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Tech Explained: क्या है Claude Cowork, क्यों महज एक एआई टूल से खौफ में हैं सॉफ्टवेयर कंपनियां?
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Mon, 09 Feb 2026 06:01 AM IST
सार
Claude Cowork: पिछले हफ्ते शेयर बाजार में IT कंपनियों के शेयरों से करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये साफ हो गए। इसकी वजह बनी अमेरिकी AI कंपनी Anthropic और उसका नया टूल क्लाउड कोवर्क। क्या है यह टूल और इससे भारत और यूएस की सॉफ्टवेयर कंपनियां क्यों घबराई हुई हैं? आइए जानने की कोशिश करते हैं।
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Claude Cowork
- फोटो : AI
भारतीय आईटी सेक्टर के लिए पिछला हफ्ता किसी बुरे सपने से कम नहीं था। देश की पांच सबसे बड़ी आईटी कंपनियों के मार्केट कैप से करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये एक झटके में गायब हो गए। गौर करने वाली बात यह है कि इस भारी तबाही का कारण कोई बड़ी मंदी नहीं, बल्कि अमेरिका की एक एआई कंपनी एंथ्रोपिक (Anthropic) है। इस कंपनी में मात्र 2,500 कर्मचारी हैं, जबकि भारत की टॉप-5 आईटी कंपनियों में करीब 15 लाख लोग काम करते हैं। एंथ्रोपिक का एक नया प्रोडक्ट क्लाउड कोवर्क (Claude Cowork) दुनिया भर के निवेशकों के मन में डर पैदा करने का मुख्य कारण बना है।
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इंफोसिस
- फोटो : PTI
क्या सॉफ्टवेयर कंपनियों का अंत करीब है?
इस नए एआई टूल की वजह से अमेरिका में 'सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस' (SaaS) कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है। पुराने समय में एमएस ऑफिस (MS Office) जैसे सॉफ्टवेयर सीडी के जरिए लोड होते थे, लेकिन अब वे इंटरनेट से चलते हैं, इसी को SaaS कहते हैं। निवेशकों को डर है कि जब एआई खुद ही सॉफ्टवेयर बना सकता है और उसे मेंटेन भी कर सकता है, तो लोग इन कंपनियों को पैसे क्यों देंगे? इस स्थिति को बाजार के जानकारों ने 'सास-पॉकलिप्स' (SaaS-pocalypse) का नाम दिया है, जिसका अर्थ है सॉफ्टवेयर बिजनेस की महाप्रलय।
यह भी पढ़ें: क्या है जेम्स वेब टेलीस्कोप? जानिए उस मशीन के बारे में जिसने ढूंढ निकाला अंतरिक्ष में 'लाल आलू'
इस नए एआई टूल की वजह से अमेरिका में 'सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस' (SaaS) कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है। पुराने समय में एमएस ऑफिस (MS Office) जैसे सॉफ्टवेयर सीडी के जरिए लोड होते थे, लेकिन अब वे इंटरनेट से चलते हैं, इसी को SaaS कहते हैं। निवेशकों को डर है कि जब एआई खुद ही सॉफ्टवेयर बना सकता है और उसे मेंटेन भी कर सकता है, तो लोग इन कंपनियों को पैसे क्यों देंगे? इस स्थिति को बाजार के जानकारों ने 'सास-पॉकलिप्स' (SaaS-pocalypse) का नाम दिया है, जिसका अर्थ है सॉफ्टवेयर बिजनेस की महाप्रलय।
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टीसीएस
- फोटो : Agency
भारतीय IT कंपनियों के लिए खतरा क्यों है ज्यादा?
भारतीय आईटी कंपनियों का बड़ा बिजनेस मॉडल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से ज्यादा उसके मेंटेनेंस पर टिका है। यहां काम घंटों के हिसाब से बिल होता है और बड़ी संख्या में लोग इस प्रक्रिया में लगे रहते हैं। जब Claude Cowork एआई टूल के वजह से कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर डेवलप करने की जरूरत कम हो जाएगी, तो इसके मेंटेनेंस की जरूरत भी कम होने लगेगी। ऐसे में सॉफ्टवेयर कंपनियां जिनका काम मेंटेनेंस का है, उनपर इसका सीधा असर होगा।
भारतीय आईटी कंपनियों का बड़ा बिजनेस मॉडल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से ज्यादा उसके मेंटेनेंस पर टिका है। यहां काम घंटों के हिसाब से बिल होता है और बड़ी संख्या में लोग इस प्रक्रिया में लगे रहते हैं। जब Claude Cowork एआई टूल के वजह से कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर डेवलप करने की जरूरत कम हो जाएगी, तो इसके मेंटेनेंस की जरूरत भी कम होने लगेगी। ऐसे में सॉफ्टवेयर कंपनियां जिनका काम मेंटेनेंस का है, उनपर इसका सीधा असर होगा।
नौकरियों से ज्यादा बिजनेस को खतरा
- फोटो : Adobestock
नौकरियों से ज्यादा बिजनेस को खतरा
आईटी कंपनियों में भर्ती की रफ्तार पहले ही धीमी पड़ चुकी है। इस साल बड़ी आईटी कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती नौ महीनों में सिर्फ 17 लोगों की शुद्ध भर्ती की है। लेकिन जानकार मानते हैं कि असली संकट केवल नौकरियों पर नहीं बल्कि बिजनेस मॉडल पर है। भारतीय कंपनियां अभी भी 'मैपॉवर' यानी लोगों की संख्या के आधार पर कमाई करती हैं, जितने घंटे काम, उतना बिल। लेकिन जब एआई घंटों का काम मिनटों में कर देगा, तो बिलिंग और कमाई दोनों गिर जाएंगी।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय आईटी कंपनियां धीरे-धीरे खुद को इस बदलाव के मुताबिक ढाल लेंगी। एआई को लागू करने, मैनेज करने और कस्टमाइज करने के लिए कंसल्टेंसी सर्विस की जरूरत बनी रहेगी और यही उनकी नई राह हो सकती है।
आईटी कंपनियों में भर्ती की रफ्तार पहले ही धीमी पड़ चुकी है। इस साल बड़ी आईटी कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती नौ महीनों में सिर्फ 17 लोगों की शुद्ध भर्ती की है। लेकिन जानकार मानते हैं कि असली संकट केवल नौकरियों पर नहीं बल्कि बिजनेस मॉडल पर है। भारतीय कंपनियां अभी भी 'मैपॉवर' यानी लोगों की संख्या के आधार पर कमाई करती हैं, जितने घंटे काम, उतना बिल। लेकिन जब एआई घंटों का काम मिनटों में कर देगा, तो बिलिंग और कमाई दोनों गिर जाएंगी।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय आईटी कंपनियां धीरे-धीरे खुद को इस बदलाव के मुताबिक ढाल लेंगी। एआई को लागू करने, मैनेज करने और कस्टमाइज करने के लिए कंसल्टेंसी सर्विस की जरूरत बनी रहेगी और यही उनकी नई राह हो सकती है।