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चुनाव परिणाम: मदन राठौड़ के गढ़ में कांग्रेस की सेंध, पाली नगर निगम में बीजेपी पिछड़ी; वार्ड में भी मिली हार
Mon, 14 Sep 2026 01:51 PM IST
हिमांशु सिंह बघेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पाली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पाली
Published by: हिमांशु सिंह बघेल
Updated Mon, 14 Sep 2026 01:51 PM IST
सार
पाली नगर निगम चुनाव के नतीजों ने बीजेपी के लिए बड़ा झटका दिया है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले में कांग्रेस 29 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि बीजेपी को 21 सीटों से संतोष करना पड़ा। राठौड़ के वार्ड में भी कांग्रेस ने जीत दर्ज की। बहुमत से दूर कांग्रेस को महापौर बनाने के लिए 15 निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत होगी।
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पाली में भाजपा को बड़ा झटका
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
पाली नगर निगम के 65 वार्डों के काउंटिंग पूरी हो चुकी है। इसमें कांग्रेस को 29 वार्ड, भाजपा को 21 और निर्दलीय को 15 सीटें मिली हैं। अब निर्दलीय ही तय करेंगे कि पाली में किसका बोर्ड बनेगा। वहीं सोजत रोड, मारवाड़ जंक्शन, रानी खुर्द, बाली, फालना और तखतगढ़ में भी काउंटिंग पूरी हो चुकी है। सुमेरपुर सादड़ी और सोजत सिटी में काउंटिंग जारी है। जिले भर से इस बार 751 प्रत्याशी मैदान में हैं। इसी के साथ पाली में बीजेपी का बढ़ा गढ़ भी ढह गया है।पाली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह जिला है। यहां राठौड़ के वार्ड में भी कांग्रेस ने जीत दर्ज कराई है। हालांकि, कांग्रेस को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है लेकिन वह बीजेपी के मुकाबले आठ सीटों पर ज्यादा जीतकर बढ़त लेकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।
कांग्रेस के लंबे प्रभाव से भाजपा के मजबूत गढ़ तक
उपलब्ध राजनीतिक रिकॉर्ड के अनुसार पाली नगर निकाय में लंबे समय तक कांग्रेस का प्रभाव रहा। 1990 के दशक में भाजपा ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की। एक प्रकाशित राजनीतिक इतिहास के अनुसार 1945 से 1992 तक पाली नगर पालिका पर कांग्रेस का दबदबा रहा, जबकि 1994 से 2004 के बीच भाजपा के ज्ञानचंद पारख और कुसुम सोनी ने नगर परिषद की कमान संभाली। इसके बाद 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस के प्रदीप हिंगड़ और केवलचंद गुलेच्छा सभापति रहे। इसके बाद भाजपा ने फिर वापसी की। महेंद्र बोहरा नगर परिषद के सभापति रहे, जिसका सरकारी दस्तावेजों में भी उल्लेख मिलता है। 2019 के निकाय चुनाव में भाजपा की रेखा भाटी सभापति चुनी गईं। सभापति के चुनाव में उन्हें 37 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की नेतल मेवाड़ा को 28 वोट मिले। यानी 65 सदस्यीय बोर्ड में भाजपा ने नौ वोट के अंतर से सभापति पद पर कब्जा किया था।
रेखा भाटी के बोर्ड से राकेश भाटी के कांग्रेस में जाने तक
पाली की 2026 की लड़ाई को रेखा भाटी के पिछले बोर्ड और उनके पति राकेश भाटी की राजनीतिक भूमिका से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राकेश भाटी 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 में पार्षद चुने गए। वे उपसभापति, सभापति और नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। 2019 में रेखा भाटी के सभापति बनने के बाद पाली की स्थानीय राजनीति में भाटी परिवार प्रभावशाली रहा। हालांकि बाद के वर्षों में भाजपा के भीतर उनके खिलाफ विवाद भी सामने आए और रेखा भाटी को 2023 में सभापति पद से निलंबित किया गया। अब 2026 के चुनाव से ठीक पहले सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि करीब 35 साल तक भाजपा से जुड़े रहे राकेश भाटी कांग्रेस में शामिल हो गए। वे पाली भाजपा के जिला महामंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है कि उनके स्थानीय संगठन और व्यक्तिगत नेटवर्क का फायदा पार्टी को मिलेगा, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने स्थानीय समीकरण को बचाए रखने की चुनौती है।
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ये भी पढ़ें- बारां में AAP ने चलाई झाड़ू: भाजपा-कांग्रेस के दिग्गज चित्त, 32 वार्डों में जीत के साथ बोर्ड तय
70.94% वोटिंग ने बढ़ाई बेचैनी
पाली में 2026 के चुनाव में 70.94 प्रतिशत मतदान हुआ है। 1.28 लाख से ज्यादा मतदाताओं ने वोट डाला। वार्डवार आंकड़ों में भी काफी अंतर देखने को मिला है। उपलब्ध मतदान विवरण के अनुसार कुछ वार्डों में मतदान 60 प्रतिशत से नीचे रहा तो कई वार्डों में यह 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंचा। यही बढ़ा हुआ मतदान अब दोनों प्रमुख दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल है। ज्यादा वोटिंग को भाजपा अपने पक्ष में मान रही है तो कांग्रेस इसे बदलाव की इच्छा से जोड़ सकती है। लेकिन असली तस्वीर वार्डवार नतीजों के बाद ही साफ होगी।
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कांग्रेस के लंबे प्रभाव से भाजपा के मजबूत गढ़ तक
उपलब्ध राजनीतिक रिकॉर्ड के अनुसार पाली नगर निकाय में लंबे समय तक कांग्रेस का प्रभाव रहा। 1990 के दशक में भाजपा ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की। एक प्रकाशित राजनीतिक इतिहास के अनुसार 1945 से 1992 तक पाली नगर पालिका पर कांग्रेस का दबदबा रहा, जबकि 1994 से 2004 के बीच भाजपा के ज्ञानचंद पारख और कुसुम सोनी ने नगर परिषद की कमान संभाली। इसके बाद 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस के प्रदीप हिंगड़ और केवलचंद गुलेच्छा सभापति रहे। इसके बाद भाजपा ने फिर वापसी की। महेंद्र बोहरा नगर परिषद के सभापति रहे, जिसका सरकारी दस्तावेजों में भी उल्लेख मिलता है। 2019 के निकाय चुनाव में भाजपा की रेखा भाटी सभापति चुनी गईं। सभापति के चुनाव में उन्हें 37 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की नेतल मेवाड़ा को 28 वोट मिले। यानी 65 सदस्यीय बोर्ड में भाजपा ने नौ वोट के अंतर से सभापति पद पर कब्जा किया था।
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रेखा भाटी के बोर्ड से राकेश भाटी के कांग्रेस में जाने तक
पाली की 2026 की लड़ाई को रेखा भाटी के पिछले बोर्ड और उनके पति राकेश भाटी की राजनीतिक भूमिका से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राकेश भाटी 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 में पार्षद चुने गए। वे उपसभापति, सभापति और नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। 2019 में रेखा भाटी के सभापति बनने के बाद पाली की स्थानीय राजनीति में भाटी परिवार प्रभावशाली रहा। हालांकि बाद के वर्षों में भाजपा के भीतर उनके खिलाफ विवाद भी सामने आए और रेखा भाटी को 2023 में सभापति पद से निलंबित किया गया। अब 2026 के चुनाव से ठीक पहले सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि करीब 35 साल तक भाजपा से जुड़े रहे राकेश भाटी कांग्रेस में शामिल हो गए। वे पाली भाजपा के जिला महामंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है कि उनके स्थानीय संगठन और व्यक्तिगत नेटवर्क का फायदा पार्टी को मिलेगा, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने स्थानीय समीकरण को बचाए रखने की चुनौती है।
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70.94% वोटिंग ने बढ़ाई बेचैनी
पाली में 2026 के चुनाव में 70.94 प्रतिशत मतदान हुआ है। 1.28 लाख से ज्यादा मतदाताओं ने वोट डाला। वार्डवार आंकड़ों में भी काफी अंतर देखने को मिला है। उपलब्ध मतदान विवरण के अनुसार कुछ वार्डों में मतदान 60 प्रतिशत से नीचे रहा तो कई वार्डों में यह 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंचा। यही बढ़ा हुआ मतदान अब दोनों प्रमुख दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल है। ज्यादा वोटिंग को भाजपा अपने पक्ष में मान रही है तो कांग्रेस इसे बदलाव की इच्छा से जोड़ सकती है। लेकिन असली तस्वीर वार्डवार नतीजों के बाद ही साफ होगी।