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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- गवाहों से जिरह सच के लिए हो, उत्पीड़न के लिए नहीं

Wed, 22 Jul 2026 06:10 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 22 Jul 2026 06:10 AM IST
सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक मुकदमों में गवाहों से की जाने वाली जिरह (बहस) की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 

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Himachal High Court says cross examination of witnesses should be for the sake of truth, not harassment.
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक मुकदमों में गवाहों से की जाने वाली जिरह (बहस) की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आरोपी को गवाह से असीमित या अप्रासंगिक पूछताछ करने का अधिकार नहीं है। जिरह का उद्देश्य सत्य को सामने लाना है, न कि गवाह का उत्पीड़न करना या अदालत का कीमती समय नष्ट करना। न्यायाधीश राकेश कैंथला की अदालत ने दिनेश चंद्र शर्मा की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) ऊना के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि जजों और मजिस्ट्रेट को जिरह की अवधि और सीमा पर प्रभावी नियंत्रण रखना चाहिए। लंबी और अप्रासंगिक जिरह न केवल मुकदमेबाजी का खर्च बढ़ाती है, बल्कि जनता के समय और धन की भी बर्बादी करती है।

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जिरह का इस्तेमाल गवाह को परेशान करने या नीचा दिखाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। मामले के अनुसार याचिकाकर्ता निचली अदालत में एक आपराधिक मामले में आरोपी है। निचली अदालत में अभियोजन पक्ष के गवाह विनोद कुमार कपिला से याचिकाकर्ता ने लगातार तीन दिन तक जिरह की, जो कुल 35 पन्नों में दर्ज हुई। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने जिरह का अधिकार समाप्त कर दिया था। याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत अर्जी देकर गवाह को पुनः समन करने की मांग की। तर्क दिया गया कि गवाह बुद्धिजीवी वर्ग से है और उससे सच निकलवाने के लिए और पूछताछ की जरूरत है, जिससे धारा 250 सीआरपीसी (गलत शिकायत पर मुआवजे का दावा) के तहत आधार बनाया जा सके। सीजेएम ऊना ने 6 मार्च 2026 को याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि गवाह से पर्याप्त जिरह हो चुकी है और आदेश को वापस लेना समीक्षा करने जैसा होगा। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

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याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करने वाला डीसी कुल्लू का आदेश किया रद्द
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सरकार या संबंधित विभाग किसी कर्मचारी को चपरासी के पद पर नियुक्त कर उससे बस्ताबरदार का काम लेता है, तो कर्मचारी को उस पूरे कार्यकाल के लिए दोनों पदों के समान वेतन का अंतर पाने का पूर्ण कानूनी अधिकार है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने उपायुक्त कुल्लू की ओर से पारित 22 अगस्त 2023 को जारी उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि जिस तिथि से याचिकाकर्ता से बस्ताबरदार का काम लिया जा रहा है और जब तक वह यह कार्य करता रहेगा, तब तक विभाग उसे चपरासी और बस्ताबरदार के वेतन के अंतर का भुगतान करेगा। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता हुकम राम की नियुक्ति राजस्व विभाग में चपरासी (क्लास 4 ग्रुप डी) के पद पर हुई थी। हालांकि, नियमितीकरण के बाद विभाग उससे लगातार बस्ताबरदार का काम ले रहा था। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि वर्ष 1986 से बस्ताबरदार के पद के अनुसार संशोधित वेतनमान तथा बकाया वेतन पर ब्याज दिया जाए। वर्ष 2009 के हाईकोर्ट के एक पुराने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें बताया गया है कि बस्ताबरदारों का वेतनमान संशोधित किया जा चुका है और वे चपरासी के मुकाबले अधिक वेतन प्राप्त करते हैं। वहीं सरकार ने दलील दी कि चपरासी और बस्ताबरदार दोनों ही चतुर्थ श्रेणी के पद हैं। दोनों के भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अनुसार वेतनमान समान हैं। इसके अलावा याचिकाकर्ता को बस्ताबरदार का कार्य देखने के लिए 100 रुपये प्रतिमाह का विशेष वेतन भत्ता दिया जा रहा है। इसलिए वेतन में कोई विसंगति नहीं है।

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