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National Handloom Day 2026 : हिमाचल के इन तीन जिलों में गायब हुआ हथकरघा, सिमटती जा रही है विरासत; जानें
Fri, 07 Aug 2026 12:13 PM IST
Ankesh Dogra
भारती शर्मा, शिमला।
भारती शर्मा, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Fri, 07 Aug 2026 12:13 PM IST
सार
हिमाचल की पारंपरिक हथकरघा विरासत पर संकट गहराता जा रहा है। बिलासपुर, सिरमौर और ऊना में एक भी पंजीकृत हथकरघा कारीगर नहीं बचा है। प्रदेश में कुल 13,211 कारीगर पंजीकृत हैं, जिनमें सबसे ज्यादा 7,958 कुल्लू में हैं। मशीनों से बने सस्ते उत्पाद, महंगा कच्चा माल, सीमित बाजार और युवाओं का इस व्यवसाय से मोहभंग हथकरघा उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। पढ़ें पूरी खबर...
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तीन जिलों में गायब हुआ हथकरघा।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
कभी हिमाचल के गांवों की पहचान रहे हथकरघों की थाप अब धीरे-धीरे खामोश होती जा रही है। पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक बुनाई कला मशीनों से तैयार होने वाले सस्ते उत्पादों की चुनौती के बीच अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। स्थिति यह है कि बिलासपुर, सिरमौर और ऊना जिलों में हथकरघे पर काम करने वाला एक भी पंजीकृत कारीगर नहीं बचा है।
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हथकरघा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेशभर में कुल 13,211 कारीगर पंजीकृत हैं। इनमें सबसे अधिक 7,958 कारीगर कुल्लू में हैं। इसके विपरीत हमीरपुर में इनकी संख्या महज 19 रह गई है। तीन जिलों में पंजीकृत कारीगरों की संख्या शून्य होना हिमाचल की पारंपरिक हथकरघा विरासत के सामने खड़े संकट को साफ तौर पर दिखाता है।
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मशीनों के सस्ते उत्पादों से बढ़ी चुनौती
हथकरघा कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मशीनों से तैयार होने वाले सस्ते उत्पाद हैं। कम समय और कम लागत में तैयार होने वाले इन उत्पादों के कारण हाथ से बुने सामान को बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। कारीगरों के मुताबिक एक शॉल को तैयार करने में करीब एक महीने तक का समय लग जाता है। इसके बाद ऊन, धागे और रंगाई समेत अन्य कच्चे माल की लागत अलग होती है। उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद हाथ से तैयार उत्पादों का उचित मूल्य मिलना मुश्किल हो रहा है।
हथकरघा कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मशीनों से तैयार होने वाले सस्ते उत्पाद हैं। कम समय और कम लागत में तैयार होने वाले इन उत्पादों के कारण हाथ से बुने सामान को बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। कारीगरों के मुताबिक एक शॉल को तैयार करने में करीब एक महीने तक का समय लग जाता है। इसके बाद ऊन, धागे और रंगाई समेत अन्य कच्चे माल की लागत अलग होती है। उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद हाथ से तैयार उत्पादों का उचित मूल्य मिलना मुश्किल हो रहा है।
कच्चे माल की बढ़ती कीमत ने भी बढ़ाई परेशानी
मंडी जिले के टकोली गांव के कारीगर गुलाब के मुताबिक प्रदेश में कच्चे माल के उत्पादन के लिए बड़े यूनिट नहीं हैं। ज्यादातर छोटे यूनिट होने के कारण उनकी उत्पादन क्षमता सीमित रहती है। इससे अच्छी गुणवत्ता का धागा समय पर उपलब्ध नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि कच्चे माल की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं। इससे हथकरघा उत्पाद तैयार करने की लागत बढ़ रही है और कारीगरों के लिए इस काम को जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है। गुलाब को वर्ष 2004 में हथकरघा कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार भी मिल चुका है। उनका कहना है कि हथकरघा उद्योग को समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो आने वाली पीढ़ियों तक यह पारंपरिक कला पहुंचाना मुश्किल होगा।
मंडी जिले के टकोली गांव के कारीगर गुलाब के मुताबिक प्रदेश में कच्चे माल के उत्पादन के लिए बड़े यूनिट नहीं हैं। ज्यादातर छोटे यूनिट होने के कारण उनकी उत्पादन क्षमता सीमित रहती है। इससे अच्छी गुणवत्ता का धागा समय पर उपलब्ध नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि कच्चे माल की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं। इससे हथकरघा उत्पाद तैयार करने की लागत बढ़ रही है और कारीगरों के लिए इस काम को जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है। गुलाब को वर्ष 2004 में हथकरघा कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार भी मिल चुका है। उनका कहना है कि हथकरघा उद्योग को समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो आने वाली पीढ़ियों तक यह पारंपरिक कला पहुंचाना मुश्किल होगा।
युवा पीढ़ी का भी मोहभंग
शिमला के धामी क्षेत्र के रतनपुर गांव के कारीगर टेकचंद बताते हैं कि पहले एक ही परिवार के कई सदस्य करघे पर काम करते थे। अब युवा बेहतर रोजगार और अधिक आय की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं। उनके मुताबिक युवा वर्ग मशीन से बने सस्ते विकल्पों को अधिक पसंद कर रहा है। इससे हाथ से तैयार उत्पादों की मांग प्रभावित हो रही है। वहीं कारीगरों की मेहनत और समय के अनुपात में उन्हें बाजार में उचित कीमत नहीं मिल पाती।
शिमला के धामी क्षेत्र के रतनपुर गांव के कारीगर टेकचंद बताते हैं कि पहले एक ही परिवार के कई सदस्य करघे पर काम करते थे। अब युवा बेहतर रोजगार और अधिक आय की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं। उनके मुताबिक युवा वर्ग मशीन से बने सस्ते विकल्पों को अधिक पसंद कर रहा है। इससे हाथ से तैयार उत्पादों की मांग प्रभावित हो रही है। वहीं कारीगरों की मेहनत और समय के अनुपात में उन्हें बाजार में उचित कीमत नहीं मिल पाती।
कुल्लू में सबसे ज्यादा कारीगर
प्रदेश में हथकरघा कारीगरों की संख्या में जिलों के बीच बड़ा अंतर है। विभाग के आंकड़ों के अनुसार कुल्लू में 7,958 पंजीकृत कारीगर हैं, जो प्रदेश में सबसे अधिक हैं। वहीं हमीरपुर में इनकी संख्या केवल 19 रह गई है। बिलासपुर, सिरमौर और ऊना में पंजीकृत हथकरघा कारीगरों की संख्या शून्य होना बताता है कि इन जिलों में कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक जीवन का हिस्सा रहे हथकरघे अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
प्रदेश में हथकरघा कारीगरों की संख्या में जिलों के बीच बड़ा अंतर है। विभाग के आंकड़ों के अनुसार कुल्लू में 7,958 पंजीकृत कारीगर हैं, जो प्रदेश में सबसे अधिक हैं। वहीं हमीरपुर में इनकी संख्या केवल 19 रह गई है। बिलासपुर, सिरमौर और ऊना में पंजीकृत हथकरघा कारीगरों की संख्या शून्य होना बताता है कि इन जिलों में कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक जीवन का हिस्सा रहे हथकरघे अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
कुल्लू शॉल से चंबा रूमाल तक, पहचान संकट में
हिमाचल की हथकरघा परंपरा केवल रोजगार का साधन नहीं रही है। यह प्रदेश की संस्कृति, पहचान और लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कुल्लू शॉल, किन्नौरी शॉल, चंबा रूमाल और पारंपरिक ऊनी वस्त्र हिमाचल की अलग पहचान बनाते हैं और देश-विदेश में भी इनकी मांग रही है। लेकिन बदलते बाजार, मशीन से बने उत्पादों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा, महंगा कच्चा माल और नई पीढ़ी की घटती रुचि के कारण इस विरासत को बचाना चुनौती बनता जा रहा है।
हिमाचल की हथकरघा परंपरा केवल रोजगार का साधन नहीं रही है। यह प्रदेश की संस्कृति, पहचान और लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कुल्लू शॉल, किन्नौरी शॉल, चंबा रूमाल और पारंपरिक ऊनी वस्त्र हिमाचल की अलग पहचान बनाते हैं और देश-विदेश में भी इनकी मांग रही है। लेकिन बदलते बाजार, मशीन से बने उत्पादों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा, महंगा कच्चा माल और नई पीढ़ी की घटती रुचि के कारण इस विरासत को बचाना चुनौती बनता जा रहा है।
विभाग खोलेगा नए एंपोरियम
हथकरघा विभाग का कहना है कि प्रदेश में करघों पर काम करने वाले बुनकरों को बाजार उपलब्ध करवाने के लिए अलग-अलग स्थानों पर नए एंपोरियम खोले जाएंगे। इसके अलावा कारीगरों को समय-समय पर विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है। बुनकरों के उत्पादों को बाजार और मंच उपलब्ध करवाने के लिए विशेष प्रदर्शनियों का आयोजन भी किया जाता है, ताकि हाथ से तैयार उत्पादों को खरीदार मिल सकें और कारीगरों को बेहतर आय हासिल हो।
हथकरघा विभाग का कहना है कि प्रदेश में करघों पर काम करने वाले बुनकरों को बाजार उपलब्ध करवाने के लिए अलग-अलग स्थानों पर नए एंपोरियम खोले जाएंगे। इसके अलावा कारीगरों को समय-समय पर विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है। बुनकरों के उत्पादों को बाजार और मंच उपलब्ध करवाने के लिए विशेष प्रदर्शनियों का आयोजन भी किया जाता है, ताकि हाथ से तैयार उत्पादों को खरीदार मिल सकें और कारीगरों को बेहतर आय हासिल हो।
गुरसिमर सिंह, प्रबंध निदेशक, हथकरघा विभाग ने बताया कि विभाग की ओर से बुनकरों को बाजार उपलब्ध करवाने और उनकी कला को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नए एंपोरियम खोलने के साथ प्रशिक्षण और प्रदर्शनियों के माध्यम से हथकरघा उत्पादों को मंच देने की दिशा में काम किया जा रहा है।
विरासत बचाने के लिए बाजार और कारीगर दोनों जरूरी
हिमाचल में हथकरघा परंपरा को बचाने के लिए केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। कारीगरों को गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल, उचित मूल्य और स्थायी बाजार उपलब्ध करवाना भी जरूरी है। साथ ही नई पीढ़ी को इस पारंपरिक व्यवसाय से जोड़ने के लिए इसे आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना होगा। तीन जिलों में एक भी पंजीकृत हथकरघा कारीगर नहीं बचना इस बात का संकेत है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हिमाचल की कई पारंपरिक बुनाई कलाएं सिर्फ संग्रहालयों और पुरानी यादों तक सिमट सकती हैं।
हिमाचल में हथकरघा परंपरा को बचाने के लिए केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। कारीगरों को गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल, उचित मूल्य और स्थायी बाजार उपलब्ध करवाना भी जरूरी है। साथ ही नई पीढ़ी को इस पारंपरिक व्यवसाय से जोड़ने के लिए इसे आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना होगा। तीन जिलों में एक भी पंजीकृत हथकरघा कारीगर नहीं बचना इस बात का संकेत है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हिमाचल की कई पारंपरिक बुनाई कलाएं सिर्फ संग्रहालयों और पुरानी यादों तक सिमट सकती हैं।