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गूगल ने किया समझौता: अब AI से मैनेज होगी डेटा सेंटर्स की बिजली, जानें ग्रिड का लोड कम करने वाली योजना क्या है
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Jagriti
Updated Sat, 21 Mar 2026 12:24 PM IST
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सार
Google Data Center Power Management: क्या डेटा सेंटर्स बिजली ग्रिड के लिए खतरा बन रहे हैं? गूगल ने इसी चुनौती को अवसर में बदलते हुए 1 गीगावाट (1GW) की डिमांड रिस्पॉन्स क्षमता को अपने एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स में शामिल किया है। मशीन लर्निंग का उपयोग करके पीक ऑवर्स में बिजली खपत को ऑटोमैटिक तरीके से एडजस्ट करने वाली यह तकनीक न केवल बिजली बचाएगी, बल्कि आम यूजर्स के लिए भी बिजली की कीमतें कम करने में मददगार साबित हो सकती है।
गूगल ने किया समझौता
- फोटो : freepik
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विस्तार
गूगल ने अमेरिका में अपने डेटा सेंटर्स के लिए 1 गीगावाट (GW) डिमांड रिस्पॉन्स क्षमता जोड़ने का समझौता किया है। इसका मकसद है बढ़ती बिजली खपत को स्मार्ट तरीके से कंट्रोल करना और पावर ग्रिड पर दबाव कम करना।
डिमांड रिस्पॉन्स क्या है?
डिमांड रिस्पॉन्स एक ऐसा सिस्टम है जिसमें पीक टाइम यानी की जब बिजली की मांग ज्यादा होती है तो बिजली की खपत को कम या शिफ्ट किया जा सकता है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
जब बिजली ग्रिड पर लोड (पीक डिमांड) सबसे ज्यादा होता है, तब गूगल का सिस्टम अपने गैर-जरूरी मशीन लर्निंग (ML) वर्कलोड्स को रीशेड्यूल कर देता है या अस्थायी रूप से कम कर देता है। यह एडजस्टमेंट इस तरह किया जाता है कि डेटा सेंटर के लॉन्ग-टर्म ऑपरेशंस या यूजर सर्विस पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
किन कंपनियों के साथ साझेदारी की है?
गूगल ने कई बड़ी पावर कंपनियां जैसे इंडियाना मिशिगन पावर, टेनेसी वैली अथॉरिटी, एंटरजी अर्कांसस, मिनेसोटा पावर और डीटीई एनर्जी के साथ साझेदारी की है। जिससे ग्रिड पर तनाव बढ़ते ही बिजली खपत को तुरंत मैनेज किया जा सके।
ग्रिड और आम जनता को क्या फायदा होगा?
गूगल ने स्पष्ट किया कि...
गूगल ने साफ कहा है कि यह तकनीक हर जगह एक जैसी कारगर नहीं हो सकती। डिमांड रिस्पॉन्स की क्षमता डाटा सेंटर की लोकेशन, डिजाइन और वहां उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करती है। हालांकि, 1GW का यह लक्ष्य अन्य टेक दिग्गजों के लिए एक मिसाल है कि कैसे टेक्नोलॉजी के जरिए ऊर्जा संकट को हल किया जा सकता है।
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डिमांड रिस्पॉन्स क्या है?
डिमांड रिस्पॉन्स एक ऐसा सिस्टम है जिसमें पीक टाइम यानी की जब बिजली की मांग ज्यादा होती है तो बिजली की खपत को कम या शिफ्ट किया जा सकता है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
जब बिजली ग्रिड पर लोड (पीक डिमांड) सबसे ज्यादा होता है, तब गूगल का सिस्टम अपने गैर-जरूरी मशीन लर्निंग (ML) वर्कलोड्स को रीशेड्यूल कर देता है या अस्थायी रूप से कम कर देता है। यह एडजस्टमेंट इस तरह किया जाता है कि डेटा सेंटर के लॉन्ग-टर्म ऑपरेशंस या यूजर सर्विस पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
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किन कंपनियों के साथ साझेदारी की है?
गूगल ने कई बड़ी पावर कंपनियां जैसे इंडियाना मिशिगन पावर, टेनेसी वैली अथॉरिटी, एंटरजी अर्कांसस, मिनेसोटा पावर और डीटीई एनर्जी के साथ साझेदारी की है। जिससे ग्रिड पर तनाव बढ़ते ही बिजली खपत को तुरंत मैनेज किया जा सके।
ग्रिड और आम जनता को क्या फायदा होगा?
- नए पावर प्लांट्स की जरूरत में कमी: पीक डिमांड को मैनेज करने से नए बिजली घरों या ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण की तत्काल आवश्यकता कम हो जाती है। इससे पर्यावरण और सरकारी खजाने दोनों की बचत होती है।
- कम होगी बिजली की कीमत: स्टडीज के अनुसार, अगर बड़े एनर्जी लोड्स जैसे डेटा सेंटर्स में थोड़ी भी फ्लेक्सिबिलिटी हो, तो पूरे बिजली नेटवर्क की कुल सिस्टम कॉस्ट कम हो जाती है। इसका सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली के रूप में मिल सकता है।
- आधुनिक ग्रिड प्लानिंग: गूगल अब सोलर, जियोथर्मल और लॉन्ग-ड्यूरेशन स्टोरेज जैसे विकल्पों में भी निवेश कर रहा है, ताकि ग्रिड की विश्वसनीयता (Reliability) बनी रहे।
गूगल ने स्पष्ट किया कि...
गूगल ने साफ कहा है कि यह तकनीक हर जगह एक जैसी कारगर नहीं हो सकती। डिमांड रिस्पॉन्स की क्षमता डाटा सेंटर की लोकेशन, डिजाइन और वहां उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करती है। हालांकि, 1GW का यह लक्ष्य अन्य टेक दिग्गजों के लिए एक मिसाल है कि कैसे टेक्नोलॉजी के जरिए ऊर्जा संकट को हल किया जा सकता है।