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हिमाचल: विदेशों में बैन सेब दवाएं कर दीं स्प्रे शेड्यूल में शामिल, नौणी विवि ने दिए जांच के आदेश

Tue, 14 Jul 2026 05:10 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 14 Jul 2026 05:10 AM IST
सार

 सेब के बगीचे इन दिनों मार्सोनिना और अल्टरनेरिया जैसी बीमारियों की चपेट में हैं। मौसम की मार झेल रहे बागवानों के लिए इन रोगों ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। 

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Apple pesticides banned abroad included in spray schedule; Nauni University orders inquiry.
नौणी विवि - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश में सेब के बगीचे इन दिनों मार्सोनिना और अल्टरनेरिया जैसी बीमारियों की चपेट में हैं। मौसम की मार झेल रहे बागवानों के लिए इन रोगों ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। इस बीच डॉ. वाइएस परमार बागवानी एवं वानिकी विवि नौणी के स्प्रे शेड्यूल, अनुसंधान पर सवाल उठने लगे हैं। नौणी विवि के पूर्व कुलपति डॉ. विजय सिंह ठाकुर ने न सिर्फ पौध संरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाया है, बल्कि विदेशों में बैन कुछ दवाओं को हिमाचल में सेब के स्प्रे शेड्यूल में शामिल करने का आरोप लगाया है। इस आरोप के बाद नौणी विवि की ओर से जांच के आदेश दिए गए हैं।

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पूर्व वीसी डॉ. विजय सिंह ठाकुर का कहना है कि वर्ष 2016 तक मार्सोनिना रोग सीमित फफूंदनाशकों से काफी हद तक नियंत्रित था और अल्टरनेरिया महामारी के रूप में सामने नहीं आया था। उनका आरोप है कि 2016 के बाद स्प्रे शेड्यूल में किए गए बदलावों और नई फफूंदनाशक दवाओं को शामिल करने की नीति से स्थिति बिगड़ी। उन्होंने दावा किया कि सतही परीक्षणों के आधार पर नई दवाओं को शेड्यूल में शामिल किया गया और कीटनाशक कंपनियों के उत्पादों को बढ़ावा मिला। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि मैनकोजेब और कार्बेन्डाजिम जैसे फफूंदनाशक प्रभावी थे तो विदेशों में प्रतिबंधित कुछ दवाओं को भारत में विशेषकर सेब के लिए क्यों शामिल किया गया। यदि वैज्ञानिक परीक्षण सफल रहे होते तो मार्सोनिना और अल्टरनेरिया हर वर्ष महामारी का रूप नहीं लेते। उन्होंने वर्ष 1984 से लागू सेब स्प्रे शेड्यूल की स्वतंत्र समीक्षा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

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मार्सोनिना और अल्टरनेरिया पर भी दीर्घकालिक शोध की जरूरत : चौहान
फल, फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा कि जिस तरह 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने स्कैब रोग पर प्रभावी नियंत्रण पाया था, उसी तरह मार्सोनिना और अल्टरनेरिया पर भी दीर्घकालिक शोध और प्रभावी रणनीति विकसित की जानी चाहिए। वर्तमान में न तो दवाइयां अपेक्षित परिणाम दे रही हैं और न ही वैज्ञानिकों की सिफारिशें कारगर साबित हो रही हैं। बागवान विवि की ओर से जारी स्प्रे शेड्यूल का पालन कर रहे हैं, इसके बावजूद हर वर्ष रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है।

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ये दवाएं विदेश में बैन
स्प्रे शेड्यूल के क्रमांक-4 में शामिल फेनाजाक्विन यूरोप में पूरी तरह प्रतिबंधित है, क्योंकि इसे जलीय जीवों के लिए अत्यधिक विषैला माना गया है। अमेरिका में इसका उपयोग सीमित फसलों पर ही अनुमति प्राप्त है। सेब पर इसके लिए कड़े नियम लागू हैं। क्रमांक-5 में प्रोपारगाइट माइट्स नियंत्रण के लिए प्रयुक्त होती है, लेकिन यह भी यूरोप में प्रतिबंधित है और अमेरिका में कैंसर संबंधी आशंकाओं के कारण कई खाद्य फसलों पर इसका उपयोग प्रतिबंधित या अत्यधिक सीमित है। क्रमांक-7 में ऑक्सी-डेमेटोन मिथाइल भी अमेरिका और यूरोप में प्रतिबंधित है। इसके अलावा कार्बेंडाजिम सहित कई अन्य रसायनों पर भी विभिन्न देशों में प्रतिबंध लागू हैं।

स्प्रे शेड्यूल की समीक्षा की जाएगी। निदेशक अनुसंधान को इस मामले की छानबीन करने को कहा गया है।-डॉ. एचएस बवेजा, कुलपति, बागवानी विश्वविद्यालय


स्प्रे शेड्यूल विश्वविद्यालय और उद्यान विभाग की संयुक्त समिति ने भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार तैयार किया है और इसमें किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है।- डॉ. अनिल हांडा, अध्यक्ष एवं प्रोफेसर, पादप रोग विभाग, नौणी विवि

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