{"_id":"6a756441c24f92f72a09a59f","slug":"shimla-140-year-old-british-era-water-supply-system-heavy-iron-keys-open-water-valves-2026-08-07","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Shimla: 140 साल पुरानी व्यवस्था से बुझ रही शिमला की प्यास, 12 किलो की चाबियों से आज भी खुलते हैं पानी के वॉल्व","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shimla: 140 साल पुरानी व्यवस्था से बुझ रही शिमला की प्यास, 12 किलो की चाबियों से आज भी खुलते हैं पानी के वॉल्व
Fri, 07 Aug 2026 10:22 AM IST
Ankesh Dogra
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
Published by: Ankesh Dogra
Updated Fri, 07 Aug 2026 10:22 AM IST
सार
शिमला में आधुनिक तकनीक के बावजूद 140 साल पुरानी ब्रिटिशकालीन पेयजल व्यवस्था आज भी सक्रिय है। रिज मैदान के नीचे बने 45 लाख लीटर क्षमता वाले टैंक से शहर के कोर एरिया में पानी की आपूर्ति होती है। पाइपलाइनों के वॉल्व आज भी चार से 12 किलो वजनी लोहे की विशेष चाबियों से संचालित किए जाते हैं। हालांकि 24 घंटे जलापूर्ति योजना के तहत इस पुरानी व्यवस्था में आधुनिक प्रेशर वॉल्व सिस्टम लागू किया जाएगा। पढ़ें पूरी खबर...
विज्ञापन
शिमला के रिज मैदान के नीचे स्थित 140 साल पुराना जलाशय और ब्रिटिशकालीन जलापूर्ति व्यवस्था।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आधुनिक तकनीक और डिजिटाइजेशन के दौर में भी हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की पेयजल व्यवस्था आज तक ब्रिटिशकाल की इंजीनियरिंग पर टिकी हुई है। करीब 140 साल पहले अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई जलापूर्ति प्रणाली आज भी शहर के हजारों लोगों की प्यास बुझा रही है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस व्यवस्था के वॉल्व आज भी चार से 12 किलो वजनी लोहे की विशेष चाबियों से खोले और बंद किए जाते हैं।
विज्ञापन
ऐतिहासिक रिज मैदान के नीचे स्थित 45 लाख लीटर क्षमता वाला पानी का टैंक आज भी शहर की जलापूर्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसी टैंक से मालरोड और शहर के कोर एरिया तक छह इंच से 16 इंच व्यास वाली मुख्य पेयजल पाइपलाइनें बिछाई गई थीं, जिनसे आज भी पानी की आपूर्ति की जा रही है।
विज्ञापन
इन पाइपलाइनों में लगे वॉल्व को संचालित करने के लिए अंग्रेजों ने विशेष डिजाइन की भारी लोहे की चाबियां तैयार करवाई थीं। इनका वजन चार से 12 किलो तक है और एक ही चाबी का उपयोग छह से 12 इंच तक की विभिन्न पाइपलाइनों के वॉल्व खोलने और बंद करने में किया जा सकता है। इनमें से कई चाबियां ब्रिटिशकाल की मूल चाबियां हैं, जबकि कुछ नई तैयार कराई गई हैं। एक समय शहर के कोर एरिया में आम लोगों को पानी उपलब्ध कराने वाले ब्रिटिशकाल के शेरनुमा सार्वजनिक नल भी इस व्यवस्था का हिस्सा थे, लेकिन समय के साथ अब ये विरासत धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
विज्ञापन
24 घंटे जलापूर्ति योजना से बदलेगा पुराना सिस्टम
शहर में प्रस्तावित 24 घंटे पेयजल आपूर्ति योजना के तहत ब्रिटिशकाल के पुराने नेटवर्क में बदलाव किया जाएगा। नई व्यवस्था में भारी लोहे की चाबियों की जगह आधुनिक प्रेशर वॉल्व सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे जलापूर्ति का संचालन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके। इसके साथ ही पुरानी पाइपलाइनों को बड़ी क्षमता वाली नई पाइपों से बदला जा रहा है। हालांकि अधिकांश भूमिगत पुरानी लाइनें संरक्षित रहेंगी। केवल मालरोड क्षेत्र में डक्ट निर्माण के दौरान कुछ पुरानी पाइपलाइनें हटाई जा रही हैं।
शहर में प्रस्तावित 24 घंटे पेयजल आपूर्ति योजना के तहत ब्रिटिशकाल के पुराने नेटवर्क में बदलाव किया जाएगा। नई व्यवस्था में भारी लोहे की चाबियों की जगह आधुनिक प्रेशर वॉल्व सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे जलापूर्ति का संचालन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके। इसके साथ ही पुरानी पाइपलाइनों को बड़ी क्षमता वाली नई पाइपों से बदला जा रहा है। हालांकि अधिकांश भूमिगत पुरानी लाइनें संरक्षित रहेंगी। केवल मालरोड क्षेत्र में डक्ट निर्माण के दौरान कुछ पुरानी पाइपलाइनें हटाई जा रही हैं।