Google AI Deal: अमेरिकी सेना के गुप्त ऑपरेशंस में होगा गूगल AI का इस्तेमाल, कर्मचारी ने कहा- यह बेहद शर्मनाक
Google AI Military Contract: गूगल और अमेरिकी सेना के बीच हुई एक नई एआई डील पर विवाद खड़ा हो गया है। कंपनी के कर्मचारी इस फैसले से काफी नाराज हैं और उन्हें डर है कि तकनीक का इस्तेमाल जासूसी या खतरनाक हथियारों में हो सकता है। इसे लेकर गूगल डीपमाइंड के रिसर्चर ने एक्स पर एक पोस्ट भी साझा की, जिसमें उन्होंने कहा कि कंपनी का यह फैसला बेहद शर्मनाक है। हालांकि कंपनी ने सफाई दी है कि एआई का इस्तेमाल सिर्फ साइबर सुरक्षा और बचाव के कामों के लिए किया जाएगा।
विस्तार
Google एक बार फिर अपने ही कर्मचारियों के विरोध का सामना कर रहा है। इस विवाद की वजह अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के साथ हुआ एक नया 'क्लासिफाइड' कॉन्ट्रैक्ट है। इसके तहत सेना को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टूल्स दिए जाएंगे। इस डील ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि बड़ी टेक कंपनियों को सेना के लिए एआई टूल्स बनाने में किस हद तक शामिल होना चाहिए।
रिसर्चर ने जाहिर की नाराजगी
इस फैसले की सबसे तीखी आलोचना Google DeepMind (कंपनी का एडवांस्ड एआई डिवीजन) के एक रिसर्च साइंटिस्ट एंड्रियास किर्श ने की है। रिपोर्ट के मुताबिक, जब यह खबर सामने आई कि Google ने अमेरिकी रक्षा विभाग के साथ अपनी साझेदारी बढ़ा ली है तो किर्श ने एक्स पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा, "Google के जरिए गुप्त सैन्य कामों के लिए हमारे एआई मॉडल का इस्तेमाल करने की डील साइन करना मुझे निशब्द कर गया है। सच कहूं तो, यह बेहद शर्मनाक है।" किर्श ने बताया कि वह रात को इस उम्मीद के साथ सोए थे कि कर्मचारियों के जरिए लिखे गए पत्र का कंपनी के लीडर्स पर कुछ असर होगा और वे इस पर पुनर्विचार करेंगे। लेकिन सुबह उठने पर उन्हें पता चला कि यह कॉन्ट्रैक्ट साइन हो चुका है।
आखिर डर किस बात का है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस डील को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि अमेरिकी सेना गूगल की एआई तकनीक का इस्तेमाल अपने बेहद गुप्त ऑपरेशंस में कर सकती है। कर्मचारियों को डर है कि उनकी मेहनत और बुद्धिमत्ता से तैयार की गई इस तकनीक का गलत इस्तेमाल लोगों की जासूसी करने या उन पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है। इससे भी बड़ा खतरा उन जानलेवा और स्वचालित हथियारों को लेकर है, जो बिना किसी मानवीय दखल के खुद-ब-खुद फैसले लेने और हमला करने में सक्षम होते हैं। कर्मचारियों को लगता है कि सैन्य उपयोग की छूट मिलने से एआई का इस्तेमाल शांति के बजाय विनाशकारी कामों में होने लगेगा।
I'm speechless at Google signing a deal to use our AI models for classified tasks. Frankly, it is shameful.
— Andreas Kirsch 🇺🇦 (@BlackHC) April 28, 2026
For HR, I'm not speaking on behalf of Google but in my personal capacity, quoting public information from a well-sourced article of a reputable publication pic.twitter.com/KXBAHrr87Z
सैकड़ों कर्मचारियों ने किया था विरोध
इस डील के फाइनल होने से पहले ही गूगल के अंदर असंतोष की लहर दौड़ गई थी। कंपनी के 600 से अधिक कर्मचारियों ने सीईओ सुंदर पिचाई को पत्र लिखकर अपनी गहरी चिंता जाहिर की और मांग की कि पेंटागन को गुप्त ऑपरेशंस के लिए गूगल की एआई तकनीक का इस्तेमाल करने की अनुमति न दी जाए।
कर्मचारियों को मुख्य रूप से इस बात का डर सता रहा है कि इस तकनीक का उपयोग भविष्य में खतरनाक ऑटोमैटिक हथियारों, सर्विलांस सिस्टम या ऐसे जटिल सैन्य फैसलों में हो सकता है। इसके परिणाम बेहद विनाशकारी साबित हों। साथ ही, स्टाफ का यह भी मानना है कि एक बार यह तकनीक सरकार के 'क्लासिफाइड' प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बन गई तो गूगल के पास इसे नियंत्रित करने या इसके दुरुपयोग को रोकने का कोई वास्तविक जरिया नहीं बचेगा।
Google का क्या कहना है?
इस बढ़ते विवाद के बीच गूगल ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि यह डील दरअसल उनके एक पुराने कॉन्ट्रैक्ट का ही हिस्सा है। कंपनी के प्रवक्ता ने भरोसा दिलाया है कि उनकी एआई तकनीक का इस्तेमाल सेना की मारक क्षमता बढ़ाने या किसी जानलेवा काम के लिए नहीं किया जाएगा। इसके बजाय, इसका उपयोग साइबर सिक्योरिटी, भाषाओं के अनुवाद, सैन्य वाहनों के रखरखाव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा जैसे सहायक कामों तक ही सीमित रहेगा। अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए गूगल ने साफ कहा है कि वह आज भी अपने सिद्धांतों पर अडिग है और बिना मानवीय नियंत्रण वाले घातक हथियारों या सामूहिक निगरानी जैसे कामों के लिए अपनी तकनीक के इस्तेमाल के सख्त खिलाफ है।
टेक इंडस्ट्री में बढ़ रहा है सेना का दखल
यह सिर्फ Google की कहानी नहीं है। हाल के वर्षों में ओपनएआई, एंथ्रोपिक, एक्सएआई, एंडुरिल और पलान्टिर जैसी कई बड़ी कंपनियों ने रक्षा एजेंसियों के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। जैसे-जैसे एआई ताकतवर हो रहा है, सरकारें भी खुफिया जानकारी, सुरक्षा और युद्धक्षेत्र में मदद के लिए टेक कंपनियों का रुख कर रही हैं।
हालांकि, Google में हो रहा यह विरोध इस बात का सुबूत है कि सिलिकॉन वैली के सभी लोग इस बदलाव से खुश नहीं हैं। टेक कर्मचारियों के लिए अब सवाल यह नहीं है कि एआई का इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र में हो सकता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या कंपनियां बिना मजबूत नियमों और नैतिकता के इस दिशा में बहुत तेजी से आगे बढ़ रही हैं?
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