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दर्शकों का दिमाग पढ़कर बनेंगी फिल्में: ब्रिटेन के इस 'सिनेमा लैब' में मशीनों से हो रहा है अनोखा प्रयोग, जानें

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitish Kumar Updated Thu, 30 Apr 2026 06:30 PM IST
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सार

सोचिए, आप हॉल में फिल्म देख रहे हों और कोई मशीन आपके दिल की धड़कन पढ़ रही हो! ब्रिटेन की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के 'सिनेमा लैब' में ऐसा ही प्रयोग हो रहा है। यहां दर्शकों की भावनाएं ट्रैक कर भविष्य की दमदार फिल्में बनाने की तैयारी चल रही है।

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दिमाग पढ़कर फिल्में बनाने की तैयारी - फोटो : एआई जनरेटेड
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विस्तार

कल्पना कीजिए कि आप एक बेहद शानदार सिनेमा हॉल में बैठे हैं। सामने 4K प्रोजेक्टर पर फिल्म चल रही है, सराउंड साउंड गूंज रहा है और कुर्सियां बेहद आरामदायक हैं। लेकिन, इस हॉल में एक बड़ा ट्विस्ट है। आपके सिर पर मरीजों की तरह एक मेडिकल हेडसेट लगा हुआ है। आपके हाथों और दिल की धड़कनों को मापने के लिए शरीर पर सेंसर और मॉनिटर चिपकाए गए हैं। इतना ही नहीं, वहां लगे इन्फ्रारेड कैमरे आपकी पलक झपकने की रफ्तार को भी बारीकी से रिकॉर्ड कर रहे हैं। पर्दे पर चल रहे दृश्यों को देखकर आपका शरीर जो भी प्रतिक्रिया दे रहा है, वह सब कुछ एक डेटा के रूप में दर्ज हो रहा है।
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ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी का अनोखा 'सिनेमा लैब'
यह कोई ख्याली पुलाव नहीं है, बल्कि ब्रिटेन की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में बनाए गए एक असल 'सिनेमा लैब' का दृश्य है। इस लैब में दर्शकों की हर छोटी-बड़ी शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड किया जा रहा है। इस पूरी कवायद का मुख्य मकसद यह समझना है कि स्क्रीन पर चल रही चीजों को देखकर इंसानी दिमाग कैसे रिएक्ट करता है। इस अहम जानकारी के आधार पर भविष्य में ऐसी फिल्में बनाने की तैयारी है, जो दर्शकों से ज्यादा गहराई से जुड़ सकें और उनके लिए ज्यादा मायने रखें।
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तकनीक और इंसानी भावनाओं का तालमेल
शोधकर्ताओं की टीम यह बारीकी से अध्ययन कर रही है कि फिल्म का कौन सा हिस्सा लोगों को सबसे ज्यादा अपनी तरफ खींचता है। इसके लिए वे दर्शकों के शरीर में होने वाले बदलावों और फिल्म के बाद उनके मौखिक फीडबैक को आपस में मिलाते हैं। इससे यह सटीक तौर पर पता चल जाता है कि फिल्म के किस क्षण ने दर्शकों का ध्यान सबसे ज्यादा अपनी ओर खींचा। यह जानकारी फिल्म निर्माताओं के लिए किसी खजाने से कम नहीं है। इसकी मदद से वे दर्शकों की पसंद को समझते हुए ज्यादा रचनात्मक जोखिम उठा सकेंगे और पहले से कहीं ज्यादा बेहतरीन फिल्में बना पाएंगे।

सिनेमा और ओटीटी में आएगा डेटा आधारित क्रांति का दौर
इस पूरी परियोजना की कमान ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के मशहूर न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट प्रोफेसर इयान गिलक्रिस्ट संभाल रहे हैं। प्रोफेसर गिलक्रिस्ट का मानना है कि यह नई तकनीक पूरी फिल्म इंडस्ट्री को 'डेटा आधारित रचनात्मकता' के एक नए युग में ले जाएगी। इससे न केवल दर्शकों को बांधकर रखने वाली फिल्में बनेंगी, बल्कि सिनेमा देखने का उनका पूरा अनुभव ही बदल जाएगा। सबसे खास बात यह है कि आने वाले समय में इस रिसर्च का फायदा सिर्फ सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, वीडियो गेमिंग और वर्चुअल रियलिटी (VR) की दुनिया में भी बड़े और क्रांतिकारी बदलाव लेकर आएगा।

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