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हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: केस लंबित रहने के दौरान खरीदी गई जमीन पर बोनाफाइड खरीदार का दावा अमान्य

Thu, 29 Oct 2026 05:38 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 29 Oct 2026 05:38 PM IST
सार

 हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अदालत में केस लंबित रहने के दौरान विवादित संपत्ति खरीदता है, तो उसे कानूनन बोनाफाइड खरीदार का संरक्षण नहीं मिल सकता। 

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Himachal High Court: Claim of a bona fide purchaser over land bought while a case is pending is invalid.
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति विवादों में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अदालत में केस लंबित रहने के दौरान विवादित संपत्ति खरीदता है, तो उसे कानूनन बोनाफाइड खरीदार का संरक्षण नहीं मिल सकता। न्यायालय ने कहा कि ऐसे खरीदार पर लिस पेंडेंस का सिद्धांत लागू होता है और वह मुकदमे के अंतिम फैसले से पूरी तरह बंधा रहेगा, भले ही वह मूल मुकदमे में पक्षकार न रहा हो। न्यायाधीश राकेश कैंथला की अदालत ने ऊना जिले से जुड़ी एक अपील को खारिज करते हुए दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सदभावी खरीदार को मिलने वाला संरक्षण केवल उन सौदों पर लागू होता है जो मुकदमा दायर होने से पहले किए गए हो। अपीलकर्ताओं का कहना था कि वे मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं थे, इसलिए डिक्री उन पर लागू नहीं होती।

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कोर्ट ने कहा कि वादी के लिए केस के बीच में आने वाले हर नए खरीदार को पार्टी बनाना आवश्यक नहीं है, अन्यथा मुकदमेबाजी कभी खत्म ही नहीं होगी। अदालत ने कहा कि अगर केस के दौरान संपत्ति खरीदने वालों को संरक्षण दिया जाने लगा, तो कोई भी डिक्री होल्डर कभी अपने हक का फल नहीं चख पाएगा। जैसे ही वादी निष्पादन के लिए कोर्ट जाएगा, देनदार संपत्ति किसी और को ट्रांसफर कर देगा और यह सिलसिला अनंत काल तक चलता रहेगा, जिससे अदालत की डिक्री महज एक पेपर टाइगर बनकर रह जाएगी।

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मूल वादी जगन्नाथ ने सरवानी देवी के खिलाफ 4,000 के प्रतिफल में जमीन बेचने के समझौते के अनुपालन के लिए एक दीवानी मुकदमा दायर किया था। अदालत ने वादी जगन्नाथ के पक्ष में डिक्री पारित की थी। जब डिक्री के निष्पादन की प्रक्रिया शुरू हुई, तो प्रीतम सिंह और ज्ञान चंद ने इस पर आपत्ति जताई। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने सरवानी देवी से जून 1986 और अक्तूबर 1987 में रजिस्ट्री के जरिये यह जमीन खरीदी है और वे बिना किसी नोटिस के इसके पूर्ण मालिक हैं। रिकॉर्ड के अनुसार जगन्नाथ ने अदालत में मुकदमा 3 जून 1986 को सुबह 10:15 बजे या उससे पहले दर्ज कराया था। जबकि ज्ञान चंद के पक्ष में उसी दिन (3 जून 1986) बाद में रजिस्ट्री करवाई गई थी। प्रीतम सिंह की रजिस्ट्री अक्तूबर 1987 में हुई थी।

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एग्जीक्यूटिव कोर्ट ने पहले खरीदारों की आपत्ति को स्वीकार करते हुए बेची गई जमीन को छोड़कर शेष भूमि पर डिक्री लागू करने का आदेश दिया था। लेकिन, जब यह मामला प्रथम अपीलीय अदालत पहुंचा, तो कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए कहा कि मुकदमे के लंबित रहने के दौरान की गई बिक्री अवैध है। इसके खिलाफ खरीदारों ने हाईकोर्ट में अपील की थी। अपीलकर्ताओं का तर्क था कि रजिस्ट्री के समय उन्हें कोर्ट के किसी स्टे ऑर्डर की जानकारी नहीं थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिस पेंडेंस (टीपीए की धारा 52) का सिद्धांत कोर्ट की ओर से नोटिस जारी करने के समय से नहीं, बल्कि जैसे ही अदालत में वाद प्रस्तुत किया जाता है, उसी क्षण से प्रभावी हो जाता है। चूंकि दोनों रजिस्ट्रियां केस दर्ज होने के बाद की गईं, इसलिए खरीदार इस कानून के दायरे में आते हैं।

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