Sheetala Ashtami 2026: कलश, सूप, झाड़ू और नीम क्यों धारण करती हैं मां शीतला, जानिए उनके स्वरूप का रहस्य
हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का पर्व बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शीतला देवी को अच्छी सेहत और स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
विस्तार
Sheetala Ashtami 2026: भारतीय परंपरा में अनेक ऐसे पर्व और उत्सव हैं जो केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्रकृति के संरक्षण का भी संदेश देते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पर्व है चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी का पर्व, जिसे कई स्थानों पर बासोड़ा भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि को रोगमुक्त रखने का दायित्व देवी शीतला को सौंपा था। इसी कारण प्राचीन काल से ही इस तिथि पर देवी शीतला की पूजा-अर्चना की जाती रही है। उन्हें स्वच्छता और स्वास्थ्य की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। उनकी आराधना से ज्वर, चेचक, कुष्ठ, फोड़े-फुंसियों, चर्म रोग और अन्य संक्रामक रोगों के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलने की मान्यता है। यही कारण है कि लोग गर्मी के आरंभ में रोगों से रक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करते हैं।
देवी शीतला की पौराणिक महिमा
स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने संसार को रोगों से मुक्त रखने का कार्य देवी शीतला को सौंपा था। तभी से उन्हें रोगों का नाश करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। लोकमान्यता है कि देवी की कृपा से शरीर के दैहिक ताप शांत होते हैं और मनुष्य को रोगों से मुक्ति मिलती है। इसी कारण चैत्र कृष्ण अष्टमी को देवी की विशेष पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।
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पूजा की अनोखी परंपरा
देवी शीतला की पूजा का विधान अन्य पर्वों की तुलना में कुछ अलग और विशेष माना जाता है। शीतला अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी की रात को ही माता के भोग के लिए मीठे चावल, राबड़ी, पुए, हलवा और पूड़ी जैसे पकवान तैयार कर लिए जाते हैं। अष्टमी के दिन इन्हीं व्यंजनों को बासी रूप में देवी को नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है। बासी भोजन का धार्मिक और व्यावहारिक संकेत इस दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और परिवार के सभी सदस्य प्रसाद के रूप में वही बासी भोजन ग्रहण करते हैं। इसके पीछे एक गहरा संकेत माना जाता है। यह समय बसंत ऋतु की विदाई और गर्मी के आगमन का होता है। इसलिए यह पर्व हमें सावधान करता है कि अब आगे के दिनों में बासी भोजन से बचना चाहिए, क्योंकि गर्मी के मौसम में इससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
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पूजा में हल्दी और शीतलता का संकेत
शीतला माता को अर्पित जल से आंखें धोने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है। यह गर्मियों में आंखों की सुरक्षा और स्वच्छता का संकेत माना जाता है। पूजन के बाद माथे पर हल्दी का तिलक लगाया जाता है और घर के मुख्य द्वार पर हल्दी से स्वास्तिक बनाकर सुख-शांति की मंगल कामना की जाती है। हल्दी को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है, जो शरीर को रोगों से बचाने और मन को प्रसन्नता देने में सहायक होती है।
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शीतलाष्टक और मां की कृपा
देवी शीतला की महिमा का वर्णन स्कंद पुराण में शीतलाष्टक के रूप में मिलता है। मान्यता है कि इसकी रचना भगवान शिव ने जनकल्याण के लिए की थी। शीतलाष्टक का पाठ करने से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को रोग, संकट और भय से मुक्त करती हैं। माता का पौराणिक मंत्र “ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः” अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। इसके जप से मनुष्य को समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
देवी के स्वरूप में छिपा संदेश
देवी शीतला के स्वरूप में भी कई प्रतीकात्मक संदेश निहित हैं। उनका वाहन गर्दभ (गधा) बताया गया है, जो परिश्रम और धैर्य का प्रतीक है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में मन को शीतल रखते हुए निरंतर परिश्रम करना चाहिए। इसी से सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। स्वच्छता और पर्यावरण का प्रतीक देवी के हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते धारण किए हुए बताए गए हैं। झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक है, जो यह संदेश देता है कि साफ-सफाई से ही रोगों से बचाव संभव है। सूप स्वच्छ भोजन ग्रहण करने की प्रेरणा देता है, क्योंकि दूषित भोजन से संक्रामक रोग फैलते हैं। कलश में भरा गंगाजल वातावरण को पवित्र और रोगाणुमुक्त करने का प्रतीक है, जबकि नीम के पत्ते अपने एंटी-बैक्टीरियल गुणों के कारण वातावरण को शुद्ध करने और स्वास्थ्य की रक्षा का संकेत देते हैं।
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