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Himachal: हिमाचल में चरस-गांजा और चिट्टे की खपत राष्ट्रीय औसत से ज्यादा, आंकड़ों में खुलासा

Wed, 19 Aug 2026 10:17 AM IST
Krishan Singh अनिमेष कौशल, शिमला।
अनिमेष कौशल, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 19 Aug 2026 10:17 AM IST
सार

कभी चरस की खेती और तस्करी तक सीमित रही समस्या अब चिट्टे, इंजेक्शन, एमडीएमए और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स के रूप में युवाओं की नसों तक पहुंच रही है। हालात यह है कि प्रदेश धीरे- धीरे नशे के ट्रांजिट कॉरिडोर से आगे बढ़कर इसके उपभोक्ता राज्य का स्वरूप लेने लगा है। 

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Consumption of charas, cannabis, and 'chitta' in Himachal exceeds the national average; data reveals.
चिट्टा-चरस व गांजा की खपत राष्ट्रीय औसत से ज्यादा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवभूमि हिमाचल प्रदेश में नशा अब चिंताजनक स्थिति में पहुंच गया है। कभी चरस की खेती और तस्करी तक सीमित रही समस्या अब चिट्टे, इंजेक्शन, एमडीएमए और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स के रूप में युवाओं की नसों तक पहुंच रही है। हालात यह है कि प्रदेश धीरे- धीरे नशे के ट्रांजिट कॉरिडोर से आगे बढ़कर इसके उपभोक्ता राज्य का स्वरूप लेने लगा है। कभी पंजाब और उत्तर-पूर्वी राज्य नशे के गढ़ थे लेकिन अब हिमाचल हॉट-स्पॉट बन गया है। राज्य सचिवालय शिमला में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की ओर से मादक पदार्थों के सेवन और तस्करी के विरुद्ध हितधारकों के लिए आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में प्रस्तुत आंकड़ों को पेश करते हुए विशेषज्ञों ने हिमाचल में बढ़ते नशे के खतरे की गंभीर तस्वीर सामने रखी।

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सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर की रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल में चरस और गांजा का सेवन राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में चिट्टा सबसे तेजी से फैलने वाले नशों में शामिल हुआ है। प्रदेश में 1.7 प्रतिशत आबादी चिट्टे का सेवन कर रही है। देश की औसत 0.7 प्रतिशत है। देश में भांग और गांजा का 3 करोड़ और चिट्टा के 2.50 करोड़ लोग सेवन कर रहे हैं। प्रदेश की करीब 3.2 प्रतिशत आबादी भांग और गांजा उत्पादों का सेवन करती है, जबकि राष्ट्रीय औसत एक फीसदी है। हालांकि, पड़ोसी राज्य पंजाब से हिमाचल के एक फीसदी कम लोग चिट्टा ले रहे हैं। वहीं, प्रदेश में ऐसे मामले भी बढ़े हैं कि जिनमें चिट्टे से छुटकारा पाने के लिए दर्द निवारक दवाओं की ओवरडोज ले रहे हैं। इससे भी कई जानें जा रही हैं।
 

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कार्यशाला में सामाजिक संस्था के प्रतिनिधि विजय कुमार ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि पहले जहां नशे का स्वरूप मुख्य रूप से चरस और शराब तक सीमित था, वहीं अब इंजेक्शन के माध्यम से लिए जाने वाले नशे, केमिकल ड्रग्स और पार्टी ड्रग्स का चलन भी बढ़ रहा है। भारत सरकार की रिपोर्ट में हिमाचल की भौगोलिक स्थिति को नशा तस्करी के लिए संवेदनशील बताया गया। पंजाब से हेरोइन और अन्य ओपिओइड्स की खेप हिमाचल तक पहुंच रही है, जबकि उत्तराखंड, चंडीगढ़ और दिल्ली से सिंथेटिक ड्रग्स का नेटवर्क सक्रिय है। पहले हिमाचल को नशे की तस्करी का मार्ग माना जाता था, लेकिन अब यहां मांग बढ़ने के कारण राज्य स्वयं बड़ा उपभोक्ता बाजार बनता जा रहा है।

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शानो-शौकत की चाह में तस्कर बन रहे युवा
मानसिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. कुशल वर्मा ने बताया गया कि नशे के काले कारोबार में अब बड़ी संख्या में युवा तस्कर के रूप में शामिल हो रहे हैं। महंगे मोबाइल फोन, लग्जरी जीवनशैली, त्वरित कमाई और सोशल मीडिया पर दिखने वाली चमक-दमक का प्रभाव युवाओं को इस अवैध कारोबार की ओर आकर्षित कर रहा है। कई मामलों में नशा करने वाले युवा ही बाद में इसकी तस्करी और बिक्री से जुड़ जाते हैं, जिससे वे स्वयं अपराध के चक्र में फंस जाते हैं।

तंबाकू और शराब बन रहे नशे की पहली सीढ़ी
विशेषज्ञों ने बताया कि अधिकांश मामलों में नशे की शुरुआत तंबाकू और शराब से होती है। किशोरावस्था में सिगरेट, हुक्का, ई-सिगरेट या शराब का सेवन करने वाले युवाओं में आगे चलकर चरस, चिट्टा और अन्य नशीले पदार्थों की ओर झुकाव अधिक पाया जाता है। रिपोर्ट में इसे गेटवे ड्रग प्रभाव बताया गया है, जिसके तहत हल्के नशे धीरे-धीरे गंभीर और खतरनाक नशों तक पहुंचने का रास्ता बनाते हैं।

तीन साल में नशे की ओवरडोज से 66 लोगों की मौत
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2023 से 31 जनवरी 2026 तक नशे की ओवरडोज के कारण 66 लोगों की मौत हुई है। 2023 में 8, 2024 में 31 और 2025 में 27 मौतें दर्ज की गईं। विधानसभा के बीते सत्र में सरकार की ओर से यह जानकारी दी गई थी।

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