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Dasha Mata Vrat 2026: ग्रहों की अशुभ दशा से मिलती है राहत, जानें दशा माता व्रत का महत्व, पूजा विधि और नियम

अनीता जैन ,वास्तुविद Published by: Vinod Shukla Updated Thu, 12 Mar 2026 04:34 PM IST
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सार

दशा माता की पूजा-आराधना करने से व्यक्ति के ग्रहों की दशा में सुधार होता है। आर्थिक स्थिति अच्छी और भाग्य में बदलाव आता है। 

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दशा माता का व्रत 13 मार्च, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार

Dasha Mata Vrat 2026: हिंदू धर्म में कई ऐसे व्रत और पर्व बताए गए हैं जो जीवन की कठिनाइयों को दूर करने और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण व्रत है दशा माता व्रत। धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा अपने परिवार की सुख-समृद्धि और ग्रहों की अशुभ दशा को दूर करने के लिए किया जाता है। राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में दशा माता की पूजा अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ की जाती है। मान्यता है कि जो महिलाएं श्रद्धा से यह व्रत करती हैं, उनके परिवार पर आने वाली विपत्तियां दूर हो जाती हैं और घर में सुख-शांति बनी रहती है। इस बार दशा माता का व्रत 13 मार्च, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। 

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दशा माता व्रत का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दशा माता को जीवन की विपरीत परिस्थितियों को दूर करने वाली देवी माना जाता है। जब किसी व्यक्ति या परिवार पर ग्रहों की प्रतिकूल दशा चलती है, तो जीवन में अनेक प्रकार की परेशानियां आने लगती हैं। ऐसे समय में दशा माता की पूजा और व्रत करने से ग्रहों की अशुभता कम होती है और जीवन में शुभ फल प्राप्त होने लगते हैं। लोक मान्यता है कि दशा माता की पूजा करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है, परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और संतान की उन्नति होती है। इसलिए महिलाएं पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ यह व्रत करती हैं।

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दशा माता की पूजा विधि
दशा माता व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद घर के मंदिर या किसी पवित्र स्थान पर पूजा की तैयारी की जाती है। कई स्थानों पर महिलाएं पीपल के पेड़ के पास या दीवार पर दशा माता का प्रतीक बनाकर पूजा करती हैं। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर दशा माता का प्रतीक स्थापित किया जाता है। इसके बाद रोली, हल्दी, अक्षत, फूल और कच्चे सूत के धागे से माता की पूजा की जाती है। विशेष रूप से हल्दी में भिगोया हुआ दस गांठों वाला धागा माता को अर्पित किया जाता है, जिसे दशा माता का डोरा कहा जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं दशा माता की कथा सुनती या पढ़ती हैं और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं , अंत में माता को गुड़, चना या अन्य प्रसाद अर्पित किया जाता है और पूजा के उपरांत धागे को गले में धारण करती हैं और दस कथाएं सुनती हैं,जिसमें नल-दमयंती की कथा प्रमुख है। 

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दशा माता व्रत के नियम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दशा माता का व्रत करते समय कुछ नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है। व्रत के दिन सुबह स्नान करके ही पूजा करनी चाहिए। पूजा में दस गांठों वाला डोरा चढ़ाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद दशा माता की कथा अवश्य सुननी चाहिए। इस दिन घर में साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। व्रत के दौरान माता से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए।  

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