Apple Disease : सेब की लाली पर पीला संकट, बागवानों की बढ़ी चिंता; दवाएं भी नहीं रोक पा रहीं पत्तों का झड़ना
हिमाचल के कोटखाई क्षेत्र में सेब के बगीचों में पत्तियां पीली पड़ने और झड़ने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। बागवानों का कहना है कि महंगी दवाओं और विशेषज्ञों की सलाह के बावजूद बीमारी नियंत्रित नहीं हो रही। उद्यान विभाग ने अब विशेषज्ञ समिति गठित कर प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे और बीमारी के वास्तविक कारणों की जांच कराने का निर्णय लिया है।
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सेब के पेड़ों की पत्तियां पीली पड़ रही हैं। पत्ते सूखकर झड़ रहे हैं। कई बगीचों में हरियाली खत्म हो चुकी है। बागवान बागवानी विश्वविद्यालय और उद्यान विभाग की सलाह के अनुसार दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं, लेकिन बीमारी रुकने का नाम नहीं ले रही। उन्हें अब यह भी समझ नहीं आ रहा कि दवाओं में कमी है या फिर पेड़ों में कोई ऐसी नई बीमारी फैल चुकी है, जिसकी अब तक सही पहचान ही नहीं हो पाई है। अमर उजाला ने जिला शिमला की तहसील कोटखाई की पंचायत देवगढ़ के बागी, खड़की और पजौल गांवों में पहुंचकर बगीचों की स्थिति देखी। कई स्थानों पर पेड़ों की पत्तियां पीली होकर झड़ती मिलीं। बागवानों ने बताया कि यह समस्या रेड डिलीशियस किस्म में ही सबसे अधिक है। मौसम की मार होने से फसल पहले ही कम है और करीब सवा दो करोड़ करोड़ कार्टन सेब उत्पादन का अनुमान है, जबकि सामान्य वर्षों में इससे लगभग दोगुना उत्पादन होता रहा है।
विशेषज्ञ भी करेंगे नए सिरे से जांच : बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश शर्मा ने बताया कि पतझड़ रोग और इससे जुड़े मामलों के आकलन के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की जा रही है। समिति प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर वास्तविक स्थिति का अध्ययन करेगी। पता लगाएगी कि इस समस्या का मुख्य कारण क्या है तथा इससे निपटने के लिए आगे क्या रणनीति अपनाई जानी चाहिए। बागवानी विवि के विशेषज्ञों से भी संपर्क किया जाएगा।
बागी गांव के बागवान प्रकाश पीठ पर मशीन उठाए बगीचे में इसलिए कलर स्प्रे कर रहे हैं कि कहीं पत्ते पूरे झड़ गए तो फल भी नहीं बचेंगे। वह कहते हैं कि तीन वर्षों से पतझड़ रोग तेजी से बढ़ रहा है। इस बार भी अधिकांश बगीचे इसकी चपेट में हैं। वह बागवानी विवि और उद्यान विभाग की सलाह के अनुसार ही दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे। अब बागवानों का भरोसा भी डगमगाने लगा है। खड़की गांव के बड़े बागवान रमेश शर्मा का कहना है कि विभाग और विशेषज्ञ 15-20 दिन के अंतराल पर फफूंदनाशकों का छिड़काव करने की सलाह देते हैं।
उन्होंने पूरा शेड्यूल अपनाया, फिर भी बीमारी नहीं रुक रही। विशेषज्ञ इसे मार्सोनिना और अल्टरनेरिया बता रहे हैं, लेकिन हो सकता है कि कोई और ही महामारी हो। वह याद दिलाते हैं कि पहले भी बरसात होती थी, लेकिन इस तरह के हालात कभी नहीं बने। पहले उनके बगीचे से 4000 से 5000 कार्टन सेब निकलते थे और इस बार उत्पादन घटकर लगभग 1800 से 2000 कार्टन रहने का अनुमान है। खड़की में ही दिलाराम शर्मा अपने आंगन में रेड गोल्डन सेब कार्टन में भरवा रहे हैं। वह भी कहते हैं कि इस बार पत्तियां समय से पहले पीली पड़ रही हैं। पजौल गांव के प्रगतिशील बागवान प्रताप चौहान बोले, पिछले कुछ वर्षों से मार्सोनिना और अल्टरनेरिया जैसे रोगों का प्रकोप बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की महंगी दवाएं भी बेअसर हैं।