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Jaisalmer: जैसलमेर में हुआ रेयर कैराकल का सफल रेस्क्यू, रात में चला चुनौतीपूर्ण अभियान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर
Published by: जैसलमेर ब्यूरो
Updated Tue, 27 Jan 2026 09:57 PM IST
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सार
Jaisalmer: राजस्थान के जैसलमेर जिले में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई है। शाहगढ़ ग्राम पंचायत क्षेत्र में दुर्लभ नर कैराकल का सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर उसके गले में रेडियो कॉलर लगाया गया और उसे सुरक्षित रूप से प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया।
कैराकल को रेस्क्यू कर लगाया गया रेडियो कॉलर
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विस्तार
राजस्थान के जैसलमेर जिले से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। थार के रेगिस्तानी अंचल में स्थित शाहगढ़ ग्राम पंचायत क्षेत्र के ग्रामीण इलाके में अत्यंत दुर्लभ एवं रहस्यमयी नर कैराकल (स्याहगोश) का सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर उसके गले में रेडियो कॉलर लगाया गया। यह पूरा अभियान रात के समय अत्यधिक सतर्कता, विशेषज्ञ निगरानी और वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप संपन्न किया गया।
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सुरक्षित रूप से छोड़ा गया
रेस्क्यू और रेडियो कॉलरिंग की प्रक्रिया इस तरह से पूरी की गई कि कैराकल को किसी भी प्रकार की शारीरिक चोट, अनावश्यक तनाव या खतरे का सामना न करना पड़े। प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद वन्यजीव को पूर्णतः स्वस्थ अवस्था में उसके प्राकृतिक वन क्षेत्र में सुरक्षित रूप से वापस छोड़ दिया गया, ताकि उसकी दिनचर्या और स्वाभाविक जीवन पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
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विशेषज्ञ समन्वय से मिली सफलता
यह ऑपरेशन तकनीकी और सुरक्षा दोनों दृष्टियों से अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जा रहा था। रात के समय रेगिस्तानी क्षेत्र में किसी दुर्लभ वन्यजीव को रेस्क्यू कर उस पर रेडियो कॉलर लगाना आसान कार्य नहीं होता। इसके बावजूद वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) की अनुभवी टीम तथा राजस्थान वन विभाग के अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों के बेहतरीन समन्वय से यह मिशन पूरी तरह सफल रहा। टीम ने आधुनिक उपकरणों, ट्रैंक्विलाइजेशन तकनीक तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानक प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अभियान को अंजाम दिया। प्रत्येक चरण में विशेषज्ञों द्वारा कैराकल के स्वास्थ्य और व्यवहार पर सतत निगरानी रखी गई।
रहस्यमयी कैराकल की विशिष्ट पहचान
कैराकल अपनी अनोखी बनावट के कारण विशेष महत्व रखता है। इसकी आकृति चीते से मिलती-जुलती होती है, जबकि शरीर घरेलू बिल्ली की तरह चुस्त और फुर्तीला होता है। इसके लंबे, नुकीले कानों पर काले गुच्छेदार बाल इसकी विशिष्ट पहचान हैं। भारत में यह प्रजाति अत्यंत सीमित संख्या में पाई जाती है और लंबे समय से इसके अस्तित्व को लेकर चिंता बनी हुई है। जैसलमेर का रेगिस्तानी एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र कैराकल के प्रमुख प्राकृतिक आवासों में से एक माना जाता है।
वैज्ञानिक निगरानी से मिलेगी संरक्षण को मजबूती
रेडियो कॉलर लगाए जाने के बाद अब इस दुर्लभ प्रजाति पर गहन वैज्ञानिक निगरानी संभव हो सकेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, रेडियो कॉलर से प्राप्त डाटा कैराकल संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। इस तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक यह जानकारी प्राप्त कर सकेंगे कि कैराकल किन क्षेत्रों में विचरण करता है, उसकी दैनिक गतिविधियां एवं मूवमेंट पैटर्न क्या हैं, वह किस प्रकार का शिकार करता है, उसका क्षेत्रीय दायरा कितना विस्तृत है तथा किन इलाकों में उसे अधिक खतरा या सुरक्षा मिलती है। यह जानकारी भविष्य में आवास प्रबंधन, संरक्षण रणनीतियों और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में सहायक होगी।
जैसलमेर बना वन्यजीव संरक्षण की मिसाल
डेजर्ट नेशनल पार्क (डीएनपी) के डीएफओ बृजमोहन गुप्ता ने इस सफल अभियान को जैसलमेर के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि से न केवल स्थानीय वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को मजबूती मिलेगी, बल्कि कैराकल जैसी दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण को भी नई दिशा प्राप्त होगी। उन्होंने यह भी कहा कि जैसलमेर एक बार फिर यह सिद्ध कर रहा है कि रेगिस्तानी क्षेत्र केवल कठोर परिस्थितियों का प्रतीक नहीं, बल्कि जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों के महत्वपूर्ण आश्रय स्थल भी हैं।
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संरक्षण के क्षेत्र में मील का पत्थर
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय बाद कैराकल पर शुरू हुई यह वैज्ञानिक निगरानी दीर्घकालिक संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। इससे न केवल इस प्रजाति की वास्तविक स्थिति का आकलन होगा, बल्कि भविष्य में इसके संरक्षण के लिए ठोस और प्रभावी नीतियां तैयार करने में भी सहायता मिलेगी।