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Jagannath Rath Yatra 2026: आज से जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू, आखिर क्या है इसके पीछे का धार्मिक रहस्य ?

Thu, 16 Jul 2026 12:36 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 16 Jul 2026 12:36 PM IST
सार

Jagannath Rath Yatra 2026: आज से विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू हो चुकी है। भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा संग गुंडिचा मंदिर अपनी मौसी के घर में प्रस्थान करेंगे। 

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Jagannath Rath Yatra 2026 Spiritual Significance Jagannath Puri traditions religious importance Rath Yatra
Jagannath Rath Yatra 2026 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Jagannath Rath Yatra 2026: पुरी में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। यहां की विशेषता यह है कि तीनों देवताओं की मूर्तियां काष्ठ (लकड़ी) से बनी होती हैं। प्रत्येक बारह वर्षों के अंतराल पर इन मूर्तियों को विशेष नियमों के अनुसार पवित्र नीम की लकड़ी से फिर से निर्मित किया जाता है। यह प्रक्रिया ‘नवकलेवर’कहलाती है। वैदिक दृष्टिकोण से भगवान बलराम ऋग्वेद, श्रीहरि सामवेद, सुभद्रा यजुर्वेद और सुदर्शन चक्र अथर्ववेद के प्रतीक माने जाते हैं। इस स्थान पर श्रीहरि दारुमय (लकड़ी के) स्वरूप में विराजते हैं। स्न्नान पूर्णिमा पर महास्नान के बाद अनवसरा(बीमार)रहने वाले भगवान श्री जगन्नाथ,श्री बलभद्र और देवी सुभद्रा ने रथयात्रा से दो दिन पहले नेत्र खोले और अपने भक्तों को दर्शन दिए। हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को विश्वविख्यात रथ यात्रा प्रारंभ होती है।

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ऐसे हुई रथ यात्रा शुरू
इस रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्छा पूर्ति के लिए उन्हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था और इसके बाद से इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी। धार्मिक  मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति इस रथयात्रा में शामिल होकर इस रथ को खींचता है उसे सौ यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं। यह व्यवस्था केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक संदेश भी देती है। प्रत्येक रथ का नाम, रंग, आकार, ध्वज और घोड़े तक अलग होते हैं।
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भगवान जगन्नाथ का रथ 
नंदीघोष

यह रथ लाल और पीले रंग के वस्त्रों से सुसज्जित होता है। लाल रंग शक्ति, उत्साह और कर्म का प्रतीक है, जबकि पीला रंग ज्ञान, समृद्धि और भगवान विष्णु के तेज का प्रतीक माना जाता है। यह रथ भगवान जगन्नाथ के जगतपालक स्वरूप को दर्शाता है।
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भगवान बलभद्र का रथ 
तालध्वज

इस रथ पर लाल और हरे रंग का आवरण होता है। हरा रंग प्रकृति, संतुलन, धैर्य और कृषि का प्रतीक है। बलभद्र को खेती, बल और धरती से जुड़ा देवता माना जाता है, इसलिए उनके रथ में हरे रंग का विशेष महत्व है।

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माता सुभद्रा का रथ
दर्पदलन (देवदलन)

माता सुभद्रा के रथ पर लाल और काले रंग का संयोजन होता है। काला रंग शक्ति, रहस्य और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक माना जाता है, जबकि लाल रंग देवी शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। यह संयोजन माता के शक्तिरूप को प्रकट करता है।

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धार्मिक मान्यता के अनुसार तीनों रथ केवल तीन देवताओं के वाहन नहीं हैं, बल्कि ज्ञान (जगन्नाथ), बल (बलभद्र) और शक्ति (सुभद्रा) के समन्वय का संदेश भी देते हैं। जीवन में इन तीनों गुणों का संतुलन ही सुख, सफलता और धर्ममय जीवन का आधार माना गया है।इसी कारण रथयात्रा में तीनों रथों के रंग, स्वरूप और पहचान अलग रखी जाती है, ताकि प्रत्येक देवता के विशिष्ट स्वरूप और उनके आध्यात्मिक संदेश को श्रद्धालु सहज रूप से समझ सकें। यही इस अद्भुत परंपरा का धार्मिक रहस्य है।

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