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Tech Explained: क्या है Claude Cowork, क्यों महज एक एआई टूल से खौफ में हैं आईटी कंपनियां?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नीतीश कुमार Updated Mon, 09 Feb 2026 11:13 AM IST
सार

Claude Cowork: पिछले हफ्ते शेयर बाजार में आईटी कंपनियों के शेयरों से करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये साफ हो गए। इसकी वजह बनी अमेरिकी AI कंपनी Anthropic और उसका नया टूल क्लाउड कोवर्क। क्या है यह टूल और इससे भारत और यूएस की सॉफ्टवेयर कंपनियां क्यों घबराई हुई हैं? आइए जानने की कोशिश करते हैं।

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Claude Cowork - फोटो : AI
भारतीय आईटी सेक्टर के लिए पिछला हफ्ता किसी बुरे सपने से कम नहीं था। देश की पांच सबसे बड़ी आईटी कंपनियों के मार्केट कैप से करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये एक झटके में गायब हो गए। गौर करने वाली बात यह है कि इस भारी तबाही का कारण कोई बड़ी मंदी नहीं, बल्कि अमेरिका की एक एआई कंपनी एंथ्रोपिक (Anthropic) है। एंथ्रोपिक का एक नया प्रोडक्ट क्लाउड कोवर्क (Claude Cowork) दुनिया भर के निवेशकों के मन में डर पैदा करने का मुख्य कारण बना है। मात्र 2,500 कर्मचारियों वाली इस कंपनी ने दुनिया भर की आईटी कंपनियों के भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है।


धड़ाधड़ क्रैश हुए आईटी शेयर
वैसे तो एंथ्रोपिक ने Claude Cowork को 12 जनवरी को ही लॉन्च कर दिया था, लेकिन उस समय शेयर मार्केट पर इसका कोई असर नहीं देखा गया। लेकिन जैसे ही एंथ्रोपिक ने आईटी कंपनियों के काम को ऑटोमेट करने वाले लगभग 11 बिजनेस प्लग-इन का एलान किया, वैसे ही आईटी कंपनियों के निवेशकों में डर बैठ गया। इसका असर ये हुआ कि निवेशकों का भरोसा एक झटके में टूट गया और शेयर मार्केट में तबाही मच गई।

यूएस में एक हफ्ते में निवेशकों के 1 ट्रिलियन डॉलर स्वाहा हो गए, तो भारत में टॉप-5 आईटी कंपनियों के निवेशकों के 1.5 लाख करोड़ रुपये एक झटके में डूब गए। Claude Cowork के एलान के बाद 5 फरवरी को TCS और Infosys के शेयर 7 प्रतिशत तक टूट गए। कई एक्सपर्ट्स तो ये तक कहने लगे कि अब शेयर मार्केट भी एआई के 'खूनी खेल' से नहीं बचा।

क्या है Claude Cowork?
अब तक हम चैटजीपीटी (ChatGPT) या जेमिनी (Gemini) जैसे चैटबॉट्स का इस्तेमाल सवाल पूछने या रिपोर्ट लिखवाने के लिए करते थे। लेकिन एंथ्रोपिक ने जो Claude Cowork लॉन्च किया है, वह इनसे कहीं अधिक एडवांस है। जहां एक चैटबॉट आपको जानकारी देता है जिसे आपको कॉपी-पेस्ट करना पड़ता है, वहीं Cowork सीधे आपके कंप्यूटर सिस्टम का हिस्सा बन जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो चैटबॉट एक फ्रीलांसर की तरह है जिसे आप काम देते हैं, जबकि Cowork आपके ऑफिस का एक जूनियर कर्मचारी बन जाता है। इसके अलग-अलग प्लग-इन्स एक बिजनेस के काम को पूरी तरह ऑटोमेट करने का काम करते हैं। यह एआई टूल कोडिंग, मार्केटिंग, लीगल और अकाउंटिंग जैसे काम खुद-ब-खुद कर सकते हैं। यानी एक आईटी कंपनी के लिए कोडिंग, मार्केटिंग और मेंटेनेंस का काम करने वाली सर्विस कंपनियों से जैसे काम ही छिन गया।

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इंफोसिस - फोटो : PTI
इसे ऐसे समझिए जैसे मोटर गाड़ी आने के बाद घोड़े तो खत्म नहीं हुए लेकिन अब उनका वह काम नहीं रहा जो पहले करते थे। चूंकि, भारत की ज्यादातर आईटी कंपनियां खुद से कोई प्रोडक्ट या सॉफ्टवेयर नहीं बनाती बल्कि उनकी मेंटेनेंस का काम करती हैं, इसलिए भारत के लिए स्थियी ज्यादा चिंताजनक है।

क्या सॉफ्टवेयर कंपनियों का अंत करीब है?
इस नए एआई टूल की वजह से अमेरिका में 'सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस' (SaaS) कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है। पुराने समय में एमएस ऑफिस (MS Office) जैसे सॉफ्टवेयर सीडी के जरिए लोड होते थे, लेकिन अब वे इंटरनेट से चलते हैं, इसी को SaaS कहते हैं। निवेशकों को डर है कि जब एआई खुद ही सॉफ्टवेयर बना सकता है और उसे मेंटेन भी कर सकता है, तो लोग इन कंपनियों को पैसे क्यों देंगे? इस स्थिति को बाजार के जानकारों ने 'सास-पॉकलिप्स' (SaaS-pocalypse) का नाम दिया है, जिसका अर्थ है सॉफ्टवेयर बिजनेस की महाप्रलय।

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टीसीएस - फोटो : Agency
भारतीय IT कंपनियों के लिए खतरा क्यों है ज्यादा?
भारतीय आईटी कंपनियों का बड़ा बिजनेस मॉडल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से ज्यादा उसके मेंटेनेंस पर टिका है। यहां काम घंटों के हिसाब से बिल होता है और बड़ी संख्या में लोग इस प्रक्रिया में लगे रहते हैं। जब Claude Cowork एआई टूल के वजह से कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर डेवलप करने की जरूरत कम हो जाएगी, तो इसके मेंटेनेंस की जरूरत भी कम होने लगेगी। ऐसे में सॉफ्टवेयर कंपनियां जिनका काम मेंटेनेंस का है, उनपर इसका सीधा असर होगा।
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नौकरियों से ज्यादा बिजनेस को खतरा - फोटो : Adobestock
नौकरियों से ज्यादा बिजनेस को खतरा
आईटी कंपनियों में भर्ती की रफ्तार पहले ही धीमी पड़ चुकी है। इस साल बड़ी आईटी कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती नौ महीनों में सिर्फ 17 लोगों की शुद्ध भर्ती की है। लेकिन जानकार मानते हैं कि असली संकट केवल नौकरियों पर नहीं बल्कि बिजनेस मॉडल पर है। भारतीय कंपनियां अभी भी 'मैपॉवर' यानी लोगों की संख्या के आधार पर कमाई करती हैं। यानी एक प्रोजेक्ट में जितने लोग लगे हैं उनके काम के घंटों के अनुसार बिल तय होता है। लेकिन जब एआई घंटों का काम मिनटों में कर देगा, तो बिलिंग और कमाई दोनों गिर जाएंगी।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय आईटी कंपनियां धीरे-धीरे खुद को इस बदलाव के मुताबिक ढाल लेंगी। एआई को लागू करने, मैनेज करने और कस्टमाइज करने के लिए कंसल्टेंसी सर्विस की जरूरत बनी रहेगी और यही उनकी नई राह हो सकती है।

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