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Rajsamand News: श्रीनाथजी में पाटोत्सव से शुरू हुई रसिया की धूम, अबीर-गुलाल से भक्तों पर किया छिड़काव

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राजसमंद Published by: राजसमंद ब्यूरो Updated Mon, 09 Feb 2026 10:40 AM IST
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सार

पुष्टिमार्गीय परंपराओं के अनुरूप फाल्गुन सप्तमी पर श्रीनाथजी की हवेली में पाटोत्सव श्रद्धा और उमंग के साथ आयोजित हुआ। श्रद्धालुओं ने रंग, रसिया और विशेष भोग सेवा के माध्यम से प्रभु के प्रति भक्ति अर्पित की।
 

Rajsamand News: Paatotsav at Shrinathji Temple Begins Rasiya Festivities, Devotees Showered with Abir-Gulal
श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला
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विस्तार

फाल्गुन सप्तमी के पावन अवसर पर नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर में परंपरानुसार पाटोत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। विक्रम संवत् 1728 फाल्गुन वद सातम के दिन प्रभु श्रीनाथजी को पहली बार नाथद्वारा मंदिर में तिलकायत दामोदरजी (दाऊजी) प्रथम महाराज ने पाट पर विराजित किया था। तभी से इस दिन पाटोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है।
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श्रीजी प्रभु की हवेली में पाटोत्सव पुष्टिमार्गीय परंपराओं के अनुरूप उत्साहपूर्वक आयोजित हुआ। इस अवसर पर श्रीनाथजी एवं श्री नवनीत प्रियाजी का विशेष शृंगार किया गया। राजभोग सेवा के साथ विशेष भोग अर्पित किए गए। इस दौरान ठाकुरजी को गुलाल और अबीर से फाग खिलाई गई। मुखिया द्वारा श्रीजी प्रभु की दाढ़ी गुलाल से रंगी गई तथा गुलाल की पोटली से भक्तों पर छिड़काव किया गया।
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पाटोत्सव के साथ ही हवेली में गुलाल और अबीर उड़ने का क्रम प्रारंभ हो गया। रसिया गायन की भी शुरुआत हुई, जिसमें ब्रजवासी बालकों ने सखा भाव से ढफ की थाप पर रसिया गाकर ठाकुरजी को रिझाया।

इस अवसर पर युवाचार्य गोस्वामी विशाल बावा ने पुष्टिसृष्टि को पाटोत्सव की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पुष्टिमार्ग में पाटोत्सव का अर्थ केवल सिंहासन पर विराजना नहीं है, बल्कि यह एक विशेष, विलक्षण और अनुपम आध्यात्मिक प्रसंग है। निकुंज नायक श्रीनाथजी का पाटोत्सव समस्त वल्लभकुल में हर्ष, श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

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उन्होंने बताया कि मान्यता के अनुसार, इसी दिन श्री गोवर्धनधरण प्रभु ने श्री गिरधरजी को आज्ञा दी 'मुझे अपने घर ले चलो।' उस समय प्रभुचरण यात्रा पर थे। श्रीनाथजी की आज्ञा का पालन करते हुए श्री गिरधरजी ने मथुरा स्थित अपने सतघरा गृह में प्रभु के आगमन की भव्य तैयारी की और फाल्गुन कृष्ण सप्तमी का दिन निश्चित किया। श्री गिरधरजी गिरिराजजी पर पधारे और केवल उनके साथ ही श्रीनाथजी नीचे पधारे। यह प्रसंग श्रीनाथजी के श्री गिरधरजी के प्रति अंतरंग एवं अपार प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

बताया जाता है कि प्रभु ने श्री गिरधरजी से सर्वसमर्पण स्वीकार किया, जो बहू-बेटी के आभूषणों के रूप में अर्पित हुआ। इन्हीं आभूषणों से निर्मित रत्नजड़ित चौखटा आज भी विशेष उत्सवों और अवसरों पर प्रभु को अर्पित किया जाता है।
 

श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला

श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला

 

श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला

श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला

 

श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला

श्रीनाथजी मंदिर में पाट उत्सव के दौरान भक्तों का सैलाब । फोटो - अमर उजाला


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