सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Technology ›   Tech Diary ›   Decoding CAPTCHA Invisible War Between Human Intelligence and Automated Bots

CAPTCHA: इंटरनेट पर बार-बार क्यों साबित करना पड़ता है कि आप इंसान हैं? जानें क्या है कैप्चा और इसका असली सच

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जागृति Updated Fri, 06 Feb 2026 07:00 AM IST
विज्ञापन
सार

History of CAPTCHA: अक्सर इंटरनेट पर कुछ भी सर्च करते ही हमारा सामना एक छोटे से सवाल से होता है, आर यू अ रोबोट? ये सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि एक मशीन हमसे पूछ रही है कि हम इंसान हैं या नहीं। लेकिन इस साधारण से दिखने वाले टेस्ट, जिसे हम कैप्चा (CAPTCHA) कहते हैं, इसके पीछे साइबर सुरक्षा का एक कवच छिपा है। वह क्या है जानिए इस लेख में विस्तार से...
 

Decoding CAPTCHA Invisible War Between Human Intelligence and Automated Bots
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : freepik
विज्ञापन

विस्तार

कैप्चा का फुलफार्म Completely Automated Public Turing test to tell Computers and Humans Apart होता है। यानी एक ऐसा टेस्ट जो इंसान चुटकियों में हल कर सकता है, लेकिन दुनिया के सबसे ताकतवर सुपरकंप्यूटर और एआई एल्गोरिदम के लिए इसे समझना एक बड़ी चुनौती होती है।

Trending Videos


कैप्चा जरूरी क्यों है?
इंटरनेट पर हजारों-लाखों ऑटोमैटिक प्रोग्राम्स (Bots) सक्रिय रहते हैं, जो स्पैम फैलाने, फर्जी अकाउंट बनाने, टिकट या सेल आइटम्स को सेकंडों में खरीदने और पासवर्ड तोड़ने की कोशिश करते हैं। कैप्चा इन बॉट्स को रोकने का काम करता है। जैसे मान लीजिए ऑनलाइन टिकट बुकिंग, भारी डिस्काउंट वाली ई-कॉमर्स सेल, वेबसाइट कमेंट सेक्शन और लॉगिन व पासवर्ड पेज। इन जगहों पर कैप्चा इसलिए लगाया जाता है ताकि असली यूजर्स को प्राथमिकता मिले, न कि मशीनों को।
विज्ञापन
विज्ञापन


हैकिंग और स्पैम को कैसे रोकता है कैप्चा ?
हैकर्स बॉट्स के जरिए लाखों पासवर्ड कॉम्बिनेशन आजमाते हैं। कैप्चा बॉट्स को बार-बार रुकने पर मजबूर करता है, क्योंकि वे पहेलियां हल नहीं कर पाते। इससे अकाउंट सुरक्षित रहता है।

कहां से हुई शुरुआत?
कैप्चा का इतिहास 90 के दशक के अंत से शुरू होता है। वर्ष 1997 में अल्टाविस्टा ने पहली बार इसे इस्तेमाल किया था, लेकिन इसे आधिकारिक पहचान और नाम 2003 में कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के लुइस वॉन अहन और उनकी टीम ने दिया। लुइस ने बाद में री कैप्चा बनाया गया, इसमें पु़राने अखबारों के उन शब्दों को दिखाया जाता था जिन्हें कंप्यूटर स्कैन नहीं कर पाते थे। जब लाखों लोग उसे हल करते, तो अंजाने में वे पुरानी किताबों को डिजिटल बनाने में मदद कर रहे होते थे। गूगल ने इसकी ताकत को समझा और 2009 में इसे खरीद लिया। इसके बाद गूगल ने इसे दो बड़े उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया। 

गूगल बुक्स: लाखों पुरानी किताबों को डिजिटल बनाने के काम में तेजी आई।

गूगल मैप्स: आपने गौर किया होगा कि कुछ समय बाद कैप्चा में मकानों के नंबर और सड़क के साइन बोर्ड दिखने लगे। दरअसल, गूगल आपसे अपने स्ट्रीट व्यू मैप्स के लिए घर के नंबर और साइन बोर्ड पढ़वा रहा था ताकि मैप्स और सटीक हो सकें। फिर जैसे-जैसे एआई एडवांस हुआ,बॉट्स भी टेढ़े-मेढ़े शब्दों को पढ़ने लगे। तब गूगल ने आई एम नॉट अ रोबोट वाला चेकबॉक्स पेश किया। ये सिर्फ एक क्लिक नहीं देखता,  बल्कि क्लिक करने से पहले आपके माउस की मूवमेंट, ब्राउजर की हिस्ट्री और कुकीज को ट्रैक करता है। इंसान का माउस थोड़े अव्यवस्थित तरीके से हिलता है, जबकि बॉट बिल्कुल सीधी रेखा में या झटके से क्लिक करता है। इसी से इंसान और मशीन में फर्क समझ आ जाता है।

गूगल मुफ्त में कैसे लेता है आपसे काम?
इतना ही नहीं जब आप कैप्चा में साइकिल, बस या कार वाली तस्वीरें पहचानते हैं, तब आप अंजाने में गूगल के एआई सिस्टम को ट्रेन कर रहे होते हैं। इससे गूगल की सेल्फ ड्राइविंग कार्स और इमेज रिकॉग्नेशन टेक्नोलॉजी बेहतर होती है। यानी सुरक्षा के साथ-साथ आप एआई डेवलपमेंट में भी योगदान दे रहे होते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News App अपने मोबाइल पे|
Get all Tech News in Hindi related to live news update of latest mobile reviews apps, tablets etc. Stay updated with us for all breaking news from Tech and more Hindi News.

विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

Election
एप में पढ़ें

Followed