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ChatGPT: क्या चैटजीपीटी पर 'प्लीज' और 'थैंक्यू' लिखने से ज्यादा बिजली खर्च होती है? जानिए सच

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुयश पांडेय Updated Thu, 15 Jan 2026 02:13 PM IST
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सार

इंटरनेट पर यह धारणा फैल रही है कि चैटजीपीटी से बात करते समय 'प्लीज' और 'थैंक्यू' जैसे शब्द लिखने से अतिरिक्त ऊर्जा खर्च होती है और इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। हालांकि हकीकत कुछ और ही है, जानिए इस लेख में।

Does Saying ‘Please’ to ChatGPT Harm the Environment? The Real Energy Cost of AI Explained
एआई डाटा सेंटर (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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अगर इंटरनेट पर चल रही बातों पर भरोसा करें तो ऐसा लग सकता है कि चैटजीपीटी से सवाल पूछते समय 'प्लीज' और 'थैंक्यू' जैसे शब्द न लिखकर आप पर्यावरण की मदद कर रहे हैं। तर्क यह दिया जाता है कि जितने ज्यादा शब्द होंगे, उतनी ज्यादा प्रोसेसिंग होगी और उतनी ही ज्यादा ऊर्जा खर्च होगी। खुद ओपनएआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन भी मान चुके हैं कि अरबों सवालों के स्तर पर यह लागत बढ़ जाती है। लेकिन सच यह है कि सिर्फ विनम्र शब्दों की वजह से पर्यावरण पर कोई बड़ा असर पड़ता है, यह कहना अतिश्योक्ति होगी। कुछ अतिरिक्त शब्दों से होने वाली ऊर्जा खपत, उन बड़े डाटा सेंटर्स की तुलना में बहुत ही मामूली है जो चैटजीपीटी जैसे सिस्टम को चलाते हैं। फिर भी, यह सोच एक अहम बात जरूर बताती है कि लोग अब समझने लगे हैं कि एआई कोई जादू नहीं है जो हवा में चलता हो। बल्कि इसके पीछे असली मशीनें, बिजली और संसाधन लगते हैं, जिनका वास्तविक असर दुनिया पर पड़ता है।

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डाटा सेंटर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर हैं असली लागत

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को चलाने के लिए बड़े-बड़े डाटा सेंटर्स की जरूरत होती है। इनमें बहुत ताकतवर कंप्यूटर लगे होते हैं, जो काफी ज्यादा बिजली इस्तेमाल करते हैं। इन मशीनों को ठंडा रखने के लिए लगातार कूलिंग करनी पड़ती है, जिसमें पानी और ऊर्जा दोनों खर्च होते हैं। यही वजह है कि एआई का सीधा संबंध बिजली, पानी और जमीन जैसे संसाधनों से जुड़ जाता है। जैसे-जैसे एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसका पर्यावरण पर असर भी बढ़ता जा रहा है। इसलिए असली मुद्दा यह नहीं है कि हम एआई से सवाल पूछते समय कैसे शब्द लिखते हैं, बल्कि यह है कि हम इन सिस्टम्स का इस्तेमाल कितनी बार और कितनी ज्यादा मात्रा में कर रहे हैं।

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हर एआई सवाल की एक 'ऊर्जा लागत' क्यों है?

एआई और हमारी रोजमर्रा की डिजिटल सेवाओं, जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग, के बीच एक अहम फर्क है, जिसे समझना जरूरी है। पारंपरिक सॉफ्टवेयर में जब आप कोई डॉक्यूमेंट खोलते हैं या वीडियो देखते हैं तो सिस्टम ज्यादातर पहले से मौजूद डाटा को ही दिखाता है। इसमें ज्यादा नई प्रोसेसिंग नहीं होती इसलिए ऊर्जा भी कम खर्च होती है। एआई मॉडल के मामले में ऐसा नहीं है। जब आप एआई से कोई सवाल पूछते हैं तो वह हर बार आपके लिए नया जवाब तैयार करता है। इसे तकनीकी भाषा में 'इंटरफेरेंस' कहा जाता है। इसका मतलब है कि हर सवाल पर एआई को फिर से पूरी गणना करनी पड़ती है, जिससे हर बार नई ऊर्जा खर्च होती है। यही वजह है कि एआई सामान्य सॉफ्टवेयर से अलग है। यह एक तरह के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह काम करता है। जितना ज्यादा इस्तेमाल होगा, उतनी ही ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ेगी।

सिर्फ बिजली नहीं, पानी भी है मुद्दा

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी) ने चेतावनी दी है कि इस दशक के अंत तक डाटा सेंटरों की बिजली की खपत दोगुनी हो सकती है। लेकिन मामला सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है। 

पानी: डाटा सेंटरों में लगे सर्वरों को ठंडा रखने के लिए बहुत ज्यादा पानी इस्तेमाल होता है।
संसाधन: इन्हें बनाने और चलाने में जमीन और कई तरह की अन्य सामग्री भी लगती है।
हालांकि एआई सेवाएं पूरी दुनिया में इस्तेमाल होती हैं लेकिन उनका असर सबसे ज्यादा स्थानीय स्तर पर दिखता है। जहां डाटा सेंटर बने होते हैं वहां की बिजली और पानी की सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

मिथक क्यों मायने रखता है?

न्यूजीलैंड जैसे देशों को ही देख लें, यहां ज्यादातर बिजली रिन्युएबल एनर्जी से बनाई जाती है। इसके बावजूद, जब वहां नए डाटा सेंटर बनते हैं तो स्थानीय बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ जाता है। वजह साफ है- जो बिजली सर्वर चलाने में इस्तेमाल होती है, वह बिजली किसी और काम के लिए उपलब्ध नहीं रहती। इसलिए एआई को सिर्फ एक डिजिटल सुविधा मानने के बजाय, हमें इसे एक ऐसी भौतिक प्रणाली के रूप में देखना चाहिए, जिसे असली बिजली और संसाधनों की जरूरत होती है। 

चैटजीपीटी से बात करते समय 'प्लीज' और 'थैंक्यू' न लिखने वाला विचार भले ही वैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ा असर न डालता हो, लेकिन यह एक संकेत जरूर है। इससे पता चलता है कि लोग अब यह समझने लगे हैं कि एआई का भी पर्यावरण पर असर पड़ता है। इस सोच को गंभीरता से लेना जरूरी है ताकि हम यह तय कर सकें कि एआई के इंफ्रास्ट्रक्चर को हमारी ऊर्जा योजनाओं और समाज के साथ कैसे बेहतर तरीके से जोड़ा जाए। एआई को नकारने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह रिसर्च और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है। लेकिन किसी भी दूसरे उद्योग की तरह इसके भी फायदे हैं और नुकसान भी। अगर हम एआई को सिर्फ 'दिखाई न देने वाला सॉफ्टवेयर' मानेंगे तो इसकी असली कीमत और असर को समझ नहीं पाएंगे।

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