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Jagannath Rath Yatra 2026: जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी रोचक और महत्वपूर्ण तथ्य, जिन्हें हर भक्त को जानना चाहिए
Wed, 15 Jul 2026 07:48 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 15 Jul 2026 07:48 PM IST
सार
jagannath rath yatra 2026: इस वर्ष भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत 16 जुलाई से हो रही है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा संग अलग-अलग रथों में सवार होकर गुंडिचा मंदिर में जाते हैं। आइए जानते हैं इस रथ यात्रा से जुड़ी रोचक और खास बातें।
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जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Jagannath Rath Yatra 2026 : 16 जुलाई 2026 को विश्व प्रसिद्ध पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में रथ यात्रा का आयोजन किया जाएगा। इस रथ यात्रा को देखने और खींचने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्त पुरी आते हैं। इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा संग तीन अलग-अलग रथों में सवार होकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जहां पर कुछ दिनों तक विश्राम और प्रवास करने के बाद वापस आते हैं। 16 जुलाई से रथ यात्रा शुरू होकर 28 जुलाई तक चलेगी। इस विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा से जुड़ी कई विशेष बाते होती हैं जिसे जानना जरूरी होता है। आइए पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी बातें जानते हैं।
1- हिंदू कैलेंडर के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से होती है। जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने मंदिर से भाई बलराम और बहन सुभद्रा संग तीन अलग-अलग रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए गुंडिचा मंदिर में जाते हैं। जिसमें बड़ी संख्या में भक्त रथ की रस्सी खींचते हैं।
2- रथ यात्रा में शामिल तीनों रथों के अलग-अलग नाम से जाना जात है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष या गरुड़ ध्वज, बलराम जी के रथ को तालध्वज और सुभद्रा को दर्पदलन रथ के नाम से जाना जाता है।
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3- रथ यात्रा में तीनों को एक विशेष प्रकार की लकड़ी से तैयार किया जाता है। सबसे पहले शुभ वृक्षों को चुनाव किया जाता है और उसकी लकड़ी से रथ तैयार किया जाता है। यह नीम के पेड़ की लकड़ी होती है जिसे दारु कहा जाता है।
4- रथ के निर्माण में किसी भी तरह की लोहे की कील का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। अक्षय तृतीया से रथ का निर्माण कार्य शुरू हो जाता है।
5- ऐसी मान्यता है कि रथ यात्रा के पांचवें दिन माता लक्ष्मी नाराज होकर गुंडिचा मंदिर चली जाती है और भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए को तोड़ देती हैं। ऐसा इसलिए भगवान जगन्नाथ लंबे समय तक अपनी मौसी के घर प्रवास करते हैं।
6- भगवान जगन्नाथ आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि पर मौसी के घर जाते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि के दिन वापस गुंडीचा मंदिर से लौटते हैं, जिसे बहुड़ा यात्रा कहते हैं। इस दौरान तीन दिनों तक भगवान जगन्नाथ मंदिर के बाहर रहते हुए अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। तीन दिनों के बाद वापस मंदिर के गर्भगृह में जाते हैं।
7- जब भगवान जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं तो वहां पर पहले से माता लक्ष्मी नाराज रहती हैं, तब भगवान देवी लक्ष्मी को मनाते हैं और नाराजगी दूर होते ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसे नीलाद्रि विजय के नाम से जाना जाता है।
8- रथ यात्रा के दौरान एक ऐसा पड़ाव आता है जब भगवान जगन्नाथ का रथ एक मुसलमान भक्त के मजार पर थोड़ी देर रुकता है, फिर इसके बाद आगे बढ़ता है।
9- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो रथ यात्रा की रस्सी को खींचता है उसको पापों से मुक्ति मिल जाती है और श्रीहरि के चरणों में स्थान प्राप्त करता है। ऐसे में बड़ी संख्या में भक्त रथ खींचते हैं।
Jagannath Rath Yatra 2026
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1- हिंदू कैलेंडर के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से होती है। जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने मंदिर से भाई बलराम और बहन सुभद्रा संग तीन अलग-अलग रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए गुंडिचा मंदिर में जाते हैं। जिसमें बड़ी संख्या में भक्त रथ की रस्सी खींचते हैं।
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2- रथ यात्रा में शामिल तीनों रथों के अलग-अलग नाम से जाना जात है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष या गरुड़ ध्वज, बलराम जी के रथ को तालध्वज और सुभद्रा को दर्पदलन रथ के नाम से जाना जाता है।
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3- रथ यात्रा में तीनों को एक विशेष प्रकार की लकड़ी से तैयार किया जाता है। सबसे पहले शुभ वृक्षों को चुनाव किया जाता है और उसकी लकड़ी से रथ तैयार किया जाता है। यह नीम के पेड़ की लकड़ी होती है जिसे दारु कहा जाता है।
4- रथ के निर्माण में किसी भी तरह की लोहे की कील का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। अक्षय तृतीया से रथ का निर्माण कार्य शुरू हो जाता है।
5- ऐसी मान्यता है कि रथ यात्रा के पांचवें दिन माता लक्ष्मी नाराज होकर गुंडिचा मंदिर चली जाती है और भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए को तोड़ देती हैं। ऐसा इसलिए भगवान जगन्नाथ लंबे समय तक अपनी मौसी के घर प्रवास करते हैं।
6- भगवान जगन्नाथ आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि पर मौसी के घर जाते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि के दिन वापस गुंडीचा मंदिर से लौटते हैं, जिसे बहुड़ा यात्रा कहते हैं। इस दौरान तीन दिनों तक भगवान जगन्नाथ मंदिर के बाहर रहते हुए अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। तीन दिनों के बाद वापस मंदिर के गर्भगृह में जाते हैं।
7- जब भगवान जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं तो वहां पर पहले से माता लक्ष्मी नाराज रहती हैं, तब भगवान देवी लक्ष्मी को मनाते हैं और नाराजगी दूर होते ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसे नीलाद्रि विजय के नाम से जाना जाता है।
8- रथ यात्रा के दौरान एक ऐसा पड़ाव आता है जब भगवान जगन्नाथ का रथ एक मुसलमान भक्त के मजार पर थोड़ी देर रुकता है, फिर इसके बाद आगे बढ़ता है।
9- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो रथ यात्रा की रस्सी को खींचता है उसको पापों से मुक्ति मिल जाती है और श्रीहरि के चरणों में स्थान प्राप्त करता है। ऐसे में बड़ी संख्या में भक्त रथ खींचते हैं।
Jagannath Rath Yatra 2026