{"_id":"6aa235f82ee3bb7fba081ce4","slug":"shimla-pocso-cases-accused-acquitted-minor-statement-evidence-shortage-court-verdict-2026-09-10","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"शिमला: पॉक्सो के दो मामलों में आरोपियों को राहत, नाबालिग के बयान से मुकरने और साक्ष्यों की कमी पर हुए बरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शिमला: पॉक्सो के दो मामलों में आरोपियों को राहत, नाबालिग के बयान से मुकरने और साक्ष्यों की कमी पर हुए बरी
Thu, 10 Sep 2026 10:15 AM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Thu, 10 Sep 2026 10:15 AM IST
सार
शिमला की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने पॉक्सो से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया। पहले मामले में ठियोग निवासी राहुल पर नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने और दुष्कर्म का आरोप था। सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी मां अपने बयानों से मुकर गईं।
विज्ञापन
कोर्ट का आदेश।
- फोटो : अमर उजाला।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राजधानी शिमला की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत (रेप/पॉक्सो) ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया। दोनों मामलों में अदालत के सामने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को लेकर अहम सवाल सामने आए। एक मामले में पीड़िता और उसकी मां अपने पूर्व बयानों से मुकर गईं, जबकि दूसरे मामले में पीड़िता की उम्र को लेकर ठोस प्रमाण सामने नहीं आ सके। दोनों मामलों में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और बयानों के आधार पर आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।
विज्ञापन
नाबालिग के बयान से मुकरने पर राहुल बरी
पहले मामले में ठियोग निवासी राहुल पर नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगाने और दुष्कर्म करने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार जून 2025 में ठियोग थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी। आरोप था कि आरोपी नाबालिग को बहला-फुसलाकर जंगल में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी मां अदालत में अपने पहले के बयानों से मुकर गईं। पीड़िता ने अदालत में कहा कि उसके साथ कोई गलत काम नहीं हुआ था और वह अपनी मर्जी से मौसी के घर गई थी। अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई डीएनए रिपोर्ट को लेकर भी अदालत ने प्रक्रिया संबंधी कमी पर गौर किया। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि नमूनों को फॉरेंसिक लैब जुन्गा भेजते समय सील की छाप साथ नहीं भेजी गई थी। इससे सैंपलों की सुरक्षा और जांच प्रक्रिया की कड़ी को लेकर सवाल खड़ा हुआ। इन परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने राहुल को मामले में बरी कर दिया।
विज्ञापन
उम्र का पुख्ता प्रमाण नहीं मिलने पर आयुष दोषमुक्त
दूसरे मामले में फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने आयुष निवासी खरोट, चिड़गांव को पॉक्सो और दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक जनवरी 2026 में एक अस्पताल में युवती के गर्भवती पाए जाने के बाद उसकी उम्र नाबालिग होने के संदेह में चिड़गांव थाने में पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अदालत में कहा कि घटना के समय वह बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से विवाह किया था। मामले में पेश किए गए दस्तावेजों में भी उम्र को लेकर एकरूपता नहीं थी। स्कूल रिकॉर्ड, पंचायत रिकॉर्ड और आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि में विरोधाभास सामने आया। अदालत ने पाया कि नाबालिग होने का पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पॉक्सो के तहत आरोप साबित करने के लिए जरूरी उम्र संबंधी तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो पाए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर आयुष को भी दोषमुक्त कर दिया।
साक्ष्यों की मजबूती रही अहम
दोनों मामलों में अदालत के फैसले में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और कानूनी प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण रहा। पहले मामले में पीड़िता के बयान से मुकरने के साथ फॉरेंसिक सैंपल की सील प्रक्रिया पर सवाल उठा, जबकि दूसरे मामले में पीड़िता की उम्र से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास सामने आया। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
दूसरे मामले में फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने आयुष निवासी खरोट, चिड़गांव को पॉक्सो और दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक जनवरी 2026 में एक अस्पताल में युवती के गर्भवती पाए जाने के बाद उसकी उम्र नाबालिग होने के संदेह में चिड़गांव थाने में पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अदालत में कहा कि घटना के समय वह बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से विवाह किया था। मामले में पेश किए गए दस्तावेजों में भी उम्र को लेकर एकरूपता नहीं थी। स्कूल रिकॉर्ड, पंचायत रिकॉर्ड और आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि में विरोधाभास सामने आया। अदालत ने पाया कि नाबालिग होने का पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पॉक्सो के तहत आरोप साबित करने के लिए जरूरी उम्र संबंधी तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो पाए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर आयुष को भी दोषमुक्त कर दिया।
साक्ष्यों की मजबूती रही अहम
दोनों मामलों में अदालत के फैसले में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और कानूनी प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण रहा। पहले मामले में पीड़िता के बयान से मुकरने के साथ फॉरेंसिक सैंपल की सील प्रक्रिया पर सवाल उठा, जबकि दूसरे मामले में पीड़िता की उम्र से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास सामने आया। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।