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AI: आपके डेटा पर किसका नियंत्रण? विदेशी एआई सिस्टम इस्तेमाल करने पर सरकारों के सामने खड़े हो रहे बड़े सवाल

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitish Kumar Updated Mon, 27 Apr 2026 05:52 PM IST
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सार

सरकारें तेजी से विदेशी कंपनियों के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम अपना रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि एआई के इस दौर में क्या आपका पर्सनल डेटा वाकई में सुरक्षित हाथों में है? जानिए, विदेशी सर्वर और कंपनियों के पास आपके डेटा जाने के क्या खतरे हो सकते हैं।

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एआई के दौर में कितना सुरक्षित हमारा डेटा? - फोटो : एआई जनरेटेड
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विस्तार

दुनिया भर की सरकारें आज शासन, पुलिसिंग, स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपना रही हैं। तकनीक के इस दौर में सब कुछ बहुत तेज और आसान लग रहा है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ा सवाल छिपा है। जब हमारे डेटा को प्रोसेस करने वाले ये सिस्टम विदेशी टेक्नोलॉजी कंपनियों द्वारा बनाए और चलाए जाते हैं, तो आम नागरिकों के डेटा का क्या होता है? पालेंटिर टेक्नोलॉजीज (Palantir Technologies) जैसी विदेशी कंपनियों द्वारा तैयार किए गए प्लेटफॉर्म बड़े पैमाने पर नागरिकों के विशाल डेटाबेस को एकीकृत करने और उसका विश्लेषण करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। भले ही यह सरकारों के लिए दक्षता और भविष्य के सटीक अनुमान लगाने की क्षमता का वादा करता है, लेकिन यह नागरिकों की निजता, उनके डेटा पर नियंत्रण और देश की संप्रभुता को लेकर गहरी चिंताएं भी पैदा करता है।
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एआई सिस्टम आखिर किस तरह के डेटा का इस्तेमाल करते हैं?
आज के आधुनिक एआई-संचालित गवर्नेंस प्लेटफॉर्म कई अलग-अलग डेटा स्ट्रीम को एक ही सिस्टम में जोड़ने की क्षमता पर निर्भर करते हैं। इसे तकनीकी भाषा में 'सिंगल ग्लोबल डेटा प्लेन' या 'डेटा लेकहाउस' कहा जाता है। इसमें आपके स्वास्थ्य रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन से लेकर आपकी लोकेशन का डेटा, पहचान से जुड़े डेटाबेस और यहां तक कि आपके व्यवहार के तरीके भी शामिल होते हैं। माइक्रोसॉफ्ट परव्यू (Microsoft Purview) या डेटाब्रिक्स यूनिटी कैटलॉग (Databricks Unity Catalog) जैसे सिस्टम डेटा की सुरक्षा और स्वचालित मेटाडेटा लेबलिंग के लिए एक पारदर्शी और एकीकृत प्लेटफॉर्म प्रदान करते हैं।
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अगर भारत के संदर्भ में बात करें, तो यहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। ऐसे में इस डेटा का आकार अकल्पनीय रूप से विशाल है। लगभग 120 करोड़ से ज्यादा जारी किए गए आधार आईडी और यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म पर लगभग 500 मिलियन (50 करोड़) उपयोगकर्ताओं के साथ, हमारी सरकार के पास दुनिया के सबसे बड़े स्ट्रक्चर्ड और रियल-टाइम डेटा तक पहुंच है। एआई सिस्टम इस बिखरे हुए डेटा को लेकर विस्तृत प्रोफाइल तैयार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, ये सिस्टम यह पहचान सकते हैं कि आप कैसे यात्रा करते हैं, कहां खर्च करते हैं या किन सेवाओं का लाभ उठाते हैं। इस तरह की जानकारियां नीतियां बनाने और सेवाएं देने में सुधार कर सकती हैं, लेकिन असल जिंदगी में इसका मतलब यह है कि आपकी बेहद निजी जानकारी ऐसे सिस्टम द्वारा बड़े पैमाने पर प्रोसेस की जा रही है जो पूरी तरह से पारदर्शी नहीं हैं।

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डेटा सुरक्षा के लिए भारत में विशेष एक्ट है लागू - फोटो : एआई जनरेटेड
आपका डेटा कहां जाता है और इसे कौन देख सकता है?
जब सरकारें विदेशी एआई प्लेटफॉर्म का उपयोग करती हैं, तो यह मुमकिन है कि डेटा भौतिक रूप से देश की सीमाओं के भीतर ही स्टोर किया गया हो, लेकिन सॉफ्टवेयर का आर्किटेक्चर और कभी-कभी उसे एक्सेस करने के प्रोटोकॉल बाहरी विदेशी संस्थाओं के नियंत्रण में होते हैं। अमेरिकी कंपनियों के मामले में, वहां का 'क्लाउड एक्ट' (CLOUD Act) जैसे कानून अमेरिकी अधिकारियों को अमेरिका में मुख्यालय वाली कंपनियों से डेटा मांगने की अनुमति देते हैं, भले ही वह डेटा विदेशों में संग्रहीत हो। यह एक ऐसा कानूनी ग्रे-एरिया बनाता है जहां भारतीय नागरिकों का डेटा कुछ खास परिस्थितियों में विदेशी सरकारों द्वारा एक्सेस किया जा सकता है। यह सब काफी हद तक अनुबंध समझौतों, एन्क्रिप्शन मानकों और सिस्टम को लागू करने के तरीके पर निर्भर करता है।

डेटा सुरक्षा पर भारत का कानून क्या कहता है?
भारत ने 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' (DPDP Act) के जरिए इन चिंताओं को दूर करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। यह कानून तय करता है कि व्यक्तिगत डेटा को कैसे एकत्र, प्रोसेस और स्टोर किया जा सकता है, और यह सरकारी और निजी दोनों संस्थाओं पर दायित्व डालता है। यह कानून सहमति, उद्देश्य की सीमा और डेटा को कम से कम इस्तेमाल करने जैसी अवधारणाओं को पेश करता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि नागरिकों को अपने डेटा के उपयोग पर अधिक नियंत्रण मिलना चाहिए।

हालांकि, इस कानून को पूरी तरह से लागू करना अभी भी प्रगति पर है। यह कानून सरकारी एजेंसियों को कुछ छूट भी देता है, विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में। इससे एक ऐसी स्थिति पैदा होती है जहां सीमित पारदर्शिता के साथ बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग अभी भी हो सकती है। यह कानून उस डिजिटल व्यक्तिगत डेटा पर लागू होता है जो या तो ऑनलाइन एकत्र किया जाता है या ऑफलाइन स्रोतों से डिजिटल रूप में परिवर्तित किया जाता है। यह उन संस्थाओं, जिन्हें डेटा फिड्यूशियरी कहा जाता है, को यह सुनिश्चित करने के लिए भी बाध्य करता है कि उनके द्वारा प्रोसेस की गई जानकारी सटीक और सुरक्षित रहे, और केवल तब तक ही रखी जाए जब तक उसकी जरूरत हो। उद्देश्य पूरा होने के बाद डेटा को डिलीट करना अनिवार्य है।

इस कानून ने नागरिकों के अधिकारों को भी मजबूत किया है। नागरिक अपने व्यक्तिगत डेटा तक पहुंच सकते हैं, सुधार का अनुरोध कर सकते हैं, उसे हटाने की मांग कर सकते हैं और दुरुपयोग होने पर शिकायत भी दर्ज कर सकते हैं। इसके अलावा, एक बड़े बदलाव के रूप में, इस अधिनियम ने डेटा को देश के बाहर भेजने पर "ब्लैकलिस्टिंग" का दृष्टिकोण अपनाया है। यानी डेटा को अधिकांश देशों में तब तक ट्रांसफर किया जा सकता है जब तक कि सरकार द्वारा उन देशों को विशेष रूप से प्रतिबंधित न किया गया हो। यह पहले की सख्त डेटा स्थानीयकरण (डेटा लोकलाइजेशन) आवश्यकताओं से एक बड़ा बदलाव है।

सरकारी कामकाज में एआई का बढ़ता इस्तेमाल और खतरे
इन सिस्टम्स के इस्तेमाल का सबसे बड़ा असर निगरानी (सर्विलांस) के विस्तार के रूप में सामने आता है। जब कई डेटासेट को एक साथ जोड़ दिया जाता है, तो किसी भी व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं को ट्रैक करना संभव हो जाता है। एआई सिस्टम को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वे पैटर्न की पहचान कर सकें और किसी के भी व्यवहार की भविष्यवाणी कर सकें। यह धोखाधड़ी पकड़ने या सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है, लेकिन इससे लोगों को उनकी जानकारी के बिना ही कुछ खास श्रेणियों में बांटने या संदिग्ध मानने का खतरा भी बढ़ जाता है।

यहीं से जवाबदेही का सवाल भी उठता है। यदि कोई एल्गोरिदम किसी व्यक्ति को वित्तीय सिस्टम, कानून प्रवर्तन या कल्याणकारी योजनाओं में उच्च जोखिम वाला (हाई-रिस्क) घोषित कर देता है, तो उस फैसले को कैसे चुनौती दी जा सकती है? और यदि सिस्टम गलती करता है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? इन सिस्टम्स के पूरी तरह से पारदर्शी न होने के कारण इन्हें "ब्लैक बॉक्स" की तरह माना जाता है, जहां अक्सर सरकारी अधिकारियों को भी यह समझ नहीं आता कि फैसले किस आधार पर लिए जा रहे हैं।

टेक इकोसिस्टम में डेटा संप्रभुता का मतलब
डेटा संप्रभुता का मूल विचार यह है कि किसी देश को अपनी सीमाओं के भीतर उत्पन्न होने वाले डेटा पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। भारत स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग और यूपीआई लेनदेन के दम पर दुनिया का 20% डेटा पैदा करता है, फिर भी हमारे पास वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता का केवल 3% ही मौजूद है। हालांकि, सीबीआरई ग्रुप (CBRE Group) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी डेटा सेंटर क्षमता को 2026 तक 30% बढ़ाने की राह पर है, जिससे लगभग 500 मेगावाट (MW) की अतिरिक्त क्षमता जुड़ेगी।

फिर भी, AI प्लेटफॉर्म और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता एक चुनौती बनी हुई है। भले ही डेटा स्थानीय रूप से भारत में स्टोर किया गया हो, लेकिन इसे प्रोसेस और विश्लेषण करने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरण बाहरी ढांचे और कानूनी प्रणालियों द्वारा शासित हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास पैदा करता है कि देश अत्याधुनिक तकनीक का लाभ तो चाहता है, लेकिन बाहरी सिस्टम का उपयोग उनके सबसे मूल्यवान संसाधन यानी डेटा पर उनके नियंत्रण को कमजोर कर सकता है।

आम नागरिकों पर इसका क्या असर पड़ता है?
हर बार जब कोई व्यक्ति बिल का भुगतान करने, स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने या किसी सरकारी योजना के लिए आवेदन करने हेतु डिजिटल सेवा का उपयोग करता है, तो वह नया डेटा उत्पन्न कर रहा होता है। इस इकोसिस्टम में यूपीआई भुगतान, आयुष्मान भारत स्वास्थ्य रिकॉर्ड और ई-संजीवनी (e-Sanjeevani) टेलीकंसल्टेशन सब कुछ शामिल है। सीबीआरई की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 तक, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) ने 859 मिलियन (लगभग 86 करोड़) से अधिक ABHA खातों को डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड से जोड़ दिया है, जिसने स्वास्थ्य डेटा को एक राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र में बदल दिया है। यह डेटा तय कर सकता है कि आपको किन सेवाओं तक पहुंच मिलेगी, आप किन लाभों के पात्र हैं, या संस्थाएं आपको किस नजरिए से देखती हैं।

आगे का रास्ता और सबसे बड़ा सवाल
जैसे-जैसे एआई सरकारी कामकाज का अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है, मुख्य सवाल अब यह नहीं है कि क्या डेटा का उपयोग किया जा रहा है, बल्कि सवाल यह है कि यह उपयोग कैसे, किसके द्वारा और किन शर्तों पर किया जा रहा है। जब सरकारें विदेशी प्रणालियों पर निर्भर होती हैं, तो यह मुद्दा केवल तकनीक तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह संप्रभुता, सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों का भी एक बड़ा सवाल बन जाता है। दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल आबादी वाले देशों में से एक होने के नाते, डेटा गवर्नेंस के बारे में भारत द्वारा आज लिए गए फैसले न केवल भविष्य की नीतियों को आकार देंगे, बल्कि आने वाले वर्षों में राज्य और उसके नागरिकों के बीच के संबंधों की रूपरेखा भी तय करेंगे।

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