पर्यटन स्थलों का हाल: पहाड़ों की रानी शिमला में बढ़ी आबादी ने छीनी हरियाली, जंगल हो रहे खाली
नगर निगम के 10 साल के आंकड़ों के अनुसार शहर में चार हजार नए भवन खड़े हो गए हैं। शहर में भवनों की संख्या 32 हजार पहुंच गई है।
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हिल्स क्वीन शिमला पर लगातार बढ़ रहा आबादी का बोझ अब यहां की हरियाली छीन रहा है। हरे भरे पेड़ों की जगह शहर में कंक्रीट का जंगल बढ़ रहा है। नगर निगम के 10 साल के आंकड़ों के अनुसार शहर में चार हजार नए भवन खड़े हो गए हैं। शहर में भवनों की संख्या 32 हजार पहुंच गई है। हरित क्षेत्र बढ़ाने के नाम पर सरकार ने राजधानी में ग्रीन बेल्ट 17 से बढ़ाकर 25 कर दी है लेकिन इस एरिया में भी कई जगह निर्माण की छूट मिलने से भवन खड़े हो रहे हैं। शहर के जाखू, बैनमोर, लक्कड़ बाजार, छोटा शिमला, कनलोग और बालूगंज क्षेत्र जो ग्रीन एरिया में शामिल हैं, वहां इन दिनों कई नए भवनों का निर्माण चल रहा है।
शहर का 8.6 वर्ग किलोमीटर वनक्षेत्र
नगर निगम के पास शिमला शहर का करीब 19.55 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है। इसमें 8.6 वर्ग किलोमीटर वनक्षेत्र है। इनमें ज्यादातर देवदार, पाइन, बान के पेड़ हैं। शहर में ज्यादातर जंगल अब सरकारी या वन भूमि पर ही बचे हैं। निजी भूमि से पेड़ गायब हो रहे हैं। शिमला डेवलपमेंट प्लान 2041 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार शहर में 76 फीसदी पेड़ पौधे अब सरकारी या वन भूमि पर ही बचे हैं। निजी भूमि पर सिर्फ 24 फीसदी हरित क्षेत्र बचा है। यह लगातार घट रहा है। 20 साल पहले तक यह 30 फीसदी से ज्यादा था। भवन निर्माण के लिए प्लाट खाली किए जा रहे हैं। नगर निगम के पास हर साल ऐसी दर्जनों शिकायतें पहुंच रही हैं जिनमें पेड़ को नुकसान पहुंचाकर प्लाट खाली करवाया जा रहा है।
नियम फाइलों में दफन, कंक्रीट बढ़ने से सूख रहे पेड़
शहर के कई इलाकों में कंक्रीट निर्माण बढ़ने से पेड़ सूख रहे हैं। नियमानुसार हरे पेड़ के चारों ओर डंगे या कंक्रीट नहीं बिछा सकते। पेड़ से कम से कम एक मीटर की दूरी जरूरी है लेकिन इनका पालन सरकारी महकमे भी नहीं करते। सचिवालय परिसर में ही लगाए डंगों से बीते पांच साल के भीतर 10 से ज्यादा पेड़ सूख गए हैं। जाखू में एक निजी कंपनी की भूमि पर भी देवदार के पेड़ अचानक सूख रहे हैं। वन विभाग की मानें तो डंगे लगने या कंक्रीट बिछने से पानी पेड़ों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाता। ऐसे में वह सूख रहे हैं।
आपदा, विकास के नाम कट जाते हैं सैकड़ों पेड़
शहर में हर साल आपदा, विकास और खतरे के नाम पर सैकड़ों हरे पेड़ों को काट दिया जाता है। बरसात और बर्फबारी के दौरान हर साल औसतन तीन सौ से ज्यादा पेड़ गिर जाते हैं। साल 2023 में तो 1500 से ज्यादा हरे पेड़ ढहे थे। विकास और खतरा बताकर भी हर साल चार सौ से ज्यादा पेड़ काटे जा रहे हैं। वहीं, नए पौधे लगाने और उनके बचने की दर कम है। शहर में नए पौधे लगाने के लिए अब जगह नहीं है। शिमला में हरित क्षेत्र घटने और बढ़ते कंक्रीट के जंगल को रोकने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने साल 2017 में सख्त आदेश जारी किए थे। इसके तहत शहर के कोर और ग्रीन एरिया में भवन निर्माण पर पूर्ण पाबंदी लगा दी थी। पांच साल तक शहर के इस क्षेत्र में नया निर्माण नहीं हुआ। हालांकि, पिछली भाजपा सरकार ने बाद में इन क्षेत्रों में लगी पाबंदी हटाते हुए कुछ शर्ताें के साथ भवन निर्माण का प्रस्ताव लाया था। इसे 2022 के बाद से लागू किया है।
शहर में अब इन क्षेत्रों में बची है हरियाली
शहर में चिह्नित ग्रीन बेल्ट टुटीकंडी, कार्टरोड से ऊपर का क्षेत्र, नाभा, फागली, बैमलोई, हिमलैंड, खलीनी, छोटा शिमला, कसुम्पटी, चार्ली विला, हिमफैड पेट्रोल पंप, जाखू, भराड़ी, शांकली, बालूगंज एरिया में हरित क्षेत्र बचे हैं। वन विभाग के अनुसार शहर में कंक्रीट का जंगल तो बढ़ा है लेकिन हरित क्षेत्र कितना घटा है, इसका अभी सर्वे होना है। डीएफओ पवन चौहान के अनुसार कंक्रीट से पेड़ों को नुकसान पहुंचता है लेकिन विभाग का प्रयास है कि नए पौधे भी लगाए जाएं।
शहर में हरित क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास
शहर में हरित क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास है। कोर एरिया में चिनार के 500 पौधे लगाए जा रहे हैं। कई क्षेत्र ऐसे चिह्नित किए हैं जहां हर साल पौधरोपण कर रहे हैं। ग्रीन एरिया में निर्माण पर नजर रखी जा रही है। नगर निगम वन विभाग के साथ इस साल भी पौधरोपण अभियान चलाएगा। शिमला में हरियाली बढ़ाई जाएगी।-सुरेंद्र चौहान, महापौर नगर निगम शिमला