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Jaya Ekadashi 2026: 29 जनवरी को जया एकादशी, जानिए धार्मिक महत्व ,पूजाविधि नियम और कथा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 27 Jan 2026 05:52 PM IST
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सार
Jaya Ekadashi 2026: 29 जनवरी को जया एकादशी व्रत है। शास्त्रों में इस एकादशी का विशेष महत्व होता है। इस एकादशी का व्रत रखन से पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Jaya Ekadashi 2026
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Jaya Ekadashi 2026: जया एकादशी सनातन धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं में जया एकादशी को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह व्रत न केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम भी बनता है। पद्म पुराण औरअन्य ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है, जहां बताया गया है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना से भूत-प्रेत जैसी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में शांति व समृद्धि आती है। वर्ष 2026 में यह एकादशी 29 जनवरी को पड़ रही है।
धार्मिक महत्व
पद्म पुराण में उल्लेख है कि जो भक्त इस व्रत को विधि-विधान से करता है, उसे सप्त जन्मों के पापों से छुटकारा मिलता है और वह विष्णु लोक में स्थान पाता है। धार्मिक दृष्टि से, यह व्रत व्यक्ति को आत्म-संयम सिखाता है। सनातन परंपरा में एकादशी व्रतों का महत्व इसलिए है क्योंकि ये चंद्रमा के प्रभाव से जुड़े होते हैं और जया एकादशी विशेष रूप से पापनाशक मानी जाती है। यह व्रत करने से जीवन की हर परेशानी दूर होती है, जैसे रोग, शत्रु बाधा और आर्थिक संकट। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन विष्णु जी की कृपा से मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
इस दिन प्रातः काल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सबसे पहले हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर पीला चंदन लगाएं। पीले फूल, पीले वस्त्र और तुलसी दल अर्पित करें, क्योंकि तुलसी के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। फल, मिठाई, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) का भोग लगाएं। घी का दीपक जलाकर जया एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। कथा में मुख्य रूप से विष्णु जी की महिमा का वर्णन होता है। शाम को दीपदान करें और 'ओम जय जगदीश हरे' आरती गाएं। पूजा सामग्री में अक्षत, धूप, अगरबत्ती, कपूर और नैवेद्य शामिल करें। पूजा के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दें।
पौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्गलोक में इंद्रदेव के दरबार में माल्यवान नामक एक गंधर्व रहता था, जिसे पुष्पवती नामक अप्सरा से प्रेम हो गया। एक दिन जब इंद्रदेव के दरबार में विशेष आयोजन था, तब माल्यवान और पुष्पवती एक-दूसरे में इतने लीन हो गए कि अपने कर्तव्यों की अवहेलना कर बैठे। इंद्रदेव को जब यह पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर दोनों को पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
इस श्राप के कारण वे दोनों मृत्युलोक में भटकने लगे और अत्यंत कष्टमय जीवन जीने लगे। संयोगवश एक दिन जया एकादशी आई और उन्होंने दिनभर अन्न ग्रहण नहीं किया। रात को अत्यधिक कष्ट में होने के कारण वे सो नहीं पाए और भगवान विष्णु के स्मरण में रात जागते रहे। इस तरह अनजाने में ही उनका व्रत पूरा हो गया। भगवान विष्णु की कृपा से इस व्रत का पुण्य उन्हें प्राप्त हुआ और वे पुनः अपने गंधर्व स्वरूप में लौट आए।
व्रत के नियम
दशमी तिथि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन अन्न, चावल, दाल, मांसाहार, मदिरा और तंबाकू से पूर्णतः दूर रहें। झूठ बोलना, क्रोध करना, निंदा और विवाद से बचें। बाल या नाखून न काटें, दिन में न सोएं। तामसिक भोजन का सेवन वर्जित है। फलाहार या दूध से व्रत रखें। द्वादशी तिथि पर पारण करें, जिसमें ब्राह्मण भोजन के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें। इन नियमों का पालन न करने से व्रत का फल नहीं मिलता।
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धार्मिक महत्व
पद्म पुराण में उल्लेख है कि जो भक्त इस व्रत को विधि-विधान से करता है, उसे सप्त जन्मों के पापों से छुटकारा मिलता है और वह विष्णु लोक में स्थान पाता है। धार्मिक दृष्टि से, यह व्रत व्यक्ति को आत्म-संयम सिखाता है। सनातन परंपरा में एकादशी व्रतों का महत्व इसलिए है क्योंकि ये चंद्रमा के प्रभाव से जुड़े होते हैं और जया एकादशी विशेष रूप से पापनाशक मानी जाती है। यह व्रत करने से जीवन की हर परेशानी दूर होती है, जैसे रोग, शत्रु बाधा और आर्थिक संकट। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन विष्णु जी की कृपा से मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
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पूजा विधिइस दिन प्रातः काल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सबसे पहले हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर पीला चंदन लगाएं। पीले फूल, पीले वस्त्र और तुलसी दल अर्पित करें, क्योंकि तुलसी के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। फल, मिठाई, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) का भोग लगाएं। घी का दीपक जलाकर जया एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। कथा में मुख्य रूप से विष्णु जी की महिमा का वर्णन होता है। शाम को दीपदान करें और 'ओम जय जगदीश हरे' आरती गाएं। पूजा सामग्री में अक्षत, धूप, अगरबत्ती, कपूर और नैवेद्य शामिल करें। पूजा के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दें।
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पौराणिक कथापौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्गलोक में इंद्रदेव के दरबार में माल्यवान नामक एक गंधर्व रहता था, जिसे पुष्पवती नामक अप्सरा से प्रेम हो गया। एक दिन जब इंद्रदेव के दरबार में विशेष आयोजन था, तब माल्यवान और पुष्पवती एक-दूसरे में इतने लीन हो गए कि अपने कर्तव्यों की अवहेलना कर बैठे। इंद्रदेव को जब यह पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर दोनों को पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
इस श्राप के कारण वे दोनों मृत्युलोक में भटकने लगे और अत्यंत कष्टमय जीवन जीने लगे। संयोगवश एक दिन जया एकादशी आई और उन्होंने दिनभर अन्न ग्रहण नहीं किया। रात को अत्यधिक कष्ट में होने के कारण वे सो नहीं पाए और भगवान विष्णु के स्मरण में रात जागते रहे। इस तरह अनजाने में ही उनका व्रत पूरा हो गया। भगवान विष्णु की कृपा से इस व्रत का पुण्य उन्हें प्राप्त हुआ और वे पुनः अपने गंधर्व स्वरूप में लौट आए।
व्रत के नियम
दशमी तिथि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन अन्न, चावल, दाल, मांसाहार, मदिरा और तंबाकू से पूर्णतः दूर रहें। झूठ बोलना, क्रोध करना, निंदा और विवाद से बचें। बाल या नाखून न काटें, दिन में न सोएं। तामसिक भोजन का सेवन वर्जित है। फलाहार या दूध से व्रत रखें। द्वादशी तिथि पर पारण करें, जिसमें ब्राह्मण भोजन के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें। इन नियमों का पालन न करने से व्रत का फल नहीं मिलता।
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