान का तीर्थराज है रणछोड़राय मंदिर, जानें यहां की आस्था और संस्कृति समागम की कहानी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर
Published by: जैसलमेर ब्यूरो
Updated Sat, 16 Aug 2025 06:01 PM IST
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सार
Rajasthan News : रणछोड़राय खेड़ मंदिर हमेशा से यहांं आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।
बालोतरा से लगभग 8-9 किलोमीटर दूर, बाड़मेर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 25 पर स्थित है यह मंदिर। जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर और अद्भुत स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण भी है।
राधा अष्टमी से लेकर जन्माष्टमी तक, साल भर होता है विशेष आयोजन, अयोध्या के बाद प्रदेश का सबसे ब
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विस्तार
राजस्थान के बालोतरा से लगभग 8-9 किलोमीटर दूर, बाड़मेर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 25 पर स्थित प्राचीन रणछोड़राय खेड़ मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर और अद्भुत स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण भी है। लूणी नदी के तट पर बसा यह तीर्थस्थल सदियों से श्रद्धालुओं, इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। इसे अक्सर ‘मारवाड़ का तीर्थराज’ और ‘पश्चिमी राजस्थान का द्वारिकाधीश’ भी कहा जाता है।ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि खेड़ का प्राचीन नाम ‘खेड़ पट्टन’ और ‘क्षीरपुर’ था। यह नगर कभी अत्यंत समृद्ध और भव्य नगरी के रूप में प्रसिद्ध था। विक्रम संवत 685 से 1056 तक यहां चावड़ा, प्रतिहार, योद्धेय दरिया, डाभी, गौड़ सहित कई राजपूत वंशों का शासन रहा। इसके बाद गुहिल राजपूतों ने इसे अपनी राजधानी बनाया, जिसके अधीन 560 गांव आते थे। लेकिन अरब आक्रमणों ने यहां के स्थायी शासन को कमजोर कर दिया।
आक्रांताओं ने मंदिर को लूटकर कई प्रतिमाओं को खंडित किया था
इतिहास में दर्ज है कि विक्रम संवत 813 में अरबों का हमला हुआ और संवत 1253 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने गुजरात जाते समय इस मंदिर को लूटकर कई प्रतिमाओं को खंडित कर दिया। बाद के समय में यह क्षेत्र राठौड़ों के अधीन आया। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में राठौड़ वंश के संस्थापक राव सिहाजी और उनके पुत्र अस्थानजी ने गुहिल राजपूतों को पराजित कर खेड़ पर अधिकार कर लिया और यहां राठौड़ों का झंडा लहराया। मंदिर परिसर और उसके आसपास का इलाका प्राचीन सभ्यता के अवशेषों से भरा है। लूणी नदी के किनारे सिलोर तक पाषाण युग के अवशेष पाए गए हैं, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक गहराई को और भी गहरा बनाते हैं।
आकर्षण का केंद्र है खेड़ मंदिर
खेड़ मंदिर परिसर में भगवान श्री रणछोड़राय (भगवान विष्णु का रूप) की सफेद संगमरमर से बनी भव्य चतुर्भुजी प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा का श्रृंगार और अलंकरण अत्यंत मनोहारी होता है, और इसके चारों ओर तोरणद्वार की अद्वितीय नक्काशी देखने लायक है। मंदिर में भगवान विष्णु के अलावा ब्रह्माजी, लक्ष्मीजी, अन्नपूर्णा देवी, मछापूर्ण बालाजी, महिषासुर मर्दिनी देवी, शेषनाग पर विराजमान नीलकंठ महादेव, भूरिया बाबा हनुमानजी और भगवान ब्रह्मा के मंदिर भी स्थित हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए अतिरिक्त आकर्षण का केंद्र हैं।
कभी यह पूरा क्षेत्र एक समृद्ध नगर था
मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार अपनी बारीक नक्काशी और कलात्मक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, कभी यह पूरा क्षेत्र एक समृद्ध नगर था, जिसका अधिकांश भाग अब धरती के नीचे दबा हुआ है। यहां स्थित एक छोटे मंदिर का आधा भाग आज भी जमीन में धंसा हुआ दिखाई देता है, जो बीते युग की गवाही देता है। कुछ वर्ष पहले तक यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। समय और प्राकृतिक आपदाओं ने इसकी संरचना को कमजोर कर दिया था। लेकिन मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय समुदाय के सहयोग से व्यापक मरम्मत और आधुनिकीकरण का कार्य किया गया। आज मंदिर अपनी भव्यता के साथ फिर से श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए तैयार है।
धार्मिक दृष्टि से खेड़ मंदिर का महत्व बहुत अधिक है। वर्ष भर यहां राधा अष्टमी, कृष्ण जन्माष्टमी, कार्तिक पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा जैसे पावन पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं। खास तौर पर अन्नकूट महोत्सव के समय जोधपुर संभाग के सबसे बड़े मेलों में से एक का आयोजन यहीं होता है। इन अवसरों पर दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं, जिनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था मंदिर ट्रस्ट द्वारा निःशुल्क की जाती है।
ये भी पढ़ें- Janmashtmi: जयपुर के इस कृष्ण मंदिर में 300 वर्षों से है ये अनूठी परंपरा, यहां रात में नहीं बल्कि दिन में 12 बजे मनाई जाती है जन्ममाष्टमी
दीपोत्सव के आयोजन के लिए भी प्रसिद्ध है मंदिर
खेड़ रणछोड़राय मंदिर दीपोत्सव के आयोजन के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां होने वाला दीपोत्सव, अयोध्या के बाद प्रदेश का सबसे बड़ा दीपोत्सव माना जाता है। लाखों दीपों की रोशनी से मंदिर परिसर जगमगा उठता है। महिलाओं और बालिकाओं के समूह मिलकर कई घंटों की मेहनत से रंग-बिरंगी कलात्मक रंगोलियां बनाते हैं, जिनमें केवट दृश्य, राम-हनुमान मिलन, लक्ष्मी माता, अयोध्या श्रीराम मंदिर और राम दरबार की जीवंत झांकियां शामिल होती हैं। ये झांकियां इतनी सुंदर होती हैं कि मानो पौराणिक कथाएं सजीव हो उठी हों।
आज रणछोड़राय खेड़ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक, स्थापत्य और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यहां आकर श्रद्धालु अपनी भक्ति में लीन हो जाते हैं और इतिहास प्रेमी सदियों पुरानी संस्कृति के साक्षी बनते हैं। लूणी नदी के किनारे बसा यह पावन स्थल सचमुच पश्चिमी राजस्थान के गौरव का प्रतीक है, जहां आस्था और इतिहास दोनों का संगम होता है।
ये भी पढ़ें- Rajasthan: दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर गौतस्करों की पिकअप पलटी, एक की मौत, एक गंभीर घायल
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आक्रांताओं ने मंदिर को लूटकर कई प्रतिमाओं को खंडित किया था
इतिहास में दर्ज है कि विक्रम संवत 813 में अरबों का हमला हुआ और संवत 1253 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने गुजरात जाते समय इस मंदिर को लूटकर कई प्रतिमाओं को खंडित कर दिया। बाद के समय में यह क्षेत्र राठौड़ों के अधीन आया। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में राठौड़ वंश के संस्थापक राव सिहाजी और उनके पुत्र अस्थानजी ने गुहिल राजपूतों को पराजित कर खेड़ पर अधिकार कर लिया और यहां राठौड़ों का झंडा लहराया। मंदिर परिसर और उसके आसपास का इलाका प्राचीन सभ्यता के अवशेषों से भरा है। लूणी नदी के किनारे सिलोर तक पाषाण युग के अवशेष पाए गए हैं, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक गहराई को और भी गहरा बनाते हैं।
आकर्षण का केंद्र है खेड़ मंदिर
खेड़ मंदिर परिसर में भगवान श्री रणछोड़राय (भगवान विष्णु का रूप) की सफेद संगमरमर से बनी भव्य चतुर्भुजी प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा का श्रृंगार और अलंकरण अत्यंत मनोहारी होता है, और इसके चारों ओर तोरणद्वार की अद्वितीय नक्काशी देखने लायक है। मंदिर में भगवान विष्णु के अलावा ब्रह्माजी, लक्ष्मीजी, अन्नपूर्णा देवी, मछापूर्ण बालाजी, महिषासुर मर्दिनी देवी, शेषनाग पर विराजमान नीलकंठ महादेव, भूरिया बाबा हनुमानजी और भगवान ब्रह्मा के मंदिर भी स्थित हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए अतिरिक्त आकर्षण का केंद्र हैं।
कभी यह पूरा क्षेत्र एक समृद्ध नगर था
मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार अपनी बारीक नक्काशी और कलात्मक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, कभी यह पूरा क्षेत्र एक समृद्ध नगर था, जिसका अधिकांश भाग अब धरती के नीचे दबा हुआ है। यहां स्थित एक छोटे मंदिर का आधा भाग आज भी जमीन में धंसा हुआ दिखाई देता है, जो बीते युग की गवाही देता है। कुछ वर्ष पहले तक यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। समय और प्राकृतिक आपदाओं ने इसकी संरचना को कमजोर कर दिया था। लेकिन मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय समुदाय के सहयोग से व्यापक मरम्मत और आधुनिकीकरण का कार्य किया गया। आज मंदिर अपनी भव्यता के साथ फिर से श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए तैयार है।
धार्मिक दृष्टि से खेड़ मंदिर का महत्व बहुत अधिक है। वर्ष भर यहां राधा अष्टमी, कृष्ण जन्माष्टमी, कार्तिक पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा जैसे पावन पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं। खास तौर पर अन्नकूट महोत्सव के समय जोधपुर संभाग के सबसे बड़े मेलों में से एक का आयोजन यहीं होता है। इन अवसरों पर दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं, जिनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था मंदिर ट्रस्ट द्वारा निःशुल्क की जाती है।
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दीपोत्सव के आयोजन के लिए भी प्रसिद्ध है मंदिर
खेड़ रणछोड़राय मंदिर दीपोत्सव के आयोजन के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां होने वाला दीपोत्सव, अयोध्या के बाद प्रदेश का सबसे बड़ा दीपोत्सव माना जाता है। लाखों दीपों की रोशनी से मंदिर परिसर जगमगा उठता है। महिलाओं और बालिकाओं के समूह मिलकर कई घंटों की मेहनत से रंग-बिरंगी कलात्मक रंगोलियां बनाते हैं, जिनमें केवट दृश्य, राम-हनुमान मिलन, लक्ष्मी माता, अयोध्या श्रीराम मंदिर और राम दरबार की जीवंत झांकियां शामिल होती हैं। ये झांकियां इतनी सुंदर होती हैं कि मानो पौराणिक कथाएं सजीव हो उठी हों।
आज रणछोड़राय खेड़ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक, स्थापत्य और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यहां आकर श्रद्धालु अपनी भक्ति में लीन हो जाते हैं और इतिहास प्रेमी सदियों पुरानी संस्कृति के साक्षी बनते हैं। लूणी नदी के किनारे बसा यह पावन स्थल सचमुच पश्चिमी राजस्थान के गौरव का प्रतीक है, जहां आस्था और इतिहास दोनों का संगम होता है।
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