हिमाचल: अध्ययन में बड़ा खुलासा, किन्नौर की लोक संस्कृति बचा रही 105 पौध प्रजातियां, आठ संकट की श्रेणी में
किन्नौर की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में 105 पौध प्रजातियों का इस्तेमाल होता है। हिमालयी वन अनुसंधान संस्थान, शिमला के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, पूजा-पाठ, त्योहारों, विवाह और अन्य अनुष्ठानों में इन वनस्पतियों के उपयोग से पारंपरिक संरक्षण ज्ञान पीढ़ियों से सुरक्षित है। अध्ययन में 8 प्रजातियों को संकट की विभिन्न श्रेणियों में पाया गया है।
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किन्नौर की लोक संस्कृति और परंपराएं सामाजिक पहचान के साथ स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। किन्नौरा समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में 105 पौध प्रजातियों का इस्तेमाल होता है। पूजा-पाठ, देवी-देवताओं के अनुष्ठान, त्योहार, विवाह और अन्य सामाजिक परंपराओं में इनका पीढ़ियों से इस्तेमाल होने के कारण इनके संरक्षण से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी समुदाय में सुरक्षित है। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के हिमालयी वन अनुसंधान संस्थान शिमला की वैज्ञानिक स्वर्ण लता और शिव पाल के अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है।
उनका अध्ययन रोमानिया से प्रकाशित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कंजरवेशन साइंस में भी प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों ने किन्नौरा जनजाति की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में इस्तेमाल होने वाली वनस्पतियों की विविधता, पारंपरिक उपयोग और संरक्षण की स्थिति का अध्ययन किया है। उन्होंने प्राकृतिक रूप से मौजूद पौधों की संख्या का नियमित आकलन करने, मांग और उपलब्धता का अध्ययन करने तथा जरूरत के अनुसार इनके संवर्धन की तकनीक विकसित करने की सिफारिश की है।
अध्ययन में 105 प्रजातियां, 79 वंश और 39 वनस्पति कुल दर्ज किए गए। इनमें 14 पेड़, 17 झाड़ियां, 73 जड़ी-बूटियां और एक लता शामिल है। इनमें 52 प्रजातियां हिमालयी क्षेत्र की मूल प्रजातियां और 15 लगभग स्थानिक हैं। पौधों के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल विभिन्न परंपराओं में होता है। इनमें फूलों का उपयोग सबसे अधिक पाया गया। फूल देवी-देवताओं को अर्पित करने, त्योहारों और सजावट में इस्तेमाल किए जाते हैं। पत्तियां, टहनियां, जड़, फल, तना और बीज भी धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होते हैं।
अध्ययन में कई पारंपरिक उपयोग दर्ज किए गए हैं। नरकसंग के पत्तों का शिवरात्रि पर महादेव से जुड़े पारंपरिक विधान में इस्तेमाल होता है। इसके फूल स्थानीय उत्सवों में देवी-देवताओं को चढ़ाने के साथ पारंपरिक पहनावे में भी लगाए जाते हैं। बुरांश, खैपा (जंगली गुलाब), लोसर और चीड़ की लकड़ी का इस्तेमाल भी पूजा और अन्य कारजों में होता है। विवाह जैसे सामाजिक संस्कारों में भी कुछ वनस्पतियों की पत्तियों और अन्य हिस्सों का उपयोग किया जाता है।
18 प्रजातियां संकट की श्रेणी में
8 प्रजातियां संकट की विभिन्न श्रेणियों में पाई गई हैं। इनमें सालम पंजा, कुटकी, अतीस और चिलगोजा प्रमुख हैं। बढ़ती मांग, प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना और जरूरत से अधिक दोहन इनके लिए चुनौती बन रहे हैं।