हिमाचल: एनएचएआई और कंपनी को 2.23 करोड़ मुआवजा देने का आदेश, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले
हाईकोर्ट ने शिमला बाईपास (एनएच-5) के फोरलेन निर्माण के दौरान अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ी की कटाई और लापरवाही के कारण चमियाना में बहुमंजिला इमारतों को पहुंचे नुकसान पर कड़ा संज्ञान लिया है। जानें हिमाचल हाईकोर्ट के बड़े फैसले...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला बाईपास (एनएच-5) के फोरलेन निर्माण के दौरान अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ी की कटाई और लापरवाही के कारण चमियाना में बहुमंजिला इमारतों को पहुंचे नुकसान पर कड़ा संज्ञान लिया है। खंडपीठ ने नाराजगी जताई कि जुलाई 2025 में ही एडीएम और लोक निर्माण विभाग ने संपत्ति के नुकसान का आकलन कर लिया था लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पीड़िता रंजना देवी को एनएचएआई या ठेकेदार की ओर से एक पैसा भी नहीं दिया गया। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एनएचएआई (राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) और निर्माणकर्ता कंपनी गावर शिमला हाईवे प्राइवेट लिमिटेड को आदेश दिया है कि वे रंजना देवी को 2,23,55,924 रुपये के कुल मुआवजे का 50-50 प्रतिशत हिस्सा चार सप्ताह के भीतर अदा करें।
चंदा देवी समेत छह अन्य इमारतें भी खतरे की जद में
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एनएचएआई यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि निर्माण कार्य ठेकेदार की ओर से किया जा रहा था। अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की निगरानी में हो रहे काम में हुई लापरवाही के कारण ही चार मंजिला इमारत चंद सेकंड में जमींदोज हो गई। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश में निर्माण कार्य कर मोटा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि वे प्रभावित स्थानीय निवासियों को हुए नुकसान की भरपाई करें। अगली सुनवाई 23 सितंबर को होगी। यह जनहित याचिका चंदा देवी की ओर से भेजे गए पत्र पर शुरू की गई थी। चंदा देवी का साढ़े तीन मंजिला मकान रंजना देवी के ढहे हुए मकान के ठीक पीछे स्थित है, जो पूरी तरह असुरक्षित हो चुका है। तहसीलदार (ग्रामीण) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि इस निर्माण कार्य से चंदा देवी के अलावा 6 अन्य लोगों की इमारतें भी भूस्खलन की जद में आ चुकी हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि चंदा देवी के असुरक्षित घोषित मकान के नुकसान का आकलन भी तय प्रक्रिया के तहत जल्द पूरा किया जाए।
प्रशासनिक चूक का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेगा: हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने तबादले के दौरान पद खाली नहीं होने के कारण काम पर न जुड़ पाने वाली एक सेवानिवृत्त स्कूल प्रिंसिपल के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने माना है कि जब विभाग की लापरवाही के कारण कर्मचारी अपने नए स्टेशन पर ज्वाइन न कर सके, तो उस अवधि को लीव ऑफ काइंड ड्यू के रूप में नहीं काटा जा सकता और कर्मचारी उस अवधि के पूरे वेतन का हकदार है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता अनिल कुमारी को एक अगस्त 2008 से आठ जनवरी 2009 तक की अवधि का पूरा वेतन अगले तीन महीन के भीतर जारी किया जाए। यदि विभाग तीन महीने के भीतर इस राशि का भुगतान करने में विफल रहता है, तो याचिकाकर्ता को भुगतान की तिथि तक छह फीसदी वार्षिक दर से ब्याज भी देय होगा।
अदालत ने याचिकाकर्ता अनिल कुमारी की याचिका को स्वीकार करते हुए 18 दिसंबर 2014 के विवादित सरकारी आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि तबादले के आदेश जारी करने से पहले विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह सुनिश्चित करे कि संबंधित स्टेशन पर पद खाली है या नहीं। जब याचिकाकर्ता ड्यूटी पर जाने को तैयार थी लेकिन पहले से किसी अन्य अधिकारी के कार्यरत होने के कारण ज्वाइन नहीं कर पाई, तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता की एक अगस्त 2008 से आठ जनवरी 2009 (पांच महीने और आठ दिन) की गैर हाजिरी की अवधि को नियमित तो कर दिया था, लेकिन शर्त लगाई थी कि इसे उनकी छुट्टियों (लीव ऑफ काइंड डयू) से काटा जाएगा। अदालत ने इस शर्त को पूरी तरह से गैर-कानूनी और अन्यायपूर्ण करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी माना कि सरकार की ओर से 25 सितंबर 2014 को जारी दिशानिर्देशों को 2008-09 के मामले पर लागू नहीं किया जा सकता।
बद्दी में बॉर्नविटा प्लांट बंद करने के मामले में हाईकोर्ट से कर्मचारियों को अंतरिम राहत देने से इन्कार
प्रदेश हाईकोर्ट ने बद्दी स्थित प्लांट की बॉर्नविटा लाइन बंद करने के खिलाफ श्रमिकों की याचिका पर एकल जज के फैसले के खिलाफ अंतरिम राहत के लिए दायर लेटर पेटेंट अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले में कर्मचारियों को अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि मामले में अभी तक जवाब-दावे की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है और तथ्यात्मक पहलू पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए इस चरण पर कर्मचारी अधिकार के तौर पर अंतरिम राहत का दावा नहीं कर सकते। अदालत ने नोट किया कि यह मामला पहले से ही औद्योगिक न्यायाधिकरण शिमला के समक्ष धारा 33 ए के तहत विचाराधीन है।
इसके अलावा, ले-ऑफ और संबंधित विषयों पर उच्च न्यायालय में पहले से ही अन्य याचिकाएं लंबित हैं। एकल न्यायाधीश ने पहले ही मोंडेलेज़ प्रबंधन को 25 अगस्त 2026 तक अपना अंतिम जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस अपील को खारिज करने संबंधी टिप्पणियां केवल इस एलपीए के निपटारे के लिए की गई हैं और ये सिंगल जज के समक्ष लंबित मुख्य मामले या किसी अंतरिम आदेश पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेंगी। बताया गया कि कंपनी ने बद्दी यूनिट-1 स्थित बॉर्नविटा लाइन को 4 अगस्त 2026 से बंद करने का नोटिस दिया था, जिसकी वजह वर्ष 2021 से उत्पाद की मांग में आई लगातार गिरावट बताई गई।इस फैसले से 122 नियमित कर्मचारी प्रभावित हो रहे थे। कंपनी ने बताया कि उसने नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में वीआरएस की पेशकश की थी। इसके अलावा, बिना काम के बैठे श्रमिकों पर अब तक 34 करोड़ रुपये का संचयी गैर-उत्पादक व्यय हो चुका है और श्रमिकों से संबंधित वित्तीय बोझ 17 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।