हिमाचल: पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट के फैसले पर सीएम सुखविंद्र सुक्खू का बड़ा बयान, जानें क्या कहा
पंचायत चुनाव को समय पर करवाने को लेकर प्रदेश हाईकोर्ट में की ओर से आए फैसले पर सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।
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हिमाचल में पंचायत चुनाव को समय पर करवाने को लेकर प्रदेश हाईकोर्ट में की ओर से आए फैसले पर सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। शुक्रवार को शिमला में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में सीएम सुक्खू ने कहा कि हाईकोर्ट ने जो पंचायत चुनाव पर फैसला दिया है, वो किस कानून के तहत दिया है, जबकि प्रदेश में आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू है। इसका मतलब तो यह हुआ कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के कोई मायने ही नहीं हैं। सीएम ने आगे कहा, 'अच्छा तो यह होता कि वो(कोर्ट) सरकार से पूछते, हम तो खुद ही चाहते हैं कि अप्रैल-मई में चुनाव हो। बच्चों की परीक्षाएं खत्म हो। लेकिन अब कानूनी व्याख्या की बात है। क्योंकि जो हाईकोर्ट के फैसले आ रहे हैं, उसमें कहीं न कहीं कानून की व्याख्या नहीं हो रही और आर्बिट्रेरी निर्णय हो रहे हैं। हमारा मानना है कि प्रदेश में आपदा एक्ट लगा है और एक्ट के तहत सभी चीजों की संभावनाओं को लेकर आगे बढ़ा जाता है।'
सीएम ने कहा कि फैसले का अध्ययन करेंगे। उसके बाद जो भी कानूनी कार्रवाई करनी होगी, करेंगे। आपदा प्रबंधन अधिनियम संसद में बना है, उसके कोई मायने हैं या नहीं। उस संभावना को हम तलाशेंगे। आपदा प्रबंधन अधिनियम के मायने क्या है, इसकी व्याख्या हम कोर्ट से पूछेंगे। दिसंबर-जनवरी को चुनाव करवाते तो बर्फबारी से दिक्कतें आती हैं। इससे पहले मुख्यमंत्री सुक्खू ने शिमला में 12 एंटी चिट्टा, 4 एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग वाहनों व 2 एंबुलेंस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
पंचायतीराज चुनाव टालने की कांग्रेस की मंशा पर हाईकोर्ट की चोट: संजीव कटवाल
भाजपा प्रदेश महामंत्री संजीव कटवाल ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि इस सरकार की कभी भी यह मंशा नहीं रही कि वह पंचायतीराज चुनाव करवाए। यदि कांग्रेस सरकार का बस चलता तो वह पंचायत चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देती। भाजपा ने पंचायतों में लोकतंत्र बहाल करने के लिए लगातार संघर्ष किया और आज हम प्रदेश उच्च न्यायालय का धन्यवाद करते हैं कि उसने सरकार को कड़ा निर्देश देते हुए समयबद्ध तरीके से चुनाव करवाने के आदेश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने न तो पंचायत प्रतिनिधियों को विश्वास में लिया और न ही चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में गंभीरता दिखाई। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से यह साफ हो गया है कि सरकार लोकतंत्र से डर रही थी और चुनी हुई पंचायतों के बिना प्रशासन चलाना चाहती थी।