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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी आज, गणपति कृपा से दूर होंगे विघ्न और खुले सुख-समृद्धि के द्वार
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Thu, 05 Feb 2026 11:49 AM IST
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सार
Sankashti Chaturthi 2026: आज (5 फरवरी) फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है। इस तिथि को संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इसे द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विशेष रूप से आराधना की जाती है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तिथि भगवान गणेश के ऐसे स्वरूप को समर्पित है, जो विद्या, विवेक, संयम और धर्मप्रिय आचरण से विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं। ‘द्विजप्रिय’ नाम स्वयं यह संकेत देता है कि इस दिन की उपासना ज्ञान, सदाचार और सात्विकता से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की यह संकष्टी चतुर्थी जीवन की बाधाओं को दूर कर सुख, समृद्धि और तरक्की के मार्ग खोलती है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए उपाय भगवान गणेश की विशेष कृपा दिलाने वाले माने गए हैं।
दूर्वा अर्पण से धन और आरोग्य की प्राप्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है। इस दिन गणेशजी की पूजा के समय 21 या 24 हरी दूर्वा गणपति को अर्पित करने से आर्थिक संकट दूर होते हैं। दूर्वा को दीर्घायु, स्वास्थ्य और निरंतर आय का प्रतीक माना गया है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की संकष्टी पर दूर्वा अर्पण विशेष फलदायी माना जाता है।
तिल और गुड़ का भोग, कष्टों से मुक्ति का उपाय
धार्मिक विश्वास है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर तिल और गुड़ से बने लड्डू या मोदक भगवान गणेश को अर्पित करने से जीवन के पुराने कष्ट समाप्त होते हैं। तिल को नकारात्मक ऊर्जा के नाश का और गुड़ को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यह भोग विशेष रूप से फाल्गुन मास में शुभ फल देता है।
Sankashti Chaturthi: 4 या 5 फरवरी कब है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी? जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
“ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का जप
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जप करने से विघ्न-बाधाएं शांत होती हैं। यह मंत्र बुद्धि को प्रखर करता है और निर्णय शक्ति को मजबूत बनाता है। करियर, शिक्षा और व्यापार में आ रही रुकावटों के लिए यह जप अत्यंत प्रभावी माना गया है। विशेषकर विद्यार्थियों के लिए यह उपाय बहुत ही कारगर है।
ब्राह्मण या विद्वान को दान
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर ब्राह्मण, विद्वान या धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को अन्न, तिल, वस्त्र या दक्षिणा का दान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान भगवान गणेश को शीघ्र प्रसन्न करता है और घर में स्थायी सुख-शांति का वास होता है।
मौन और संयम का पालन
पौराणिक दृष्टि से फाल्गुन मास आत्मशुद्धि का समय माना गया है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर अनावश्यक वाणी, क्रोध और तामसिक आहार से दूरी बनाए रखना अत्यंत शुभ कहा गया है। इस दिन संयम और सात्विकता अपनाने से भगवान गणेश की कृपा दीर्घकाल तक बनी रहती है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
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दूर्वा अर्पण से धन और आरोग्य की प्राप्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है। इस दिन गणेशजी की पूजा के समय 21 या 24 हरी दूर्वा गणपति को अर्पित करने से आर्थिक संकट दूर होते हैं। दूर्वा को दीर्घायु, स्वास्थ्य और निरंतर आय का प्रतीक माना गया है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की संकष्टी पर दूर्वा अर्पण विशेष फलदायी माना जाता है।
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तिल और गुड़ का भोग, कष्टों से मुक्ति का उपाय
धार्मिक विश्वास है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर तिल और गुड़ से बने लड्डू या मोदक भगवान गणेश को अर्पित करने से जीवन के पुराने कष्ट समाप्त होते हैं। तिल को नकारात्मक ऊर्जा के नाश का और गुड़ को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यह भोग विशेष रूप से फाल्गुन मास में शुभ फल देता है।
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“ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का जप
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जप करने से विघ्न-बाधाएं शांत होती हैं। यह मंत्र बुद्धि को प्रखर करता है और निर्णय शक्ति को मजबूत बनाता है। करियर, शिक्षा और व्यापार में आ रही रुकावटों के लिए यह जप अत्यंत प्रभावी माना गया है। विशेषकर विद्यार्थियों के लिए यह उपाय बहुत ही कारगर है।
ब्राह्मण या विद्वान को दान
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर ब्राह्मण, विद्वान या धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को अन्न, तिल, वस्त्र या दक्षिणा का दान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान भगवान गणेश को शीघ्र प्रसन्न करता है और घर में स्थायी सुख-शांति का वास होता है।
मौन और संयम का पालन
पौराणिक दृष्टि से फाल्गुन मास आत्मशुद्धि का समय माना गया है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर अनावश्यक वाणी, क्रोध और तामसिक आहार से दूरी बनाए रखना अत्यंत शुभ कहा गया है। इस दिन संयम और सात्विकता अपनाने से भगवान गणेश की कृपा दीर्घकाल तक बनी रहती है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
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