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विश्व टीबी दिवस 2026: घट रहे मरीज, पर अभी टीबी मुक्त नहीं हुआ हिमाचल; जानें पूरी स्थिति विस्तार से

अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Tue, 24 Mar 2026 10:25 AM IST
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सार

World TB Day: हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों में तपेदिक के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समय पर इसके निदान व इलाज को प्रोत्साहित करना है। बात हिमाचल की करें तो टीबी मरीजों की संख्या में कमी आई है, वहीं मौतों के आंकड़े भी घटे हैं। पढ़ें पूरी खबर...

World TB Day Patient numbers are declining, but Himachal is not yet TB-free
World TB Day 2026 - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश में क्षय रोग (टीबी) के मामलों में पिछले कुछ वर्षों में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन यह बीमारी अब भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य में टीबी मरीजों की संख्या में कमी आई है, वहीं मौतों के आंकड़े भी घटे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2022 में प्रदेश में लगभग 15,760 टीबी मरीज दर्ज किए गए थे, वर्ष 2023 में यह आंकड़ा 15,264, 2024 में 15,461 और वर्ष 2025 में यह आंकड़ा घटकर 14653 पहुंचा है। इससे स्पष्ट है कि राज्य में टीबी के मामलों में धीरे-धीरे गिरावट आ रही है।

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मृत्यु दर की बात करें तो वर्ष 2023 में टीबी से करीब 904 मरीजों की मौत हुई थी, जबकि वर्ष 2024 में सितंबर तक यह आंकड़ा घटकर लगभग 610 रह गया है। हालांकि, मौतों में कमी आई है, लेकिन यह संख्या अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। वर्ष  2023 में भी हजारों मरीजों ने उपचार के बाद बीमारी पर काबू पाया। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि उपचार सफलता दर लगातार बेहतर हो रही है। टीबी की पहचान के लिए जांच व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है। प्रदेश में प्रति लाख आबादी पर लगभग 4,799 लोगों की जांच की जा रही है, जो राष्ट्रीय औसत से बेहतर मानी जा रही है।

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अधिक जांच के कारण मरीजों की समय पर पहचान संभव हो पाई है। जिला स्तर पर कांगड़ा में सबसे अधिक टीबी मरीज सामने आ रहे हैं, जबकि मंडी, शिमला और कुल्लू भी प्रभावित जिलों में शामिल हैं। बड़े और अधिक आबादी वाले जिलों में टीबी का बोझ अपेक्षाकृत ज्यादा देखा जा रहा है। प्रदेश सरकार की ओर से टीबी मुक्त अभियान के तहत अब तक 700 से अधिक ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित किया जा चुका है। इसके बावजूद दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, दवा-प्रतिरोधी टीबी और जागरूकता की कमी जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। 
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