Himachal: 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति लाभ वाले आदेश पर हिमाचल हाईकोर्ट ने लगाई रोक, जानें पूरा मामला
प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार को बड़ी राहत देते हुए 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति लाभ वाले आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार को बड़ी राहत देते हुए 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति लाभ वाले आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करते हुए पूर्व में खारिज की गई अपील को दोबारा बहाल कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने कर्मचारी को 60 वर्ष तक सेवा लाभ देने के एकल न्यायाधीश की ओर से पारित 15 जुलाई 2024 में पारित किए गए फैसले के क्रियान्वयन और संचालन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से पुनर्विचार याचिका दायर करने में हुई 175 दिनों की देरी को माफ कर दिया है। हालांकि, इससे पहले 13 मार्च 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को यह कहकर खारिज कर दिया था कि सत्या देवी समान मामले में कर्मचारी को 60 वर्ष की आयु तक सेवा लाभ देने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट से कोई रोक नहीं थी। राज्य सरकार ने अदालत को अवगत कराया कि 24 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह के जुड़े हुए अन्य मामलों में रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट के इस मामले को आधार मानते हुए खंडपीठ ने पुनर्विचार याचिका को मंजूरी दी और 13 मार्च 2025 को पारित अपने ही पुराने आदेश को वापस ले लिया। अब इस मामले की अंतिम सुनवाई इसी तरह के एक अन्य लंबित मामले हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम रुक्मी देवी व अन्य के साथ संयुक्त रूप से की जाएगी। उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष की है। यदि उन्हें 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त किया जाता है, तो यह गैरकानूनी और भेदभावपूर्ण माना जाएगा। इसी आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार ने रिव्यू पिटीशन दायर की है, जिस पर खंडपीठ अब दोबारा फैसला करेगी।
भरण-पोषण भत्ता न देने पर पति को जेल भेजना अवैध नहीं : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों को कोर्ट की ओर से तय भरण-पोषण भत्ता नही देता है, तो मजिस्ट्रेट उसे हर महीने के डिफॉल्ट (बकाया) के लिए अलग-अलग अवधि की जेल की सजा सुना सकता है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में कुल सिविल कारावास की अवधि एक महीने से अधिक होने पर भी उसे कानूनन अवैध नहीं माना जा सकता। रीता देवी और उनकी दो नाबालिग बेटियों ने गुजारा भत्ता न मिलने पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
उन्होंने जून 2018 से 2019 के बीच का कुल 60,000 रुपये (5 हजार रुपये प्रति माह) का बकाया वसूलने के लिए अदालत में आवेदन दायर किया था। सुनवाई के दौरान निचली अदालत ने पति को पैसे जमा करने का मौका दिया, लेकिन रकम न चुकाने पर शिमला के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) ने सख्त रुख अपनाया। मजिस्ट्रेट ने जून 2018 के बकाये के लिए पति को 30 दिन, जुलाई के लिए 15 दिन और अगस्त के लिए 25 दिन के सिविल कारावास की सजा सुनाई थी। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (3) के तहत मजिस्ट्रेट किसी को भी एक बार में एक महीने से अधिक की जेल नहीं भेज सकता।