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Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी के दिन क्यों किया जाता है बासी भोजन और क्यों लगाए जाते हैं हल्दी के छापे
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Vinod Shukla
Updated Sun, 08 Mar 2026 01:59 PM IST
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सार
Sheetala Ashtami 2026: हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत होली के आठवें दिन मनाया जाता है। शीतला अष्टमी पर मां को बासी भोजन का भोग लगाने के परंपरा है होती है। ऐसे में आइए जानते हैं आखिरी क्यों मां को बासी भोजन का भोग लगाते हैं।
शीतला अष्टमी 2026
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
Sheetala Ashtami 2026: चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी का पर्व विशेष रूप से माता शीतला की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना गया है। प्राचीन काल से ही यह विश्वास रहा है कि माता की कृपा से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और विशेष रूप से बच्चों को विभिन्न रोगों से सुरक्षा मिलती है। इस पर्व की सबसे विशेष परंपरा यह है कि इस दिन माता को बासी या ठंडा भोजन का भोग लगाया जाता है और हल्दी मिले जल का विशेष प्रयोग किया जाता है। इन दोनों परंपराओं के पीछे गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है।
बासी भोजन का भोग लगाने की धार्मिक मान्यता
शीतला अष्टमी के दिन माता को ठंडा भोजन अर्पित करने की परंपरा को कई स्थानों पर बसोड़ा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शीतला माता को शीतलता अत्यंत प्रिय है। इसी कारण इस दिन गरम भोजन नहीं बनाया जाता और माता को एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन ही अर्पित किया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार माता शीतला का स्वभाव शांत और शीतल माना गया है। इसलिए उनकी पूजा में भी शीतलता का विशेष महत्व बताया गया है। इसीलिए शीतला अष्टमी से एक दिन पहले घरों में पूड़ी, पुआ, कढ़ी, मीठे चावल और अन्य पकवान बनाकर रख लिए जाते हैं और अगले दिन इन्हीं ठंडे पकवानों का भोग माता को लगाया जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा भाव से माता को ठंडा भोजन अर्पित करने से वे प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों के घर-परिवार को रोग और कष्टों से दूर रखती हैं। यही कारण है कि शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा जलाने की परंपरा नहीं मानी जाती।
शीतला अष्टमी के अवसर पर हल्दी का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता शीतला को हल्दी मिले हुए जल से स्नान कराया जाता है। हल्दी को पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए माता को हल्दी युक्त जल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। कई स्थानों पर यह परंपरा भी निभाई जाती है कि जिस जल से माता को स्नान कराया जाता है, उसी जल को घर में छिड़का जाता है। मान्यता है कि इससे घर का वातावरण शुद्ध और मंगलमय बना रहता है।
शीतला अष्टमी के दिन घर के मुख्य द्वार और दीवारों पर हल्दी के छाप या हाथ के निशान लगाने की भी परंपरा है। इसे माता शीतला के स्वागत और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रतीक माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार हल्दी का यह चिन्ह घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और माता की कृपा से घर-परिवार को रोग और नकारात्मकता से रक्षा मिलती है। कई स्थानों पर माता को स्नान कराने वाले हल्दी जल को बच्चों की आंखों पर भी लगाया जाता है और घर में छिड़का जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चों की रक्षा होती है और माता का आशीर्वाद बना रहता है।
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बासी भोजन का भोग लगाने की धार्मिक मान्यता
शीतला अष्टमी के दिन माता को ठंडा भोजन अर्पित करने की परंपरा को कई स्थानों पर बसोड़ा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शीतला माता को शीतलता अत्यंत प्रिय है। इसी कारण इस दिन गरम भोजन नहीं बनाया जाता और माता को एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन ही अर्पित किया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार माता शीतला का स्वभाव शांत और शीतल माना गया है। इसलिए उनकी पूजा में भी शीतलता का विशेष महत्व बताया गया है। इसीलिए शीतला अष्टमी से एक दिन पहले घरों में पूड़ी, पुआ, कढ़ी, मीठे चावल और अन्य पकवान बनाकर रख लिए जाते हैं और अगले दिन इन्हीं ठंडे पकवानों का भोग माता को लगाया जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा भाव से माता को ठंडा भोजन अर्पित करने से वे प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों के घर-परिवार को रोग और कष्टों से दूर रखती हैं। यही कारण है कि शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा जलाने की परंपरा नहीं मानी जाती।
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हल्दी जल का महत्वशीतला अष्टमी के अवसर पर हल्दी का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता शीतला को हल्दी मिले हुए जल से स्नान कराया जाता है। हल्दी को पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए माता को हल्दी युक्त जल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। कई स्थानों पर यह परंपरा भी निभाई जाती है कि जिस जल से माता को स्नान कराया जाता है, उसी जल को घर में छिड़का जाता है। मान्यता है कि इससे घर का वातावरण शुद्ध और मंगलमय बना रहता है।
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दरवाजों पर हल्दी के छाप लगाने की परंपराशीतला अष्टमी के दिन घर के मुख्य द्वार और दीवारों पर हल्दी के छाप या हाथ के निशान लगाने की भी परंपरा है। इसे माता शीतला के स्वागत और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रतीक माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार हल्दी का यह चिन्ह घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और माता की कृपा से घर-परिवार को रोग और नकारात्मकता से रक्षा मिलती है। कई स्थानों पर माता को स्नान कराने वाले हल्दी जल को बच्चों की आंखों पर भी लगाया जाता है और घर में छिड़का जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चों की रक्षा होती है और माता का आशीर्वाद बना रहता है।
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